सर्वे की पद्धति

यूनिवर्सिटी रैंकिंग
यूनिवर्सिटी रैंकिंग

रैंकिंग के लिए विश्वविद्यालयों का जिन मानकों पर मूल्यांकन किया गया है, उनमें फैकल्टी और छात्र का अनुपात (एफएसआर), पीएचडी वाली फैकल्टी (एफडब्ल्यूपी), प्रति फैकल्टी शोधपत्र की संख्या (पीपीएफ), प्रति शोधपत्र उद्धरण (सीपीपी) और समावेशी और विविधता (आइडी) शामिल हैं। इस मूल्यांकन में प्राप्त अंकों के आधार पर संस्थानों को रैंकिंग प्रदान की गई है। इसे डिजाइन करने में इंडस्ट्री का भी फीडबैक लिया गया है। आउटलुक-आइसीएआरई इंडिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग-2019 में संस्थानों की सीधी तुलना करने के बजाय यह देखा गया है कि एक ही कैटेगरी में शामिल संस्थानों का प्रदर्शन अलग-अलग पैमाने पर कैसा है। इससे हर कैटेगरी में शामिल संस्थानों की मजबूती और कमजोरी, दोनों का पता चलता है।

रैंकिंग की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विश्वविद्यालयों के आकलन के लिए भरोसेमंद थर्ड पार्टी स्रोतों से आंकड़े लिए गए हैं। इसमें संस्थानों द्वारा दिए गए आंकड़ों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। अगर किसी संस्थान की वेबसाइट से सूचना ली भी गई है तो अलग डाटा वेरिफिकेशन टीम ने उस सूचना की विश्वसनीयता और सत्यता की जांच की है। इसका मकसद यह है कि माता-पिता समेत सभी पक्षों को उच्च क्वालिटी की और भरोसेमंद जानकारी मिल सके।

विश्वविद्यालयों की रैंकिंग निष्पक्ष और सटीक हो, इसके लिए स्टैटिस्टिकल तकनीक और जेड-स्कोर नॉर्मलाइजेशन का इस्तेमाल किया गया है। दस से ज्यादा लोगों द्वारा लिखे गए शोधपत्र को शामिल नहीं किया गया है। उन लेखकों या संस्थानों को कम वेटेज दिया गया है जिन्होंने अपने ही शोधपत्र का बहुत बार उद्धरण दिया है।

इस रैंकिंग की एक और खास बात है कि इसमें कम अंक हासिल करने वाली यूनिवर्सिटी को किसी विशेष पैमाने पर ज्यादा अंक मिल सकते हैं, और किसी विशेष पैमाने पर ज्यादा अंक हासिल करने वाली यूनिवर्सिटी की ओवरऑल रैंकिंग कम भी हो सकती है। रैंकिंग के इस अलग तरीके से छात्र-छात्राओं को उन संस्थानों को पहचानने में मदद मिल सकती है जिनकी रैंकिंग तो नीचे है, लेकिन उन छात्रों की जरूरत के मुताबिक फिट हैं। इससे कम जाने-माने संस्थानों और स्पेशलिस्ट यूनिवर्सिटी को भी उनकी खासियतों के आधार पर उभरने का मौका मिलता है।

 

 

 

 

 

 

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