हर समीकरण का उत्तर देगा यही प्रदेश

लखनऊ से लौटकर हरवीर सिंह
शह और मातः साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में गठबंधन का ऐलान करतीं मायावती और अखिलेश यादव
शह और मातः साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में गठबंधन का ऐलान करतीं मायावती और अखिलेश यादव
नईम अंसारी

लखनऊ से लौटकर हरवीर सिंह
सपा-बसपा गठबंधन सत्तारूढ़ भाजपा को महती चुनौती, दिल्ली गद्दी की राहें तय करेगा यही गणित

जब आप देश के सबसे बड़े राज्य की राजधानी लखनऊ में प्रवेश करते हैं तो यहां की हवा में घुली राजनीति का एहसास आपको होने लगता है। राजनैतिक दांव-पेच, राजनैतिक रसूख और राजनीति के जरिए सत्ता के दोहन का एहसास यह शहर हर पल आपको कराता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि यह देश में सबसे अधिक 80 लोकसभा सीटों वाला राज्य तो है ही, यह बेहद पेचीदा जातिगत और क्षेत्रीय समीकरणों वाला राज्य भी है। इसमें एक नहीं चार राज्य बसते हैं और उसी तरह यहां की राजनीति भी बंटी हुई है। आने वाले लोकसभा चुनावों में यह राज्य देश की सत्ता तय करने जा रहा है, इसमें कोई संशय नहीं होना चाहिए और वह भी तब जब सारी कटुता भुलाकर 25 साल बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने चुनाव पूर्व गठबंधन कर लिया है। कमान अब दूसरी पीढ़ी के हाथों में है। 1993 के पिछले गठबंधन के बाद अब मुलायम सिंह यादव और कांशीराम की जगह अखिलेश यादव और मायावती ने ले ली है। वैसे दोनों पूर्व मुख्यमंत्री भी हैं और अपनी पार्टियों के सर्वेसर्वा भी हैं। सत्ता में होने के चलते दोनों पार्टियों के कार्यालयों और नेतृत्व के आवास भी इसके गवाह हैं कि यहां सत्ता की ताकत बहुत मजबूत रही है।

12 जनवरी को साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में मायावती और अखिलेश यादव ने दोनों पार्टियों के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की। दोनों ने बराबरी के साथ 38-38 लोकसभा सीटों के बंटवारे का भी ऐलान किया। बाकी चार सीटों में दो अमेठी और रायबरेली में कांग्रेस के सामने प्रत्याशी नहीं उतारने का फैसला लिया गया। दो सीटें दूसरे दलों के लिए छोड़ दी गईं। जाहिर है, इस गठबंधन के लिए वोटों का गणित काफी मजबूत है और राज्य व केंद्र में सत्ताधारी भाजपा के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती है। 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य में सपा को 22.2 फीसदी और बसपा को 19.6 फीसदी वोट मिले थे। इन दोनों के मतों को मिला दें तो यह 41.8 फीसदी हो जाता है। उस चुनाव में बसपा का खाता नहीं खुला था, जबकि सपा को पांच सीटें मिली थीं। भाजपा और उसके सहयोगी अपना दल को राज्य की 73 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल हुई थी। उस चुनाव में भाजपा को 42.3 फीसदी वोट मिले थे। जबकि कांग्रेस को 7.5 फीसदी और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) को 0.8 फीसदी व अपना दल को एक फीसदी वोट मिला था।

वोटों का यह गणित भाजपा के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि रालोद भले ही घोषणा के समय से गठबंधन में नहीं है, लेकिन देर-सबेर उसके सपा-बसपा गठबंधन में आने की संभावना बहुत ज्यादा है। इसके पहले कैराना लोकसभा के उपचुनाव में रालोद प्रत्याशी ने सपा और बसपा के परोक्ष समर्थन से जीत हासिल की थी। फिर, 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह लहर नहीं है जो 2014 में थी। इसलिए सबसे ज्यादा दिलचस्प मुकाबला उत्तर प्रदेश में होने जा रहा है।

