रहस्यमय महामारी के खौफनाक पंजे

दमयंती दत्ता
संकट में जीवनः मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण् मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में मरीजों की बढ़ती भीड़
संकट में जीवनः मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण् मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में मरीजों की बढ़ती भीड़
एपी

दमयंती दत्ता
बिहार के मुजफ्फरपुर में बच्चों की दर्दनाक मौतें एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम की महामारी के फैलते प्रकोप का संकेत, स्वास्थ्य सेवा की उपेक्षा और दुर्दशा भी उजागर

हर बेड पर दो बच्चे और दो जोड़ी मां-बाप हैं। युवा माताएं बच्चों को गोद में लिए हैं। पिता बिस्तर पर निश्चल पड़े शिशुओं की ट्यूब और मास्क ठीक कर रहे हैं। कई दूसरे बच्चे फर्श पर लेटे हैं और मां-बाप उन्हें झुलसाने वाली गर्मी से बचाने के लिए पंखा झलते हैं। नर्स और डॉक्टर इधर-उधर भाग रहे हैं। मशीनों की रोशनी चमकती-झपकती है। सफेद कपड़ों में लिपटे बच्चों के शव आते हैं, तो रह-रहकर चीत्कार उठती है। या फिर टीवी एंकरों या मंत्रियों को आता देख “वापस जाओ” का शोर उठता है। लेकिन पलभर के लिए। शोक या गुस्सा का वक्त ही कहां है, बीमार बच्चों के लिए घड़ी तेजी से भाग रही है।

वक्त तेजी से गुजर रहा है। पूरा देश दम साधे देख रहा है। उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से अखबारों की कहानियों और टेलीविजन स्क्रीन पर दर्दनाक तसवीरों से देश दहल उठा है। बच्चे हर रोज मर रहे हैं। कोई रहस्यमय हत्यारा पलक झपकते बच्चों की जान ले रहा है। दो जून तक 9 बच्चे, 13 जून तक 50, 20 जून तक 136 और 23 जून तक 173 बच्चों की मौत हो चुकी है। महज महीने भर में 16 जिलों में लगभग 700 बच्चे संक्रमण के शिकार हो चुके हैं। डरावने आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले छह वर्षों में देश भर में 60,000 यानी संक्रमण के शिकार में से लगभग 50 फीसदी की मौत हो चुकी है। हर तरफ डर का माहौल है। सैकड़ों लोग गांवों से पलायन कर रहे हैं। उनका कहना है, “चमकी बुखार हमसे तेज चल रहा है और जीत भी जा रहा है।”

बेनाम खौफ

यह ऐसा डर है, जिसका न तो कोई नाम है और न ही कोई व्याख्या। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2008 में बच्चों में होने वाले घातक दिमागी बुखार के लिए एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) का शब्द गढ़ा था, जो डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के लिए मायावी है। वजह यह कि 30 से अधिक वायरस, जीवाणु, परजीवी और कवक की वजह से एईएस के लक्षण सामने आ सकते हैं। इनमें 50 प्रतिशत मामलों में संक्रमण अज्ञात एजेंटों से होता है और 90 प्रतिशत मामलों में कोई उपचार नहीं हो पाता है। जब तक उपचार और इलाज हो, रहस्यमयी हत्यारा अपना आतंक फैला चुका होता है और कई मरीजों की मौत हो चुकी होती है। दिल्ली एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया कहते हैं, “जब तक आपको पता नहीं चलता है कि बीमारी का कारण क्या है, तब तक कोई इलाज मुमकिन नहीं है। यहां तक कि चार दशकों के शोध के बाद भी एईएस सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक रहस्य बना हुआ है।” अगर इस पर काबू नहीं पाया जाता है, तो भारत को ऐसी महामारी का सामना करना पड़ेगा, जिसके लिए उसके हाथ खाली हैं, कोई योजना नहीं है।

