रईसजादों का नया शौकः कमजोर कानून का खामियाजा

साकेत बडोला
देश में 2-3 फोरेंसिक प्रयोगशालाएं ही ऐसी हैं जो वन्यजीव अपराध के साक्ष्यों को डीकोड करने में सक्षम हैं
देश में 2-3 फोरेंसिक प्रयोगशालाएं ही ऐसी हैं जो वन्यजीव अपराध के साक्ष्यों को डीकोड करने में सक्षम हैं

साकेत बडोला
वन्यजीव शिकार और तस्करी पर रोकथाम के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुकूल कानून जरूरी

वन्यजीव तस्करी दुनिया में बड़े अपराधों की सूची में चौथे नंबर पर है और इसका सीधा नाता दूसरे बड़े अपराधों मानव तस्करी, हथियार और ड्रग्स तस्करी से है। तस्करों का यह गठजोड़ पूरी दुनिया की जैव विविधता के लिए खतरा बनता जा रही है। एक आकलन के अनुसार, पूरी दुनिया में वन्यजीवों की तस्करी का अवैध कारोबार करीब 20-50 अरब डॉलर का है। भारत इसका एक प्रमुख केंद्र बन गया है, क्योंकि यहां की प्रचुर जैव विविधता और वन्यजीव संपदा शिकारियों के लिए बड़ा आकर्षण है।

शिकारी इंटरनेट प्लेटफार्म का इस्तेमाल भी करने लगे हैं। इसके लिए ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के साथ इंस्टेंट मैसेंजर का इस्तेमाल तेजी से किया जा रहा है, इस पर निगरानी रखना हम सभी के लिए एक चुनौती है। हाल ही में ट्रैफिक इंडिया की एक सूचना के आधार पर पुलिस ने तेंदुए के शिकारियों की धर-पकड़ की है। वे इंस्टेंट मैसेंजर के जरिए तेंदुए के 142 नाखून बेचने की फिराक में थे। 142 नाखूनों से आप समझ सकते हैं कि कम से कम 8 तेंदुए इन शिकारियों के शिकार बन गए। शिकारी ऑनलाइन प्लेटफार्ट के जरिए नकद, बार्टर और डिजिटल पेमेंट का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। अपराध नियंत्रण करने वाली एजेंसियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें अभी तक परंपरागत शिकारियों की धर-पकड़ का ही प्रशिक्षण मिला है, लेकिन अब उनके सामने वर्चुअल मार्केट के गठजोड़ तोड़ने की चुनौती है। मौजूदा समय में साइबर अपराध नियंत्रण में प्रशिक्षण देने के लिए हमने देश के छह टाइगर रिजर्व में अभियान चलाया है। इस कदम से वन्यजीवों की तस्करी के लिए साइबर अपराध करने वाले तस्करों पर नकेल कसी जा सकेगी।

इसके अलावा भारत में एक अहम समस्या यह है कि वन्यजीव अपराध नियंत्रण कानून और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीव व्यापार को नियंत्रित करने वाले मौजूदा कानून में कई मामलों में तारतम्य नहीं है। इसकी वजह से भी कई बार वन्यजीव अपराधियों और व्यापारियों को पकड़ने में दिक्कत आती है। उदाहरण के तौरपर भारत का वन्यजीव संरक्षण कानून 1972, भारतीय प्रजातियों के शिकार और तस्करी पर तो रोक लगाता है लेकिन अगर किसी ऐसी प्रजाति का भारत में व्यापार के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जो भारत की मूल प्रजाति नहीं है और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में उल्लेखित नही है तो उसके व्यापार को अपराध नहीं माना जा सकता है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हमारे देश में कछुए का व्यापार वन्यजीव अपराध के तहत प्रतिबंधित है लेकिन अगर कछुए की कोई ऐसी प्रजाति व्यापार के लिए इस्तेमाल हो रही है जो भारतीय मूल की नहीं है, तो देश में उसके व्यापार पर कोई रोक नहीं है। इसी तरह भारत में कई तरह की विदेशी चिड़ियों का व्यापार संभव हो रहा है। ऐसे में हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के कानून के साथ सामंजस्य बनाकर कानून में संशोधन करने की जरूरत है। अगर ऐसा होता है तो कई ऐसे व्यापार को रोका जा सकता है जो अभी अनुकूल कानून होने की वजह से धड़ल्ले से हो रहा है।

इस समय भारत से कछुए, पैंगोलिन, नेवले, अगरवुड के पेड़ जैसे नए तरह के जीव और वनस्पतियों की तस्करी भी काफी बढ़ी है। साथ ही गैंडे, तेंदुए, हाथी जैसे जानवर भी शिकारियों के निशाने पर हैं। भारत में एक बड़ी समस्या अपराधियों में डर नहीं होने की भी है। इसका कारण है कि यहां सजा मिलने की दर 10 फीसदी से भी कम है जबकि बेहतर रिकॉर्ड रखने वाले देशों में यह 50 फीसदी तक है। सजा मिलने का इतना कमजोर रिकॉर्ड होने का परिणाम है कि अपराधियों में वन्यजीवों के शिकार को लेकर डर बहुत कम है। इस दर को बढ़ाने के लिए समग्र प्रयास किए जाने की जरूरत है। इसमें देश की न्याय प्रणाली को वन्यजीव अपराध की गंभीरता समझाने के प्रयास के साथ-साथ जिन एजेंसियों के ऊपर अपराधियों को पकड़ने की जिम्मेदारी है, उन्हें भी पर्याप्त प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। इसके अलावा एक अहम बात यह भी है कि न्यायालय तभी सजा दे पाएंगे, जब साक्ष्य मजबूत हों। देश में वकीलों के स्तर पर भी वन्यजीव विशेषज्ञों की कमी है। इसी तरह फोरेंसिक प्रयोगशालाओं की भी कमी है। अभी देश में 2-3 फोरेंसिक प्रयोगशालाएं ही ऐसी हैं जो वन्यजीव अपराध के साक्ष्यों को डीकोड करने में सक्षम हैं, जबकि हमें देश के हर राज्य में कम से कम एक ऐसी फोरेंसिक प्रयोगशाला की जरूरत है। इन पहुलओं को ध्यान में रखा जाए और जरूरी उपाय किए जाएं, तो निश्चित तौर पर अपराधियों को सजा दिलाने की दर में बढ़ोतरी होगी। साथ ही वन्यजीव अपराध में कमी आएगी। यह समझना होगा कि जीव-जन्तुओं से ज्यादा हमें उनके जीवित रहने की जरूरत है। अगर वे नहीं रहेंगे तो हमारा पूरा पारिस्थितिकी तंत्र ही बिगड़ जाएगा, उसका खामियाजा अंतत: मानव जाति को ही उठाना होगा।

(लेखक आइएफएस और ट्रैफिक इंडिया के प्रमुख हैं, यह लेख प्रशांत श्रीवास्तव से हुई बातचीत पर आधारित है)

 

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