दावोस में किसान चिंता

हरवीर सिंह
प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

हरवीर सिंह
इस चुनाव में लोगों को राजनैतिक पार्टियों से जीवन स्तर में सुधार करने के विकल्पों के बारे में पूछना चाहिए, वरना अगले पांच साल भी जाति, धर्म के टंटे में उलझे रह जाएंगे

आजकल देश और दुनिया में बहुत कुछ असामान्य-सा घट रहा है। यही वजह है कि दुनिया के सबसे लक्जरी रिजॉर्ट में शुमार स्विटजरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के तहत राष्ट्र प्रमुखों और दुनिया की सबसे ताकतवर कंपनियों के प्रमुखों की बैठक में इस बार भारत के किसानों का संकट भी मुद्दा बन गया। दिलचस्प यह है कि इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाले नीति आयोग के सीईओ ने कहा कि देश के किसानों और ग्रामीण भारत को मदद आज की जरूरत है। देश के एक प्रमुख उद्योग चैंबर के डायरेक्टर जनरल ने भी कहा कि देश में किसानों की मदद के बिना अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं किया जा सकेगा। यही नहीं, दुनिया भर में आर्थिक सुधारों का एजेंडा लागू करने में मदद करने वाली वैश्विक संस्था इंटरनेशनल मॉनिटरिंग फंड (आइएमएफ) की अध्यक्ष क्रिस्टीना लगार्ड ने भी कहा कि भारत में किसानों की आर्थिक हालत खराब है और उसे सुधारने की जरूरत है। ये तीनों शख्सियतें फिस्कल संतुलन और वित्तीय सुधारों की सबसे बड़ी पैरोकार और सब्सिडी समाप्त करने की हिमायती हैं। इनका एक सुर में किसानों की वित्तीय मदद की बात करना कुछ अटपटा और असामान्य-सा लगता है।

लेकिन देश के मौजूदा राजनैतिक घटनाक्रम और कुछेक महीने बाद 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर यह बात बहुत सामान्य-सी लग रही है। सरकार की ओर से लगातार संकेत आ रहे हैं कि इस बार का अंतरिम बजट अंतरिम से कुछ ज्यादा होने वाला है। इसमें बड़ी कोशिश सबसे बड़े वोट बैंक किसानों की नाराजगी को दूर करने की हो सकती है। इस बात के संकेत हैं कि किसानों के लिए सीधे उनके खाते में पैसे भेजने से लेकर सस्ते कर्ज जैसे कई कदम घोषित किए जा सकते हैं। वैसे, परंपरा है कि अंतरिम बजट में केवल लेखानुदान होता है, बजट तो अगली सरकार पेश करती है। लेकिन मौजूदा सरकार और केंद्रीय नेतृत्व परंपराओं में नहीं, बल्कि नई लीक कायम करने में भरोसा रखता है। इसलिए चुनाव जीतने के लिए केवल किसानों के लिए पैकेज ही नहीं, बल्कि बेहतर आर्थिक मौकों और नौकरी के लिए तरस रहे मध्य वर्ग के लिए आयकर के मोर्चे पर राहत देने जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं।

वैसे भी विपक्ष जिस तरह देशव्यापी गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहा है, उसमें सत्ताधारी दल कुछ तो अलग करेगा। लेकिन भाजपा ने भी 2014 का चुनाव बड़े गठबंधन के साथ ही लड़ा था। इसलिए किसी गठबंधन को केवल अलग पार्टियों का गठजोड़ कहकर और प्रधानमंत्री पद के बहुत सारे दावेदार कहकर खारिज करना जायज नहीं है। दिलचस्प यह है कि देश में 1989 से लेकर अभी तक की गठबंधन सरकारों ने आर्थिक मोर्चे पर सुधारों के ऐसे व्यापक कदम उठाए जो मौजूदा मजबूत और एक पार्टी की बहुमत वाली सरकार नहीं उठा सकी है।

यहां फिर दावोस का एक वाकया। 1997 में प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा दावोस से जिस दिन वापस आए, उस दिन उन्होंने कुछ पत्रकारों को रात के खाने पर बुलाया। यह लेखक भी उन करीब आधा दर्जन चुनिंदा पत्रकारों में शामिल था, जो उस दिन प्रधानमंत्री निवास में करीब दो घंटे उनके साथ थे। दावोस की कारपोरेट दुनिया से लौटे प्रधानमंत्री देश में कृषि से जुड़े मसलों पर बात करना चाहते थे। उन्होंने कहा कि वह किसानों को उर्वरकों पर सब्सिडी दोबारा शुरू करने का फैसला करना चाहते हैं, जो विनियंत्रित किया जा चुका है लेकिन उनके गठबंधन में आर्थिक सुधारों के पैरोकार कुछ सहयोगी इसके खिलाफ थे क्योंकि इसमें राजकोषीय संतुलन बिगड़ने और सब्सिडी बढ़ने का खतरा था। लेकिन प्रधानमंत्री ने कहा कि मैंने अपनी सरकार की परवाह न करते हुए करीब 6,000 करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी देने का फैसला किया। खास बात यह है कि तब किसान उतनी दिक्कत में नहीं था, जितना अब है। मतलब यह कि नेतृत्व का विजन अगर साफ है तो सही फैसले लेना संभव है। यहां यह प्रकरण बताना इसलिए जरूरी है कि यह वही दावोस वाली मानसिकता है, जिसके चलते देश का कृषि संकट बढ़ा है। लेकिन जब दावोस पहुंचने का टिकट मिलने की संभावनाएं भी खत्म होती दिखें तो किसानों के ऊपर होने वाले खर्च को अर्थव्यवस्‍था को गति देने वाला बताना ही पड़ता है।

दावोस के पहले ही ऑक्सफाम की वह रिपोर्ट भी आई है जिसके मुताबिक हमारे देश में भी अमीरों की संपत्ति गरीबों से कई गुना बढ़ रही है। इसलिए मौका है कि देश के मतदाता राजनैतिक दलों से उनका एजेंडा पूछें, उनसे इस गैर-बराबरी के बढ़ने का कारण जानें और इसे कम करने का फार्मूला बताने को कहें। आम चुनाव इसका बेहतर मौका है। केवल एक पार्टी और गठबंधन की बुराई कर चुनाव जीतने की कोशिशों को रोककर लोगों को अपने जीवन को बेहतर करने के विकल्पों के बारे में पूछना चाहिए। वरना फिर जाति, धर्म और क्षेत्रीयता में बांटकर पार्टियां पांच साल के लिए सत्ता हासिल करेंगी और देश कुछ पीछे चला जाएगा।

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