ग्राउंड जीरो

इस बीमारी का प्रकोप प्राचीन सरयू नदी के किनारे छोटे-छोटे गांवों में उस वक्त शुरू हुआ, जब लीची के पेड़ों के बड़े-बड़े बाग लाल रंग के फलों से भर उठते हैं। हर गर्मियों में बच्चे बागों में दौड़ते-भागते, दिन भर खेलते, जमीन से फल उठाते हैं और जितने खा सकते, उतना खाते हैं। 1995 के बाद से हर गर्मियों में इसका प्रकोप फैलता रहा। बच्चों की दर्दनाक मौतें होती हैं, अस्पष्ट वजहें, अचानक दौरे पड़ना, अंगों में जकड़न, दिग्भ्रम की स्थिति- मस्तिष्क की सूजन के लक्षण (ग्राफिक देखें पृष्ठ 32-33) हैं। उनकी मौत क्यों होती है? वैज्ञानिक अभी तक मूल कारणों का पता नहीं लगा पाए हैं।

वैज्ञानिकों की माथा-पच्ची

विज्ञान की दुनिया सबूतों की तलाश में लगी है। अवधारणाओं और सिद्धांतों की समीक्षा की जा रही है। लीची जांच के दायरे में है। मुजफ्फरपुर देश में लीची की सबसे उत्तम किस्मों की आपूर्ति करता है। कुछ लोगों के लिए यह जहरीला है, क्योंकि इसमें स्वाभाविक रूप से एमीनो एसिड हाइपोग्लाइसीन ए पाया जाता है, जो अल्पपोषित बच्चों के लिए घातक मस्तिष्क सूजन की वजह बनता है। लैब टेस्ट से पता चलता है कि उनके शरीर में समान एमीनो एसिड की उच्च सांद्रता के कारण कम रक्त शर्करा (लो ब्लड शुगर) के स्तर का पता नहीं चलता है? लीची को लेकर डर ने इसकी बिक्री को प्रभावित किया है। उन बच्चों को भी प्रभावित किया है, जिनके परिवार आजीविका के लिए इस फल पर निर्भर हैं।

कुछ दूसरे लोग छह महीने के पीड़ित बच्चों की ओर इशारा करते हैं। निश्चित रूप से, उन्होंने लीची तो नहीं ही खाई होगी? यह किसी को समझ नहीं आ रहा कि केवल एक गांव में कुछ बच्चे या परिवार में केवल एक ही बच्चा इससे क्यों प्रभावित हो रहा है, दूसरों को यह क्यों नहीं हो रहा। या, यह कि आखिर जुलाई महीने में जब सभी लीची की तुड़ाई हो चुकी है, तब भी मुजफ्फरपुर में एईएस के मामले जारी हैं? बिहार में स्वास्थ्य सेवा पर प्रति व्यक्ति सालाना केवल 348 रुपये खर्च होता है, जो राष्ट्रीय औसत 724 रुपये के आधे से भी कम है। प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अकसर काम नहीं करते हैं और उन जगहों पर उपचार की सुविधा उपलब्ध नहीं होती है, जहां इसके सबसे अधिक मामले सामने होते हैं। वहीं, कुछ और लोगों का कहना है कि ऐसा माना जाता है कि लगभग 91 फीसदी मौतें इसलिए होती हैं, क्योंकि मरीजों को अस्पताल तक पहुंचने के लिए एक घंटे से ज्यादा समय तक यात्रा करनी पड़ती है। कुछ लोग इसके लिए प्रदूषण, भूजल प्रदूषण और लू को जिम्मेदार ठहराते हैं। बहुत तेजी से, यह फैल रहा है कि बच्चों में घातक बीमारी की वजह वायरल है।

पूरे देश में प्रकोप की आशंका

जागो, भारत। देश भर में कुछ-न-कुछ भयावह चल रहा है। यहां तक कि बिहार इस प्रकोप को रोकने के लिए संघर्ष कर रहा है, तो उसी बीच पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में एईएस से 16 बच्चों की मौत हो गई। राजस्थान 2016 से ही ऐसे छिटपुट मामलों का गवाह बन रहा है और उसने इस बाबत स्वास्थ्य अधिकारियों को सतर्क रहने का निर्देश दिया है। कोलकाता और कोझिकोड के डॉक्टर एक असामान्य स्रोत से एन्सेफलाइटिस के बढ़ते मामलों को लेकर चेतावनी दे रहे हैं, जबकि मिजोरम जनवरी से ही इस प्रकोप की चपेट में है। कर्नाटक का शिमोगा जिला अभी भी अल्प ज्ञात वायरस के कारण घातक एन्सेफलाइटिस की चपेट में है। नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) के अनुसार, एईएस के मामले लंबे समय तक आमतौर पर असम, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक, मणिपुर और त्रिपुरा के चावल बेल्ट में होते रहे हैं। लेकिन एनवीबीडीसीपी के डेटा बताते हैं कि 2018 में 17 राज्यों में 10,485 मामले सामने आए। एईएस स्पष्ट रूप से पूरे भारत में अपना पंजा फैला रहा है।

