जिताऊ माने खूब खर्चो

जगदीप एस. छोकर
केंद्रीय चुनाव आयोग
केंद्रीय चुनाव आयोग

जगदीप एस. छोकर
चुनावों में धनबल का इस्तेमाल तब तक नहीं रुकेगा जब तक उम्मीदवारों का चयन स्‍थानीय स्तर पर न हो

जैसे-जैसे 2019 के लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, देश में चुनावी चर्चा गरम हो रही है। जब चुनाव की चर्चा होती है, तो स्वाभाविक है कि चुनावी खर्चे और चुनावी चंदे की चर्चा भी होगी। अनुमान लगाए जा रहे हैं कि चुनाव में कितना खर्चा होगा, उसके लिए पैसे कहां से आएंगे। इन सवालों के जवाब वास्तव में तो किसी के पास नहीं हैं, लेकिन फिर भी अनुमानों की कमी नहीं है।

इन प्रश्नों के सही उत्तर न मिलने के कारणों को समझने के लिए कुछ गहराई में जाना होगा। चुनावी खर्चे का पता लगाने के दो प्रमुख स्रोत हैं- उम्मीदवारों द्वारा दिए गए चुनावी खर्चे के शपथ पत्र और राजनैतिक दलों द्वारा दिए गए चुनावी खर्चे के शपथ पत्र। 2009 के लोकसभा चुनाव में चुनाव और राजनीतिक सुधारों पर काम करने वाली संस्था, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने 6753 उम्मीदवारों के चुनावी खर्चों के शपथ पत्रों का विश्लेषण किया। इससे पता चला कि केवल चार उम्मीदवारों ने कहा कि उन्होंने खर्चे की उच्चतम सीमा से अधिक खर्च किया और 30 ने कहा कि उन्होंने सीमा का 90-95 प्रतिशत खर्च किया। अब बचे 6719 यानी 99.5 प्रतिशत उम्मीदवार। इन सभी ने कहा कि उन्होंने सीमा का 45 से 55 प्रतिशत ही खर्च किया। इन आंकड़ों को इस संदर्भ में देखना चाहिए कि नेता लगातार कहते रहते हैं कि चुनाव खर्च की सीमा बहुत कम है और उसे बढ़ाना चाहिए।

इन आंकड़ों को देखने के बाद एक सेवानिवृत मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि इनको देखते हुए तो खर्च की सीमा बढ़ाने के बजाय, कम कर देनी चाहिए! एक तथ्य यह भी है कि एक प्रमुख राजनैतिक नेता (जिनकी मृत्यु हो चुकी है) ने 2014 के लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले एक बड़ी जनसभा में कहा था कि उन्होंने 2009 के लोकसभा के चुनाव में आठ करोड़ रुपये खर्च किए थे।

जब उनका 2009 के लोकसभा के चुनावी खर्चे का शपथ पत्र देखा गया, तो उसमें उन्होंने खर्च 19.37 लाख रुपये का ही जिक्र किया था। अब आएं राजनैतिक दलों पर। उन्हें भी चुनाव में खर्च का ब्योरा देना होता है और वह भी शपथ पत्र के जरिए। उम्मीदवार भी अपने शपथ पत्र में बताते हैं कि उनको उनके दल ने कितना पैसा दिया। ये दोनों आंकड़े अक्सर आपस में मिलते नहीं हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों में से कम-से-कम एक तो झूठ बोल ही रहा है!

