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16 मार्च 2026 · MAR 16 , 2026

कश्मीर: सत्रह साल में 27 फीसदी

डल झील पुनर्वास योजना के तहत 416 करोड़ रुपये से खास कुछ हासिल नहीं, समस्याएं और गहराईं, सरकार को कुछ सूझ नहीं रहा
डल झील पर अतिक्रमण का मुद्दा नहीं सुलझा

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक तनवीर सादिक ने श्रीनगर की डल झील में रहने वालों के पुनर्वास की स्थिति पर सवाल पूछा, तो सरकार का जवाब चौंकाने वाला था। 416.72 करोड़ रुपये की पुनर्वास योजना में 17 साल में “सिर्फ 27 प्रतिशत प्रगति” हुई। 2009 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मंजूर हुई इस बड़ी परियोजना में श्रीनगर की जबरवान पहाड़ियों के पिछवाड़े डल झील की कछार पर बसे लगभग नौ हजार  परिवारों को दूसरी जगह बसाने की कोशिश की गई थी। मकसद प्रदूषण कम करना, जल जीवों को बचाना और झील के लगातार सिकुड़ते दायरे को रोकना था।

लेकिन अब तक सिर्फ 1,808 परिवारों को ही श्रीनगर की एक कॉलोनी में बसाया गया है, जो 2014 की भयानक बाढ़ के दौरान सबसे ज्‍यादा प्रभावित इलाकों में एक था। कुछ अपनी मर्जी से, कुछ बुनियादी सुविधाओं के अभाव, मुआवजे के झगड़े और हाइकोर्ट के स्टे ऑर्डर की वजह से नई जगह नहीं गए।

डल कश्मीर के इतिहास और संस्कृति का केंद्र रही है। सदियों से उसमें इंसानी दखल रहा है। इससे झील तैरते हुए बगीचों और बस्तियों में बदल गई। हजरतबल, बोड डल और निगीन घाटी में बंटी इस झील का ब्रिटिश अफसर वाल्टर आर. लॉरेंस ने अपनी किताब में खास जिक्र किया है। लॉरेंस ने कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों का दौरा किया और बाद में द वैली ऑफ कश्मीर नाम से किताब लिखी, जो इस इलाके के भूगोल, इतिहास, संस्कृति और सामाजिक हालात के बारे में पूरी जानकारी देती है।

पर्यटकों के आकर्षण के साथ यह झील स्थानीय लोगों के लिए रोजी-रोटी, पीने के पानी, मछली और सब्जियों का जरूरी स्रोत भी है। झील के मीर बेहरी इलाके में रहने वाले अब्बास कश्मीरी का जन्म डल के अंदरूनी इलाके में हुआ था, जहां उनकी सात पीढ़ियां रह चुकी हैं। वे कहते हैं, “जिस पानी में हम नदरू (कमल का तना) उगाते हैं, उसके भी राजस्‍व दस्‍तावेज हमारे पास हैं। ये कागजात हमें 100 साल से भी पहले दिए गए थे।” डल में रहने वाले लोग कहते हैं कि वे झील के रखवाले के तौर पर यहां बसे थे।

डल में अतिक्रमण

पहले, लोग 25-30 फुट लंबे लकड़ी के डंडों से खरपतवार निकालते थे और उसकी जड़ भी पूरी तरह निकाल देते थे। हाल के वर्षों में जम्मू-कश्मीर लेक कंजर्वेशन ऐंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (एलसीएमए) ने खरपतवार काटने के लिए मशीनों का इस्तेमाल शुरू किया। डल में रहने वालों का मानना है कि इससे खरपतवार की वृद्धि बढ़ गई है। स्थानीय निवासी कहते हैं, ‘‘सरकारी मशीनें सिर्फ ऊपरी परत काटती है। जड़ें वहीं रह जाती हैं, जिससे यह फिर तेजी से बढ़ती है।’’

कई लोगों का दावा है कि जब अधिकारियों ने खेती पर रोक लगा दी और हाथ से खरपतवार हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाली नावों को जब्त कर लिया, तो स्थितियां खराब होने लगीं। धीरे-धीरे, युवा पीढ़ी खेती से पर्यटन उद्योग, ट्रांसपोर्ट और सरकारी नौकरियों की ओर जाने लगी। स्थानीय निवासी कहते हैं, ‘‘लोग यहां बेटियों की शादी नहीं करते। बाहरी लोग अब भी मानते हैं कि डल में रहने वालों के पास ठीक टॉयलेट भी नहीं हैं।’’

नाम न बताने की शर्त पर डल में रहने वाले एक निवासी ने बताया कि शुरू में डल में रहने वाले 98 प्रतिशत लोग दूसरी जगह जाना नहीं चाहते थे, क्योंकि उनकी रोजी-रोटी उसी पर निर्भर थी। पर्यावरण और रोजी दोनों सुरक्षित थे। लेकिन अनिश्चितता ने लोगों को वहां से जाने पर मजबूर किया। वे कहते हैं, “यह मर्जी से नहीं बल्कि दबाव में था।”

नाकाम प्रयोग

पुनर्वास योजना के तहत बेमिना में 7,526 कनाल जमीन का अधिग्रहण किया गया था। हर परिवार को एक प्लॉट, निर्माण के लिए 1.05 लाख रुपये और 3.91 लाख रुपये का एकमुश्‍त मुआवजा दिया गया। लेकिन बुनियादी सुविधाओं पर ध्‍यान नहीं दिया गया। इस वजह से कई लोग दोबारा डल लौट आए।