सिर्फ इतना ही नहीं, जैसे ही वैज्ञानिकों को एईएस के एक रोगाणु से लड़ने के तरीके मिलते हैं, वैसे ही दूसरा मरीजों की जान लेने सामने आ जाता है। भारत में एईएस का पहला मामला 1955 में तमिलनाडु के वेल्लूर में सामने आया था और 1973 में पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में पहली बार इसका बड़ा प्रकोप फैला। तब से, 19 राज्यों के 171 जिलों से एईएस और जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस (जेईवी) के मामले सामने आए। लेकिन 2005 में जेईवी वैक्सीन के आने और नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) द्वारा निगरानी दिशानिर्देशों को शुरू करने के बाद, जेईवी बैकफुट पर आ गया है। भोपाल एम्स में मेडिसिन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रजनीश जोशी कहते हैं, “जेईवी का असर घटता है, तो अन्य न्यूरोपैथोजेनिक एजेंटों की वजह से एईएस बेअसर हो जाते हैं।”

यही हुआ। 2000 के दशक के बाद से माइक्रोब्स समूह इन स्वरूपों में आ रहे हैः हर्पज सिम्प्लेक्स वायरस, एंटरोवायरस, निपाह वायरस, चंडीपुरा वायरस, स्क्रब टाइफस वायरस, वेस्ट नाइल वायरस, क्यासनूर फॉरेस्ट वायरस। इनमें से अधिकांश को इस देश में बड़ी आबादी को प्रभावित करने वाले प्रकोपों के रूप में नहीं देखा गया है, जो तंत्र उन्हें रेगुलेट करते हैं या वेक्टर्स को ट्रांसमिशन के लिए उपयोग करते हैं, उनके बारे में पर्याप्त समझ नहीं हैं। अधिकांश मेडिकल स्कूलों में नहीं पढ़ाए जाते हैं। इसे लेकर डॉक्टरों के लिए कोई क्लिनिकल दिशानिर्देश नहीं है। इससे भी अधिक, सामान्य आबादी में उनके खिलाफ प्रतिरक्षा बहुत कम है। इसलिए, वे भविष्य में बहुत अधिक घातक खतरा पैदा करते हैं। जोशी कहते हैं, “ये प्रकोप गर्म और आर्द्र मौसम में होते हैं, जो मुख्य रूप से बच्चों को प्रभावित करते हैं और इसमें जान जाने का जोखिम होता है।” वे बताते हैं कि हरेक के लिए एक निश्चित वायरल निदान न होने की वजह से रोगियों का इलाज करना बहुत मुश्किल है। एईएस और उसके नए रूपों में फैलने का मतलब है कि नए जोखिमों के प्रति अधिक सजग होने की जरूरत है। और, भारत को अब उस खतरे के साथ जीना होगा।

गंभीर खतरा

इनसानों को शिकार बनाने वाले वायरस, पैरासाइट्स और बैक्टीरिया पैथोजीन नामक सूक्ष्म परजीवी हैं। उनसे संक्रमित रोग होते हैं जो भोजन, छुआछूत, हवा और पानी से एक से दूसरे इनसान में फैलते हैं। इनमें से कुछ वायरस जानवरों के जरिए पर्यावरण से भी फैलते हैं। एईएस के मामले में अलग तरह के पैथोजीन दूसरे रास्तों से फैलते हैं लेकिन ये सभी इंसानों के सेंट्रल नर्वस सिस्टम (सीएनएस) को प्रभावित करते हैं। इनसे गंभीर समस्या और मौत हो सकती है। अपरिपक्व इम्यूनिटी (ग्राफ देखें पृष्ठ 32-33) होने के कारण बच्चों पर इसका खतरा ज्यादा होता है। जो बच्चे बच जाते हैं, उनमें प्रायः तंत्रिका संबंधी, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दुष्परिणाम होते हैं। माना जाता है कि इन वायरसों से बच्चों में एईएस का अत्यधिक असर होता है। दूसरे कारणों, जैसे मामूली ट्यूमर, दिमागी मलेरिया, सेंट्रल नर्वस सिस्टम के कई विकार एईएस के अज्ञात कारण हैं। इनकी वजह से वायरसों का वास्तविक प्रभाव पूरी तरह ज्ञात नहीं है। हालांकि वायरल एईएस नॉन-वायरल से ज्यादा खतरनाक है।