सपा-बसपा गठबंधन को लेकर भाजपा के एक बड़े रणनीतिकार कहते हैं, “यह गठबंधन आधी-आधी सीटों का है। बाकी सीटों पर जहां इन पार्टियों का अपना प्रत्याशी नहीं होगा, वहां पार्टी के सभी समर्थक दूसरे सहयोगी को वोट करेंगे, इसकी गुंजाइश बहुत कम है। इसके अलावा, इन पार्टियों में पांच साल से चुनाव की तैयारी कर रहे संभावित प्रत्याशी कहां जाएंगे, यह भी देखना होगा। उसका फायदा हमें मिलेगा।” हालांकि वे स्वीकारते हैं कि गठबंधन से हमें नुकसान होगा लेकिन हम पुख्ता रणनीति के जरिए इस नुकसान को कम करेंगे। “हमारे पास 20 लाख कार्यकर्ता हैं, जो हर बूथ पर मौजूद हैं। हम केंद्र की लोक कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों तक सीधे पहुंच रहे हैं। इसका हमें फायदा होगा।”

दिलचस्प बात यह है कि राज्य की नौकरशाही को इन लाभार्थियों का पूरा ब्योरा इकट्ठा करने का निर्देश केंद्र ने दिया था। सूत्रों का कहना है कि यह ब्योरा पार्टी के साथ साझा किया गया है। इसके साथ ही जिस तरह से भाजपा में बैठकों का दौर शुरू हुआ है, वह साबित करता है कि पार्टी तेजी से जमीनी स्तर पर सक्रिय हो गई है। सपा-बसपा गठबंधन के कुछ दिन बाद ही उत्तर प्रदेश के प्रभारी बनाए गए केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और राज्य के भाजपा पदाधिकारियों और मंत्रियों की मैराथन बैठक हुई। इसलिए उक्त रणनीतिकार के दावों को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। वैसे भाजपा के पदाधिकारियों का दावा है कि सपा और बसपा जाति व नेता केंद्रित पार्टियां हैं, जबकि भाजपा काडर आधारित पार्टी है। साथ ही उत्तर प्रदेश में पार्टी ने केवल शहरी और उच्च वर्ग की पार्टी के तमगे से मुक्ति पा ली है, क्योंकि जहां हमारी पहुंच हर गांव के बूथ तक हुई है वहीं, हर जाति को हमने पार्टी और सरकार में प्रतिनिधित्व दिया है।

"यह नहीं भूलना चाहिए कि जातिगत वोटों का गणित ही सीटें तय नहीं करेगा, बल्कि कई पहलू और भी हैं"

सपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का कहना है कि हम अगले कुछ दिनों में ही अपने प्रत्याशी तय करने जा रहे हैं। सीटों को लेकर स्थिति लगभग साफ हो चुकी है। हालांकि वे इस बात को स्वीकारते हैं कि इस गठबंधन में सपा को ज्यादा लचीला रुख अपनाना पड़ा है। यही वजह है कि गठबंधन की घोषणा के दिन रालोद को  बाहर रखने के बाद की असहज स्थिति को संभालने की कोशिश सपा ही कर रही है। सपा के उक्त पदाधिकारी का कहना है कि हम कोशिश करेंगे कि रालोद गठबंधन का हिस्सा रहे। ऐसे में सपा बागपत, मुजफ्फरनगर और मथुरा की सीटें रालोद को देने का मन बना रही है। वहीं, कैराना की सीट को लेकर संशय है। रालोद के एक नेता का कहना है कि हम पांच सीटें मांग रहे हैं लेकिन चार पर भी सहमत हो सकते हैं। हमारा भला इसी गठबंधन के साथ है।

