हम सुनहरे अतीत की ओर बढ़ रहे हैं

राजेंद्र धोड़पकर
वर्तमान को भी इतिहास बनाने की कोशिश
वर्तमान को भी इतिहास बनाने की कोशिश
राजेंद्र धोड़पकर

राजेंद्र धोड़पकर
इन दिनों कुछ ऐसा अजूबा हो रहा है कि लोगों का वर्तमान का ज्ञान भी उसी स्तर का हो गया है जिस स्तर का उनका इतिहास ज्ञान है

भारत एक इतिहास प्रेमी देश है और पिछले कुछ वक्त से भारतीयों का इतिहास प्रेम कुछ बढ़ गया है। अब बहुत सारे भारतीयों की एक टांग वर्तमान में रहती है तो एक टांग इतिहास में रहती है। जो टांग इतिहास में रहती है, वह ज्यादातर अधर में रहती है क्योंकि उसके नीचे इतिहास ज्ञान की ठोस जमीन नहीं रहती। बहुत सारे लोग हैं जिनकी दूसरी टांग भी आजकल अधर में रहती है। अमूमन वर्तमान का सामान्य ज्ञान होने के लिए किताबें पढ़ने की जरूरत नहीं होती जैसे इतिहास का ज्ञान होने के लिए होती है। वर्तमान हमारे सामने मौजूद होता है और अगर आदमी की आंखें, कान और दिमाग चालू हालत में हैं, तो वर्तमान का मोटा-मोटा ज्ञान हो ही जाता है। अगर आप रास्ते पर चल रहे हैं और सड़क पर गड्ढे हैं तो उनका ज्ञान न होना असंभव है। अगर आंखों को नहीं हुआ तो टांगों को सड़क के गड्ढों का दर्दनाक एहसास होना अनिवार्य है।

इन दिनों कुछ ऐसा अजूबा हो रहा है कि लोगों का वर्तमान का ज्ञान भी उसी स्तर का हो गया है जिस स्तर का उनका इतिहास ज्ञान है। ऐसा कब होता है कि कोई सड़क के गड्ढे में पड़ा हो और यह महसूस कर रहा हो कि वह स्वर्ग में विचरण कर रहा है। हमारे राजनेताओं को अब ऐसी महारत हासिल हो गई है कि वे बेरोजगार नौजवानों को यह विश्वास दिला दें कि देश में रोजगारों की बंपर फसल आई हुई है और बेरोजगार नौजवान ही चुन नहीं पा रहे हैं कि वे कौन-सा रोजगार करें। वे बेरोजगारी, गरीबी, बीमारी, अशिक्षा से जूझते लोगों को यह भरोसा दिला रहे हैं कि उनकी समस्या उत्तर या दक्षिण भारत का कोई मंदिर है। वे देश को यह बता रहे हैं कि देश की सबसे बड़ी समस्या चार सौ साल पहले का मुगल साम्राज्य है और लोग मुगल साम्राज्य से जूझने में लग गए हैं।

इस तरह लोगों की दोनों ही टांगें अधर में झूल रही हैं और लोगों को पता ही नहीं है कि उनके पैरों के नीचे कोई जमीन नहीं है। वे नहीं समझना चाहते कि महान मुगल सम्राट अकबर सत्रहवीं सदी में राज करके जन्नतनशीं हो चुके हैं और वे लोग चाहें भी तो अब उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते या जवाहरलाल नेहरू पर फेंके गए पत्थरों का गुरुत्वाकर्षण के नियम के मुताबिक पलट कर उनकी अपनी खोपड़ी पर पड़ने का अंदेशा है। यह भी उन्हें नहीं समझ में आता कि वे भले ही विदेशी विज्ञान को कुछ न समझें लेकिन गुरुत्वाकर्षण का नियम इस तरह सत्य साबित होगा और डार्विन को नकार देने से उनके पुरखे नहीं बदल जाएंगे।

अपने इतिहास प्रेम के चलते हमारे देश के लोग कोशिश कर रहे हैं कि वर्तमान को भी इतिहास बना दें। इसी कोशिश को हमारे नेताओं का भी पूरा समर्थन हासिल है। इतिहास के लिए सबसे बड़ी जरूरत खंडहरों की होती है इसलिए नेताओं की कोशिश है कि जितनी भी चलती हुई लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं उन सबको खंडहर बना दिया जाए। इसके अलावा अगर कोई नई संस्था बनती है तो सीधे वह खंडहर के रूप में ही बने ताकि बिना वर्तमान में आए वह सीधे इतिहास में दाखिल हो सके। डीडीए, जीडीए जैसे तमाम कथित विकास प्राधिकरणों को खंडहरों के निर्माण में महारत हासिल है। वही महारत अब हर क्षेत्र में दिखाई दे रही है। यह हमारी महानता है कि सारी दुनिया भविष्य की ओर बढ़ रही है और हमारा देश इतिहास में मिल जाने के लिए कोशिश कर रहा है।

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