वायरल पैथोजीन के बारे में क्या ज्ञात है? जेईवी एक वायरस है जो कीटों खासतौर पर क्यूलेक्स मच्छर से इनसानों में संक्रमण फैलाता है। चांदीपुरा वायरस (सीएचपीवी) वायरस नए तरह का माना जाता है। यह वायरस लगातार रूप बदलता रहता है, इस वजह से यह खतरनाक है। सीएचपीवी का संक्रमण खास किस्म के मच्छर सैंडफ्लाई और क्यूलेक्स मच्छर के जरिए फैलता है। चमगादड़ के जरिए एक तरह के एईएस पैथोजीन का संक्रमण फैलता है। निपाह वायरस और वेस्ट नील वायरस से क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज वायरस फैलता है। पूर्वी भारत के बच्चों में एईएस का सबसे आम हरपेस सिम्प्लेक्स वायरस इनसान से इनसान में संक्रमण फैलाता है। एईएस के लिए अहम पैथोजीन माने जाने वाले एंटिरोवायरस पानी, भोजन और मिट्टी से फैलता है। चेन्नै के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. मनोज वी. मुरेकर बताते हैं कि स्टडी से पता चला है कि उत्तराखंड के देहरादून, तमिलनाडु के वेल्लूर, पुद्दुच्‍चेरी और लखनऊ तक में स्क्रब टायफस वायरस के बड़ी संख्या में मरीज सेंट्रल नर्वस सिस्टम की समस्या में उलझे हैं। वे कहते हैं, “नीति निर्माताओं को एईएस के मामलों की निगरानी के तहत स्क्रब टायफस की जांच पर विचार करना चाहिए।”

प्रकृति से छेड़छाड़

सबसे बड़ी चुनौती कहीं और है। वायरस थ्योरी सामने आ रही है, एईएस जानवरों से फैलने वाली बीमारी बन गई है, जहां पैथोजीन जीवों से फैल रहा है और यह जानवरों से इनसानों में फैल रहा है। 21वीं सदी में पशुजनित बीमारियों ने दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया जो अभी इससे निपटने के लिए तैयार नहीं है। सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (एसएआरएस) से एवियन इन्फ्लूएंजा, निपाह वायरस से एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम, स्वाइन फ्लू, एमईआरएस, हेंड्रा से इबोला और जीका प्रत्येक ग्लोबल महामारी जीवों की बीमारियों (ग्राफ देखें) से फैल रहा है। नए वायरसों के चलते ये बीमारियां बढ़ रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में एक अरब या फिर इससे भी ज्यादा मामले वन्य जीवों की बीमारियों से फैलने का अनुमान है। 1940 से अब तक 400 संक्रमित बीमारियों में से करीब 60 फीसदी बीमारियां जीव जनित हैं।

चेतावनी के संकेत स्पष्ट रूप से दिख रहे हैं। 2000 में झारखंड के अलग होने के साथ ही बिहार में वन क्षेत्र तेजी से घट गया। उसका वन क्षेत्र घटकर 7.23 फीसदी रह गया। बिहार 33 फीसदी वन क्षेत्र के लक्ष्य से बहुत पीछे है। लीची के लिए मशहूर मुजफ्फरपुर कभी जंगल और जंगली जानवरों के लिए जाना जाता था। अब इस जिले में जंगल पूरी तरह साफ हो चुके हैं। केंद्र सरकार के कुटीर, लघु एवं मझोले उद्योग मंत्रालय की 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार, खेतिहर भूमि का लगातार विस्तार होने के कारण जंगली भैंसें, हिरण, चिंकारा और चीते पूरी तरह विलुप्त हो गए हैं। जंगली जानवरों में कभी-कभी लोमड़ी, सियार, नीलगाय और जंगली सुअर दिख जाते हैं। सड़कों और बांधों के अंधाधुंध निर्माण, व्यावसायिक बगीचों के निर्माण और बालू माफिया द्वारा अवैध रूप से अंधाधुंध खनन से ज्यादातर नदियों की चौड़ाई घट गई है। बालू तस्करों के लिए सरयू नदी खनन के लिए सबसे मुफीद है। 