रालोद का गठबंधन में रहना उसके लिए फायदेमंद है, क्योंकि अजित सिंह के नेतृत्व वाले रालोद को दर्जन भर से अधिक सीटों पर जाट वोटों का समर्थन रहता है। पश्चिम की इन सीटों पर सपा का ज्यादा मजबूत आधार नहीं है। हालांकि, पश्चिम में मायावती अपना मजबूत आधार मानती हैं और इसलिए रालोद को ज्यादा ताकत देने में उनकी दिलचस्पी नहीं है। जबकि, मुजफ्फरनगर दंगों की पृष्ठभूमि में हुए 2014 के लोकसभा चुनावों में जाट-मुस्लिम गठजोड़ टूटने का खामियाजा भुगत चुके रालोद अध्यक्ष अजित सिंह और उनके बेटे पार्टी उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने इस गठजोड़ को जोड़ने के लिए पिछले कई साल में काफी मशक्कत की और कैराना लोकसभा सीट में रालोद प्रत्याशी की जीत से इसके फिर से जिंदा होने की संभावनाओं को बल मिला है।

पूर्वांचल में सपा-बसपा गठबंधन कुछ छोटी पार्टियों निषाद पार्टी और अपना दल के एक धड़े को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर के भाजपा नेतृत्व और राज्य की सरकार को लेकर आ रहे तल्ख बयानों में भी वह संभावना देख रही है। लेकिन भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का कहना है कि राजभर राज्य में मंत्री हैं। वे अपने हिस्सेदारी के दावे को मजबूत करने के लिए इस तरह के बयान देते हैं और अंततः वे भाजपा के साथ ही रहेंगे।

लेकिन इस दिलचस्प समीकरण के बावजूद यह बात भी साफ है कि बसपा का वोटबैंक तो पूरी तरह उसके साथ रहेगा। भाजपा की एक विधायक का मायावती को लेकर दिया गया हालिया बयान भी इसे और पुख्ता करेगा। लेकिन यह बात भी सही है कि अभी भी जिस तरह के किलेनुमा घर में मायावती रहती हैं और उससे उनके समर्थकों से दूरी बरकरार है। अखिलेश यादव कार्यकर्ताओं और पार्टी पदाधिकारियों के साथ ज्यादा मिलना-जुलना कर रहे हैं।

गठबंधन से बाहर रह गई कांग्रेस ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। वैसे पार्टी अमेठी, रायबरेली के अलावा प्रतापगढ़, कानपुर, पडरौना, सहारनपुर जैसी करीब दर्जन भर सीटों पर असर दिखाने की उम्मीद कर रही है।

भाजपा अपने कार्यकर्ताओं की ताकत और केंद्रीय योजनाओं के लाभार्थियों के अलावा भी कई तरह से सक्रिय है। उसका हिंदुत्व एजेंडा भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में मजबूती के साथ काम कर ही रहा है। आने वाले दिनों में अयोध्या में राममंदिर के मुद्दे पर भी भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस और दूसरे सहयोगी संगठनों की सक्रियता देखने को मिल सकती है। लेकिन राज्य में गन्ना मूल्य भुगतान को लेकर किसानों की नाराजगी, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और आवारा पशुओं की समस्या राज्य सरकार के लिए मुश्किलें पैदा करेगी और इसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ सकता है।

गठबंधन को लेकर सपा-बसपा कितनी उत्साहित हैं, यह अखिलेश यादव के कोलकाता में ममता बनर्जी की 'यूनाइटेड इंडिया' रैली में दिए गए उस बयान में दिखता है जिसमें उन्होंने कहा है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को शून्य सीट मिलेगी। लेकिन इस अति उत्साह में उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा ने गठबंधन से लड़ने की रणनीति पर अमल शुरू कर दिया है। इसलिए केवल जातिगत वोटों का गणित ही 2019 की लोकसभा सीटें तय नहीं करेगा, और बहुत कुछ है, जो नतीजों को प्रभावित करेगा।

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से