यह साफ है कि चुनाव में वास्तव में कितना खर्चा होता है, इसका पता लगाना सामान्य रूप से असंभव है। केवल अनुमान या सही कहें तो अटकलें ही लगाई जा सकती हैं। राजनैतिक दल अपने खर्च और आय छिपाने के लिए किस हद तक जा सकते हैं, इसका बहुत महत्वपूर्ण उदहारण सूचना अधिकार कानून से मिलता है। केंद्रीय सूचना आयोग की एक संपूर्ण पीठ ने तीन जून 2013 को एकमत से निर्णय लिया कि छह राष्ट्रीय राजनैतिक दल सूचना का अधिकार कानून के अनुच्छेद 2(एच) में दी हुई सभी शर्तों को पूरा करते हैं, इसलिए ये सूचना का अधिकार कानून के तहत सार्वजनिक संस्थान हैं। आयोग ने यह निर्देश भी दिया कि इन दलों को छह सप्ताह के अंदर अपने सूचना अधिकारी नियुक्त करने चाहिए और सूचना मांगने वाली याचिकाओं के जवाब देने चाहिए। ये दल हैं- कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भाकपा और माकपा।

"दलों और उम्मीदवारों को शपथ पत्र में चुनावी खर्चे का ब्योरा देना होता है, लेकिन दोनों के ब्योरे के आंकड़े अक्सर आपस में मिलते नहीं हैं"

लोगों को यह जान कर शायद आश्चर्य हो कि एक भी दल ने देश की सूचना का अधिकार की सबसे बड़ी संस्था के इस निर्देश को नहीं माना। केंद्रीय सूचना आयोग से शिकायत की गई कि कोई भी दल उनके आदेश का पालन नहीं कर रहा है, तो आयोग ने छहों दलों को नोटिस भेजे। सभी दलों ने नोटिस का जवाब तक नहीं दिया। फिर कारण बताओ नोटिस भेजे गए। उसका भी जवाब नहीं मिला। अत्यंत खेद के साथ यह लिखना पड़ रहा है कि केंद्रीय सूचना आयोग ने 16 मार्च 2015 को निर्णय दिया कि वह अपने सही और कानून-युक्त निर्णय को लागू करवाने में असमर्थ है। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका 19 मई 2015 को दाखिल की गई थी, लेकिन अभी तक उसकी पूरी सुनवाई नहीं हुई है।

इससे दो प्रश्न उठते हैं—चुनावों में इतना ज्यादा खर्च क्यों होता है और राजनैतिक दल उसे छिपाना क्यों चाहते हैं?

ज्यादा खर्च की वजहें

संक्षेप में कहा जाए तो चुनाव में इतना अधिक खर्च होने का मूल कारण उम्मीदवारों के चयन का तरीका है। यह शायद कुछ अटपटा लगता है, इसलिए इसे विस्तार से समझने की आवश्यकता है। वास्तविकता यह है कि आजकल किसी भी चुनाव में जीतने के लिए एक बड़े राजनैतिक दल का टिकट लेना जरूरी हो गया है। सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनाव में भाग ले सकते हैं, लेते भी हैं और कभी-कभी जीतते भी हैं। लेकिन इसमें दो बातें याद रखने की हैं। पहली बात यह कि चुने जाने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उदहारण के तौर पर, वर्तमान लोकसभा में केवल चार निर्दलीय सदस्य हैं। दूसरी बात यह कि निर्दलीय सांसदों या विधायकों का संसद या विधानसभा की कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ता। अगर पड़ता भी है, तो वह महत्वपूर्ण नहीं होता।

राजनैतिक दल टिकट देने के लिए उम्मीदवारों का चयन कैसे करते हैं, यह शायद देश के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है। आम तौर पर सभी दल कहते हैं कि वे जिताऊ उम्मीदवारों को टिकट देते हैं, पर यह किसी को नहीं पता कि जिताऊ की परिभाषा क्या है। यह तय है कि जिताऊ उम्मीदवार के पास चुनाव में खर्च करने के लिए पर्याप्त धन राशि होनी चाहिए या उसके पास धन राशि एकत्रित करने के साधन होने चाहिए। अगर उम्मीदवार अपने चुनाव पर पर्याप्त खर्च करने के अलावा टिकट देने वाले दल या दल के नेता को, अच्छी रकम दे सके तो सोने पर सुहागा हो जाता है। राजनैतिक दलों का संकट यह है कि अपने चुनाव में मोटी रकम लगाने और दल को अच्छा खासा पैसा देने वालों की कमी नहीं है। इनमें से चयन करने के लिए दल के नेता अपनी मर्जी से फैसला करते हैं। तो, यह स्पष्ट है कि उसके चुनाव में विजयी होने का केवल एक ही तरीका है और वह पैसा है। यह चुनाव में ज्यादा खर्च का असली और मूल कारण है।