प्रकृति के साथ छेड़छाड़ किए जाने से मुजफ्फरपुर क्षेत्र खासतौर पर जानवरों की बीमारियों का संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ गया है। ये बीमारियां उन क्षेत्रों में फैल रही हैं, जहां बड़े पैमाने पर भू उपयोग बदला गया और मानवीय गतिविधियां बढ़ीं। इससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा। इन क्षेत्रों में संक्रमण तेजी से फैला क्योंकि कुछ किस्मों के वायरस फैलाने वाले जंगली जानवर वन क्षेत्र खत्म होने के कारण इंसानों के ज्यादा निकट आ गए। एईएस के मामले में फल खाने वाले चमगादड़ हजारों की संख्या में भोजन की तलाश में गांवों, शहरों और कस्बों में पहुंच गए। ये चमगादड़ लीची के बागों में इनसानों के नजदीक रहने लगे। इबोला और निपाह भी इसी तरह फैला था। पुद्दुच्‍चेरी की पर्यावरणविद और जैव विविधता संरक्षण सलाहकार नीना दासगुप्ता कहती हैं, “वायरस इन जीवों के मल-मूत्र से फैलता है। इससे फल, मीट, दूध और पानी संक्रमित हो जाता है। लीची खाने वाले बच्चे चमगादड़ों की लार और मूत्र से संक्रमित फल आसानी से पा जाते हैं।” दासगुप्ता कहती हैं कि चमगादड़ इनसानों में फैलने वाले 60 से ज्यादा किस्मों के वायरस फैलाते हैं। इनमें इबोला और निपाह वायरस भी शामिल हैं जिनसे दिमागी बुखार फैलता है। जलचर पक्षी कई तरह के एईएस वायरस फैलाते हैं। सूअर भी कई तरह के वायरस फैलाने के लिए जाने जाते हैं जबकि लीची के पेड़ों के नजदीक रहने वाले मच्छर और सैंडफ्लाई चमगादड़ों का खून चूसते हैं जो वायरस फैलाने का जरिया बनते हैं।

गांवों में खुले में शौच जाने से मल से भूजल भी प्रदूषित होता है। कई तरह के एंटेरोवायरस का संक्रमण मुख्य रूप से मल से हाथों और मुंह के जरिए फैलता है। बच्चों में खतरनाक एन्‍सेफेलाइटिस इसी से फैलता है। यूनीसेफ के एक अध्ययन के अनुसार बिहार के कई गांवों में भूजल में मलीय प्रदूषण 35.7 गुना तक ज्यादा पाया गया। उथले कुंए और हैंडपंप के पानी में मलीय प्रदूषित तत्व होते हैं। यह बिहार में बड़ी समस्या है। एम्स पटना के डायरेक्टर गिरीश कुमार सिंह द्वारा हाल में किए गए अध्ययन में मुजफ्फरपुर में खुले में शौच से सरयू नदी में वायरस दर्शाने के लिए वायरस ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया। इसी तरह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में गंडक नदी में भी इसका इस्तेमाल किया गया। इन क्षेत्रों में एईएस इसी वायरस से फैलता है। मुजफ्फरपुर लीची के बागों में उर्वरकों के तौर पर मानव मल के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है। वैज्ञानिक एईएस मौतों के लिए घरों की गंदगी और चूहों के संक्रमण को भी जिम्मेदार मान रहे हैं। चूहों में पिस्सू और जूं होते हैं जो स्क्रब टायफस वायरस फैलाने के कारक बनते हैं।

