प्रियंका से कितना फर्क

लखनऊ से शशिकांत
तुरुप का पत्ताः लखनऊ में रोड शो के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ प्रियंका
तुरुप का पत्ताः लखनऊ में रोड शो के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ प्रियंका
नईम अंसारी

लखनऊ से शशिकांत
प्रियंका की सक्रियता से कांग्रेस में जोश बढ़ा मगर स्थितियां जटिल, भाजपा और सपा-बसपा भी उलझन में

दिल्ली की गद्दी के लिए सबसे अहम सूबे की सियासी फिजा हर घटना के साथ इतनी तेजी से बदल रही है कि सियासी पंडितों के लिए भी लोगों का रुझान पहेली जैसा लगने लगा है। समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन से उठी हवा अभी बैठी भी नहीं थी कि कांग्रेस ने प्रियंका तुरुप फेंक कर नई सनसनी पैदा कर दी। औपचारिक राजनीति में बतौर पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रभारी कांग्रेस महासचिव उतरीं प्रियंका गांधी की मोहक फिजा अभी खिल ही रही थी कि कश्मीर के पुलवामा में आतंकी हमले में सीआरपीएफ जवानों की शहादत ने गम और गुस्से की ऐसी बौछार की कि सियासी फिजा और पेचीदा हो गई। संभव है, अभी और हवाएं बहें। ऐसे अनिश्चित माहौल में भी जमीनी हकीकतों का आकलन बेमानी नहीं है, क्योंकि कई ऐसे सवाल हैं जो बड़े पैमाने पर घुमड़ रहे हैं।

इसमें दो राय नहीं कि प्रियंका गांधी की राजनीति में एंट्री से प्रदेश की राजनीति में समीकरण तेजी से बदले हैं। इससे कांग्रेस में उत्साह और जोश का संचार हुआ है तो दूसरे दलों में भी प्रियंका फैक्टर के असर को लेकर ऊहापोह बना हुआ है। इसकी वजह भी है। प्रियंका अमेठी और रायबरेली में सक्रियता के दौरान अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश से काफी कुछ परिचित हैं। वे अपने संगठन कौशल का भी सीमित इलाके में ही सही परिचय दे चुकी हैं। फिर, लोग उनमें उनकी दादी, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की छवि भी देखते हैं। इसके नजारे उनके पहले लखनऊ दौरे में करीब 15 किमी. के रोड शो के दौरान भी दिखे। लोग सड़कों और घरों की छतों पर उमड़ आए थे। उसके बाद लगभग चार दिनों के अपने लखनऊ प्रवास में देर रात और तड़के सुबह तक प्रदेश के नेताओं, अलग-अलग जिलों के कार्यकर्ताओं से सघन बैठक करके उन्होंने पार्टी में जान फूंकने की कोशिश भी की। इसका कांग्रेसियों में असर भी दिखा।

लेकिन असली सवाल यही है कि प्रियंका कितना असर डाल पाएंगी। लखनऊ यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर शशि शुक्ला का कहना है कि प्रियंका गांधी के आने से कोई बड़ा असर पड़ेगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता। यूपी में फिलहाल सपा-बसपा गठबंधन एक बड़ा फैक्टर है। हां, ऊंची जातियों में कुछ फीसदी लोग कांग्रेस की ओर लौट सकते हैं। कांग्रेस को दलित और मुस्लिम समुदाय के वोट सपा-बसपा के कारण पूरा मिलना संभव नहीं लगता है। लेकिन प्रियंका और कांग्रेस की कोशिशें बदस्तूर जारी हैं। प्रियंका की वजह से मीरापुर से भाजपा विधायक अवतार सिंह भड़ाना, पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद रामलाल राही की घर वापसी भी हुई है। कुछ खास इलाकों में कुछेक गैर-यादव ओबीसी जातियों में असर रखने वाले महान दल से बिना शर्त समझौता भी किया है। संकेत यह भी है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस प्रदेश में कुछ और छोटे दलों से गठबंधन करेगी।

प्रदेश मुख्यालय में बैठकों के बाद अब प्रियंका और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया जिले स्तर पर दौरे करेंगे और गांव-गांव जाएंगे। इसके अलावा प्रदेश के बड़े नेताओं को लोकसभा क्षेत्रों का प्रभार दिया जाएगा। साथ ही उनकी जिम्मेदारी के साथ जवाबदेही भी तय की जाएगी। पार्टी संभावित प्रत्याशियों को लेकर सर्वे भी करा रही है, जिसमें प्रत्याशी की स्थिति, जातिगत समीकरण, क्षेत्र में पकड़, अच्छा लड़ सकता है या नहीं सहित अन्य बिंदुओं की पड़ताल की जा रही है। यूपी में कांग्रेस 2009 में 22 सीटें जीती थी, लेकिन इस बार पार्टी का फोकस उन 22 सीटों के अलावा 10 अन्य सीटों पर भी है।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता अखिलेश प्रताप सिंह ने बताया कि कांग्रेस पिछले 30 साल से यूपी में आठ से 14 प्रतिशत वोट पाती रही है। कांग्रेस को हर जाति, धर्म का वोट मिलता रहा है। कभी वह बढ़ता है, कभी घटता है। जब वोट बढ़ेगा तो बाकी सभी के वोट घटेंगे। कांग्रेस के एक रणनीतिकार ने बताया कि कांग्रेस के मेनिफेस्टो में स्थानीय मुद्दों को शामिल किया जाएगा। इसमें गन्ना, आलू उत्पादक, धान, गेहूं, मक्का, बाजरा आदि के किसानों को ध्यान में रखते हुए मेनिफेस्टो जारी किया जाएगा। पुरानी पेंशन बहाली, किसानों की कर्जमाफी, रोजगार के अवसर पैदा करने, कानून-व्यवस्था को सुदृढ‍ करने के वादे भी किए जाएंगे। इसके अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग को जोड़ने, नौजवानों और महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