अब सवाल उठता है कि इसका क्या इलाज है। अगर कोई करना चाहे, तो इलाज बहुत सरल है। उसके लिए राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र प्रणाली अनिवार्य करनी होगी। इसे कारगर करने के लिए, उम्मीदवारों का चयन उस क्षेत्र के भावी उम्मीदवारों के बीच से (जिसको आंतरिक चुनाव कहा जाएगा) और जिसमें उस क्षेत्र में दल के सदस्यों को मतदान का अधिकार हो, उनके द्वारा किया जाना चाहिए। इसका परिणाम यह होगा कि चयनित उम्मीदवार अपने दल के सदस्यों और मतदाताओं का कृतज्ञ होगा, न कि टिकट देने वाले नेता का। इस लोकतांत्रिक प्रणाली से चयनित उम्मीदवार को ज्यादा पैसा खर्च करने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी। लेकिन राजनैतिक दलों की इसमें कोई रुचि नहीं है।

खर्च छिपाने का कारण

खर्च की सही रकम न बताने के दो मुख्य कारण हैं। पहला तो यह कि उम्मीदवारों के अधिकतम खर्च की एक सीमा निर्धारित है। इस सीमा को तय करने के लिए निर्वाचन आयोग सरकार से सिफारिश करता है। यदि कोई उम्मीदवार इस सीमा से अधिक खर्च करते हुए पाया जाता है, तो उसका चुनाव रद्द किया जा सकता है। यह याद रखना चाहिए कि उम्मीदवारों के चुनाव खर्च की तो अधिकतम सीमा है, पर राजनैतिक दलों के चुनाव खर्च पर कोई अधिकतर सीमा निर्धारित नहीं है।

इसका मतलब है कि राजनैतिक दल चुनाव पर जितना मर्जी खर्च कर सकते हैं। फिर भी वह अपने शपथ पत्रों में पूरा खर्च नहीं दिखाते हैं। इसके भी दो कारण हैं- अवैध खर्च या अवैध कामों पर खर्च और काला धन।

चुनाव के दौरान उम्मीदवार और राजनैतिक दल बहुत से ऐसे काम करते हैं, जिन्हें नहीं करना चाहिए। इनमें कुछ तो ऐसे होते हैं जिनको चुनाव प्रचार में करना आदर्श आचार संहिता के अंतर्गत बिलकुल मनाही है। कुछ ऐसे होते हैं जो कानून के खिलाफ हैं। ऐसे कार्यों के लिए आमतौर पर काले धन का प्रयोग होता है, जिसे शपथ पत्र में दिखाने का प्रश्न ही नहीं उठता।

क्या है समाधान

चुनाव खर्च को नियंत्रण में लाने का सर्वाधिक चर्चित समाधान यह है कि चुनाव खर्च सरकार करे, जिसे “स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन” कहा जाता है। इसके समर्थन में इंद्रजीत गुप्ता समिति की रिपोर्ट का उल्लेख किया जाता है। इस संदर्भ में दो-तीन बातें महत्वपूर्ण हैं। सबसे पहले तो इसे “स्टेट फंडिंग” का नाम देना सही नहीं है। “स्टेट फंडिंग” का अर्थ निकलता है “सरकारी पैसा”। हमारे देश में प्रचलित है कि जो कुछ भी सरकारी है, वह मुफ्त है। एक राजनैतिक नेता ने तो अपने कार्यकर्ताओं को नारा दिया था “जो जमीन सरकारी है, वह हमारी है”। अगर “स्टेट फंडिंग” के बजाय इसे “पब्लिक फंडिंग” कहा जाए तो आम लोगों को लगेगा कि जो पैसा चुनाव लड़ने के लिए राजनैतिक दलों और उम्मीदवारों को दिया जाएगा, वह जनता का यानी उनका अपना है।

