सबका साथ, सबको आरक्षण

हरवीर सिंह
संसद से सामान्य वर्ग को आरक्षण देने का विधेयक पास
संसद से सामान्य वर्ग को आरक्षण देने का विधेयक पास

हरवीर सिंह
घटती सरकारी नौकरियों और बरसों तक लाखों पदों को न भरने की केंद्र और राज्य सरकारों की लापरवाही के बीच यह कदम कितने लोगों को फायदा पहुंचा पाएगा? लेकिन चुनाव जीतने के लिए सब कुछ जायज जो है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर अंतिम दौर में दबाव बढ़ता जा रहा है। यही वजह है कि देश में 1990 के करीब तीस साल बाद आरक्षण का दांव खेला गया है। दिलचस्प बात यह है कि उस समय भाजपा और आरएसएस के अनुषंगी संगठनों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर बनाने का दांव खेला था। क्योंकि प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़ी मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया था। इसके चलते मंदिर के बजाय सारी शक्तियां आरक्षण के विरोध में जुट गई थीं। दिलचस्प यह है कि भाजपा तब आरक्षण का विरोध कर रही थी। पिछले दिनों भी आरएसएस प्रमुख समेत कई लोगों के ऐसे बयान आए जो आरक्षण को लेकर नई बहस शुरू करने की तरफ इशारा कर रहे थे। हालांकि राजनैतिक नुकसान की आशंका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आश्वस्त करते रहे कि आरक्षण से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।

फिर आरक्षण का दांव क्यों? इसको लेकर कई तर्क हैं। एक तो सरकार आर्थिक मोर्चे, किसानों की नाराजगी और घटते रोजगार अवसरों जैसे मुद्दों को लेकर काफी चिंतित है। साथ ही लगातार न्यायालय और संसद में भी कई ऐसे पेचीदा मामले हैं जो उसे परेशान कर रहे हैं। राफेल सौदे को लेकर विपक्ष सरकार पर हमलावर है। सीबीआइ प्रमुख को आधी रात हटाए जाने के सरकार के फैसले को रद्द करके सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा को फिर से कुर्सी सौंप दी। इतनी प्रतिकूल राजनैतिक परिस्थितियों के बीच नरेंद्र मोदी सरकार को किसी मास्टरस्ट्रोक की दरकार थी। इसीलिए रातोरात सामान्य वर्ग को आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला कैबिनेट ने लिया। इसे अगले ही दिन लोकसभा और राज्यसभा में पारित करा लिया गया।

अब बड़ा प्रश्न है कि यह सब इतना अचानक और तेजी से क्यों हो गया। इसके पीछे हाल के राज्य विधानसभा चुनाव हैं, जिनमें भाजपा तीन राज्यों में सत्ता से बेदखल हो गई। इसमें एक वजह उच्च जातियों की नाराजगी भी मानी जा रही है। एससी-एसटी कानून को कुछ नरम करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद दलित नाराजगी दूर करने के लिए केंद्र सरकार संशोधन बिल ले आई। इससे उच्च जातियां भाजपा से नाराज हो गईं। इसके अलावा महाराष्ट्र में मराठा, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाट और गुजरात में पाटीदार जैसी खेतिहर जातियां आरक्षण की मांग कर रही हैं। इन्हें सरकार ओबीसी में आरक्षण देने की बात करती तो वहां पहले से मौजूद जातियां विरोध कर रही थीं। अतिरिक्त आरक्षण देने की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी केस में इसकी सीमा 50 फीसदी रखने का फैसला दे रखा है। इसलिए अतिरिक्त आरक्षण का कोई कदम कानून की कसौटी पर नहीं टिक सकता। 1992 में नरसिंह राव सरकार और 2014 में जाटों को आरक्षण देने की यूपीए सरकार की कोशिश इस कसौटी पर खरी नहीं उतरी।

अब सरकार इस कोशिश में है कि संविधान संशोधन के जरिए इसे न्यायालय की समीक्षा से दूर रखा जाए। चुनाव के मद्देनजर लोकसभा और राज्यसभा में अधिकांश दलों ने इसका समर्थन कर दिया और इसने दो-तिहाई समर्थन की शर्त पूरी कर ली है। अब मामला राज्यसभा में है। इसे कम से कम 10 विधानसभाओं में भी पारित कराना होगा। यह लंबी प्रक्रिया है।

असल में मोदी सरकार 'सबका साथ सबका विकास' के नारे और 'अच्छे दिन' लाने के वादे के साथ सत्ता में आई थी। इसमें एक बड़ा नारा हर साल दो करोड़ नए रोजगार देने का भी था। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों का अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ा और रोजगार के अवसर घट गए। सीएमआइई की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि 2018 में एक करोड़ दस लाख नौकरियां घट गईं। ऐसे में, केवल दस फीसदी आरक्षण से समस्या कैसे हल होगी। फिर सामान्य वर्ग को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के लिए आठ लाख रुपये सालाना आय और पांच एकड़ जमीन की उदार शर्तें रखी गई हैं। इससे करीब 95 फीसदी आबादी आरक्षण की पात्र हो जाएगी। लेकिन बिना नौकरियों के यह आरक्षण मृग मरीचिका ही साबित होने वाला है।

दूसरे, अभी तक आरक्षण की व्यवस्था शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर है, लेकिन यह आर्थिक आधार पर आरक्षण की शुरुआत है। इससे जाति आधारित जनगणना के आंकड़ों के आधार पर आरक्षण की मांग भी जोर पकड़ेगी। इसलिए यह नए आंदोलन और विवाद भी पैदा करेगा।

सरकार ने एक तरह से मान लिया है कि उसकी विकास योजनाएं गरीबों का खयाल नहीं रख पा रही हैं, इसलिए सामान्य वर्ग को भी आरक्षण दिया जाए। लेकिन घटती सरकारी नौकरियों और बरसों तक लाखों पदों को न भरने की केंद्र और राज्य सरकारों की लापरवाही के बीच यह कदम कितने लोगों को फायदा पहुंचा पाएगा। फिर, सरकार अगर सहमत थी तो फैसला लेने में उसने कार्यकाल के अंतिम महीनों तक इंतजार क्यों किया। लेकिन चुनाव जीतने के लिए सब जायज है। अब कहा जा सकता है कि सरकार का नारा है सबका साथ, सबको आरक्षण।

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