कांग्रेस को 1985 में विधानसभा चुनाव में भावनात्मक वोट मिलने के कारण सबसे ज्यादा वोट मिले थे। उस समय कांग्रेस 425 सीटों पर लड़ी थी और 269 सीटें जीती थी। वोट प्रतिशत 39.47 फीसदी था। 1996 में कांग्रेस 126 सीटों पर लड़कर 33 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी। इस दौरान कांग्रेस को 29.13 फीसदी वोट मिले थे। उसके बाद कांग्रेस किसी चुनाव में इस बुलंदी पर नहीं पहुंच पाई। इस दौरान 2009 में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया था। कांग्रेस लोकसभा की 69 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और 21 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी। कांग्रेस को 18.25 फीसदी वोट मिले थे। लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस प्रदेश में अपनी परंपरागत गढ़ की दो सीटें अमेठी और रायबरेली ही जीत पाई, जिस कारण कांग्रेस का वोट प्रतिशत भी घटकर साढ़े सात फीसदी पहुंच गया। इसके बाद 2017 में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ी। लेकिन पार्टी को महज 6.2 फीसदी वोट मिले और सिर्फ सात सीटों से संतोष करना पड़ा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने बताया कि जिन वजहों से वोट घटे, उन कारणों को सही किया जाएगा और वोट प्रतिशत फिर बढ़ेगा। रायबरेली में कांग्रेस काफी मजबूत है। इसलिए, रायबरेली कांग्रेस को मॉडल संगठन कहा जाता है। यहां बूथ स्तर तक संगठन का विस्तार है।

लेकिन क्या कांग्रेस में आई नई जान से दूसरी पार्टियों पर कोई फर्क पड़ने वाला है, यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय कहते हैं कि प्रियंका से भाजपा या समाज पर कोई फर्क नहीं पड़ना है, क्योंकि कांग्रेस के पास गांव और कस्बे तो छोड़ दीजिए, किसी ब्लॉक में ढूंढे़ कार्यकर्ता नहीं मिलते हैं। इनकी जो परंपरागत सीटें अमेठी और रायबरेली हैं, वह भी सपा-बसपा की दया पर हैं। हमने वहां कड़ी तैयारियां की हैं, ये दोनों सीटें हम इनसे छीनेंगे। प्रियंका की एंट्री से भाजपा के सवर्ण वोट कटने के कयासों के बारे में उन्होंने बताया कि सवर्ण जागरूक समाज है और वह देश के लिए सोचता है। वह देश और उत्तर प्रदेश के लिए भाजपा और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को अपरिहार्य और अति आवश्यक मानता है।

प्रियंका गांधी के राजनीति में आने से सपा-बसपा के वोट पर कितना असर पड़ेगा? सपा के एमएलसी शतरुद्र प्रकाश का कहना है कि अभी तत्काल तो फर्क पड़ता दिख रहा है, लेकिन चुनाव आते-आते क्या स्थिति रहेगी, यह कह नहीं सकते। उम्मीदवारों पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा। प्रदेश में सपा-बसपा का मजबूत गठबंधन है। इसलिए इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। पुलवामा में आतंकी घटना के बारे में उन्होंने बताया कि इसका चुनाव से कोई मतलब नहीं है। दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर सभी ने समर्थन किया है। लेकिन इतनी बड़ी घटना कैसे हो गई, यह सवाल तो है ही।

अब सवाल है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में कितना असर होगा? वाराणसी के पांडेपुर स्थित ओम गेस्ट हाउस के संचालक अशोक जायसवाल का कहना है कि प्रियंका गांधी के राजनीति में आने से यहां कांग्रेस के नेताओं में उत्साह तो है, लेकिन यदि मान लें कि लोकसभा चुनाव में 80 फीसदी वोट पड़ते हैं तो ज्यादातर वोट भाजपा को जाएगा। गोरखपुर के आर्यन हास्पिटल में महाप्रबंधक डॉ. जनमेजय सिंह ने बताया कि प्रियंका के आने के बाद कार्यकर्ताओं में जोश हो सकता है, लेकिन लोगों में कुछ खास नहीं है। गोरखपुर मंडल के कुशीनगर में पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह और विधायक अजय कुमार लल्लू के कारण कांग्रेस का अच्छा प्रभाव है। बड़हलगंज में डॉ. संजय कुमार की वजह से कांग्रेस की थोड़ी पकड़ है। ऐसे ही देवरिया में अखिलेश प्रताप सिंह की अच्छी पकड़ है। बहरहाल, दिनोदिन बदलती फिजा में उत्तर प्रदेश की राजनीति और पेचीदी होती जा रही है। लोगों के मूड का अंदाजा तो चुनावी रंग चढ़ने के बाद ही पता चलेगा।

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