पर्यावरण एक्टिविस्ट राजा मुजफ्फर 27 फीसदी प्रगति को “नाकामी” बताते हैं। वे कहते हैं, “अगर 17 साल में सिर्फ 25-30 फीसदी पुनर्वास हुआ, तो इससे पता चलता है कि सही सलाह-मशविरा नहीं हुआ। जानकारों से कोई बातचीत नहीं की गई, कोई सही और ठोस नीति नहीं बनाई गई।”

वे कहते हैं कि डल में रहने वालों को दोषी ठहराया जा रहा है लेकिन डल झील के आसपास बेतहाशा बढ़े शहरीकरण, बड़े-बड़े होटलों के निर्माण पर कोई कुछ नहीं कहता। वे कहते हैं, “हरवान, निशात, शालीमार, बुलवार्ड रोड में शहरीकरण से 10 फीसदी से ज्‍यादा प्रदूषण पैदा होता है।” मुजफ्फर का कहना है कि लोगों को निकालना हल नहीं है। “अगर आप किसी को उसकी जगह से हटा देंगे, तो उसका क्या होगा?”

रुके हुए पुनर्वास और कानूनी मुश्किलों के मद्देनजर सरकार ने अब अपना रुख बदला है। विधानसभा में बताया गया कि 58 अंदरूनी बस्तियों को इन-सीटू संरक्षण मॉडल के तहत इको-बस्तियों के तौर पर विकसित किया जाएगा। मौजूदा बजट के तहत छह पर काम शुरू हो गया है, जिसमें कचरी मोहल्ला भी शामिल है, जिसे “मॉडर्न गांव” बताया जा रहा है।

डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2024 में राष्‍ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल की बनाई एक साझा कमेटी ने रिपोर्ट दी थी कि अतिक्रमण रोकने के लिए डल झील के आस-पास बफर जोन बनाए गए थे। अक्टूबर 2024 में डल और निगीन झीलों की जांच के दौरान पैनल ने एलसीएमए के सीवेज और सॉलिड वेस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर का रिव्यू किया। 18 म्युनिसिपल वार्ड से 52.40 एमएलडी सीवेज निकलता है।

एलसीएमए से आउटलुक को मिले आंकड़ों के मुताबिक, डल-निगीन झील के पर्यावरण के बचाव के लिए 212.38 करोड़ रुपये के संयुक्‍त मैनेजमेंट प्रोग्राम को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने सैद्धांतिक रूप से मान लिया है और अभी वित्तीय मंजूरी का इंतजार है।

एलसीएमए के सुपरिटेंटेड इंजीनियर मुजम्मिल रफ़ीक़ी ने कहा कि रिवाइज़्ड डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) में सीवेज ट्रीटमेंट, इंटरलिंकिंग चैनलों को फिर से शुरू करने और जल क्षमता के प्रबंधन पर फोकस है। उन्होंने कहा, “लगभग 80 फीसदी प्रदूषण सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से कवर किया जाता है। बाकी 20 फीसदी पर काम चल रहा है।” उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी नए हाउसबोट की इजाजत नहीं दी जा रही है और तैरते बगीचों का प्रबंधन पर्यावरण को ध्‍यान में रखकर किया जाएगा। उन्होंने कहा, “कई इलाकों में नेविगेशन सिस्टम खराब हो गया है। चैनल जाम हैं। अगर ड्रेनेज ठीक नहीं किया गया, तो पांच दिन की भारी बारिश भी 2014 जैसा संकट पैदा कर सकती है।” एक पर्यावरण रिसर्चर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि डल का इलाका लगभग 25 वर्ग किमी से घटकर लगभग 11 वर्ग किमी साफ पानी की सतह पर आ गया है। उन्होंने कहा, ‘‘डल की कछार का कटाव बढ़ा है। कचरे और फर्टिलाइज़र के बहाव के कारण नाइट्रोजन का स्‍तर बढ़ गया है।’’

डल दाचीगाम नेशनल पार्क और सलीम अली नेशनल पार्क के पास ही हैं, जो हिमालय का वन्‍यजीव संरक्षित क्षेत्र हैं और लुप्‍तप्राय हंगुल (कश्मीर हिरण) की सुरक्षा के लिए मशहूर है। इससे इको-सेंसिटिव जोन के नियमों और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस पर सवाल उठते हैं, जो सुरक्षित एरिया के 10 किमी के अंदर नई गतिविधि पर रोक लगाती है।

दुनिया भर में कई समुदायों की रिहाइश और रोजी-रोटी पानी पर ही निर्भर होती है। इंडोनेशिया के बोर्नियो में तैरते गांवों में, फिलीपींस और मलेशिया के कुछ हिस्सों में और यहां तक कि दक्षिण-पूर्व एशियाई शहरी तटों पर भी, सख्त वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम और मॉडर्न सीवेज इन्‍फ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ बसावट है।

पर्यावरण एक्टिविस्ट मुजफ्फर का कहना है कि जगह बदलने के बजाय ऐसे मॉडल का अध्‍ययन करना चाहिए। वे कहते हैं, “कचरा कलेक्शन पक्का करें। सॉलिड वेस्ट नियम लागू करें। जरूरत हो तो हर महीने 100 रुपये का शुल्‍क लगाएं। लेकिन लोगों को उजाड़ें नहीं, क्योंकि यह समस्या का हल नहीं है।”

 

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