खतरे की घंटी

एईएस और बिहार में दम तोड़ते बच्चों की घटना ने सभी की पेशानी पर बल ला दिया है। भारत की स्वास्थ्य प्रणाली, मूत्र की बदबू, क्लोरीन, उल्टी, स्वास्थ्य कर्मचारियों की कमी और जिला अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं के न होने पर उंगली उठाई जा रही है। वरिष्ठ डॉक्टरों को ‘लापरवाही’ के लिए निलंबित किया जा रहा है। सरकार की ‘उदासीनता’ के खिलाफ विरोध मार्च हो रहे हैं। मुजफ्फरपुर में रहने वाले इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीडियाट्रिक्स के डॉ. अरुण शाह ने भविष्य में इसके प्रकोपों को रोकने के लिए 2015 में तैयार मसौदे के दिशा-निर्देशों को लागू न करने को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर उंगली उठाते हुए उनकी दुखती रग पर हाथ रख दिया है। उन्होंने कहा, “आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं को जागरूकता फैलाने का काम करना था। लेकिन इसके बजाय वे चुनावी ड्यूटी निभाने में व्यस्त थे।”

बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने पहले तो मुजफ्फरपुर में एईएस से मरने वाले बच्चों की खबरों का खंडन किया, जिसकी वजह उन्हें तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। फिर बाद में उन्होंने अस्पताल का दौरा किया और उसके लिए छह एम्बुलेंस की घोषणा की और अस्पताल की वार्ड क्षमता को बढ़ाकर 100 किया। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री हर्षवर्धन को भी मुजफ्फरपुर में एक वायरोलॉजी प्रयोगशाला बनाने के अपने 2014 के प्रस्ताव को दोहराने की वजह से आलोचना झेलनी पड़ी, क्योंकि उन्होंने अभी तक अपना वादा नहीं निभाया था। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जब हालात की समीक्षा के लिए एईएस रोगियों से मिलने गए, तो उन्हें भी विरोध का सामना करना पड़ा। इससे भी अधिक, इस महामारी ने 2018 में गरीबों के लिए शुरू किए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुफ्त स्वास्थ्य सेवा योजना ‘आयुष्मान भारत’ पर एक बहस छेड़ दी है।

वकील मनोहर प्रताप की ओर से इस मामले में एक जनहित याचिका दायर की गई है। इसमें कहा गया कि मुजफ्फरपुर में महामारी को नियंत्रित करने के लिए बिहार सरकार की ओर से किए गए उपाय अनुपयुक्त और अपर्याप्त हैं। याचिका में राज्य के साथ-साथ केंद्र सरकार की ओर से चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने और एन्सेफलाइटिस से पीड़ित बच्चों के प्रभावी इलाज के लिए सहायता देने के लिए अदालत से दिशा-निर्देश देने की मांग की गई। सामाजिक कार्यकर्ता तमन्ना हाशमी द्वारा दर्ज कराई गई एफआइआर पर मुजफ्फरपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सूर्यकांत तिवारी ने लापरवाही के आधार पर हर्षवर्धन और पांडे के खिलाफ जांच का आदेश दिया गया है।

न लौटने वाला समय

इस पागलपन में हम भूल चुके हैं कि भारत ने बेहद संक्रामक एवियन फ्लू और स्वाइन फ्लू के प्रकोप का सफलतापूर्वक सामना किया है। दुर्भाग्य से एईएस खतरनाक, महंगी और समय लेने वाली बीमारी है। रोगाणुओं और उनसे होने वाली बीमारियों के लिए बेहतर निगरानी और अनुसंधान की आवश्यकता है। अस्पतालों को न सिर्फ बेड की संख्या बढ़ाने, बल्कि महंगी मशीनरी की भी जरूरत है। बीमारों के इलाज के लिए अधिक कर्मचारियों के अलावा रोगी के इतिहास और लक्षणों को समझने के लिए और अधिक प्रयासों की जरूरत है। इसमें जटिल जांच, रक्त की जांच और कल्चर, ऑक्सीजन और इंट्रावेनस, लंबर पंक्चर और ईईजी, एमआरआइ और सीटी स्कैन जैसी न्यूरोइमेजिंग सुविधाएं शामिल हैं, जो सस्ती नहीं हैं।

क्या भारत के पास कोई विकल्प है? हर तरफ और हर जगह तबाही इंतजार कर रही है। और बुरी खबर यह है कि वक्त तेजी से खत्म हो रहा है। किसी भी तरह की तैयारी के बजाय युद्ध-स्तर पर एईएस से सामना कहीं अधिक बेहतर होगा।

(मुजफ्फरपुर से प्रभात रंजन कुमार का इनपुट)

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