"चुनावी खर्च तभी नियंत्रित हो सकता है, जब दलों के कामकाज के तौर-तरीकों में सुधार हों। इसके लिए कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखती"

दूसरा प्रश्न है कि चुनाव लड़ने के लिए राजनैतिक दलों और उम्मीदवारों को कितना अनुदान दिया जाए। इसका सीधा तरीका तो है कि जितने पैसे राजनैतिक दल और उम्मीदवार चुनाव में खर्च करते हैं, वह सारा या उसका कुछ हिस्सा उन्हें अनुदान के तौर पर दे दिया जाए। इसमें कठिनाई यह है कि राजनैतिक दल और उम्मीदवार चुनाव पर सही में कितना खर्च करते हैं, ये तो किसी को भी पता नहीं है और न ही राजनैतिक दल और उम्मीदवार सच बताने को लिए राजी हैं। जब कितना पैसा देना चाहिए, इसको पता करने का कोई ऐतिहासिक या तार्किक आधार नहीं है, तो पैसा कैसे दिया जाए। तीसरी अड़चन यह है कि अगर जनता का पैसा चुनाव लड़ने के लिए राजनैतिक दलों और उम्मीदवारों को दिया जाएगा, तो स्वाभाविक है कि उनको अन्य स्रोतों से पैसा या चंदा लेने की छूट नहीं होगी। इसके लिए भी कोई राजनैतिक दल तैयार नहीं है।

इसमें दो राय नहीं कि वास्तविक रूप में देखें तो चुनावी खर्चे को नियंत्रित करने के केवल दो ही तरीके हैं। एक तो राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतांत्रिक प्रणाली लागू करना और दूसरा राजनैतिक दलों में वित्तीय पारदर्शिता लागू करना। ये दोनों सुझाव नए नहीं हैं। भारतीय विधि आयोग ने मई 1999 में अपनी 170वीं रिपोर्ट तत्कालीन सरकार को दी थी। इस रिपोर्ट में इन दोनों के बारे में विस्तार से जिक्र किया गया है। इस रिपोर्ट को आजतक किसी भी सरकार ने संसद में पेश करने की जरूरत महसूस नहीं की! विधि आयोग की रिपोर्ट के बाद भी कई समितियों और आयोगों ने इन दोनों सुझावों का समर्थन किया। इनमें न्यायाधीश वेंकटचलैया की अध्यक्षता में गठित संविधान समीक्षा हेतु बनाए गए आयोग की रिपोर्ट भी शामिल हैं। लेकिन कोई भी राजनैतिक दल ये दोनों काम करने के लिए राजी नहीं है।

चुनाव में बहुत ज्यादा खर्च होना लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। खर्च तभी नियंत्रित हो सकता है, जब राजनैतिक दलों के कामकाज करने के तौर-तरीकों में मौलिक सुधार हों।

राजनैतिक दलों में न तो यह सुधार करने की कोई इच्छाशक्ति दिखाई देती है और न ही उसकी कोई आशा करना व्यावहारिक लगता है। बार-बार देखा गया है कि अगर कोई भी इस दिशा में प्रयास करने के लिए छोटा कदम उठाने की कोशिश करता है, सारे दल विरोध करने लगते हैं। ऐसे में निराशावाद स्वाभाविक है। बहुत तलाशने पर आशा की केवल एक ही हल्‍की किरण दिखाई देती है, वह है नागरिक समाज, न्यायपालिका और पत्रकार समूह। अगर यह तीनों मिल कर प्रयत्न करें तो लोकतंत्र की इस भयानक कमजोरी का पूरी तरह अंत न सही, लेकिन कुछ कम किया जा सकता है।

(लेखक आइआइएम-अहमदाबाद के सेवानिवृत प्रोफेसर और डीन हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं)

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