राजनैतिक असंतोष की लहर

संदीप कुमार, सुहास पलशिकर और संजय कुमार
जीत का जोश
जीत का जोश
सुरेश के पांडे

संदीप कुमार, सुहास पलशिकर और संजय कुमार
नतीजों से निकले आगामी लोकसभा चुनाव के संकेत, भाजपा और कांग्रेस के साथ क्षत्रपों की भूमिका होगी अहम

उत्तर और पूर्वोत्तर भारत के चार राज्यों में सरकारें बदल गईं। सभी ने इन नतीजों को लेकर स्पष्ट रूप से राजनीतिक असंतोष के मिजाज का अंदाजा लगाया। हालांकि राजनीतिक क्षितिज पर एक महत्वपूर्ण अपवाद भी नजर आया। सुदूर दक्षिण में नए बने राज्य तेलंगाना में मतदाताओं ने सत्तारूढ़ पार्टी के लिए बहुमत से भी अधिक वोट दिया। इनमें अहम बात रही कि इन नतीजों ने तीन खास रुझानों का संकेत दिया। अंत में नतीजों का संदेश यह है कि अहम मुद्दों पर सरकार के कामकाज के बारे में जन धारणा वोट देने के फैसले में अहम भूमिका निभाई। सभी सरकारों के खिलाफ ‘सत्ता विरोधी रुझान’ ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कोई भी राजनीतिक दल इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा। अंत में, यह भी अहम रहा कि केंद्र और राज्य सरकार अक्सर अलग-अलग मुद्दों और एजेंडों पर चुनी जाती हैं। फिर भी, हर चुनाव में राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दे दोनों महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भाजपा सरकारें मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपना तीसरा कार्यकाल पूरा कर रही थीं। राजस्थान में पार्टी पांच साल सत्ता में रहने के बाद चुनावी मैदान में थी। भाजपा केंद्र में भी चार साल पूरा कर चुकी है और इस साल मई के अंत में लोकनीति द्वारा किए गए सर्वे मूड्स ऑफ द नेशन (एमओएनएस) में सरकार के प्रति नाराजगी के संकेत साफ तौर पर दिखाई देने लगे थे। इस तरह, भाजपा न सिर्फ राज्य स्तर पर सरकार का बचाव कर रही थी, बल्कि मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए केंद्र सरकार और नेतृत्व की उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रही थी। इस लिहाज से हार भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा करेगी, जो केंद्रीय स्तर पर इसके प्रदर्शन में दिखाई दिया। साथ ही, इसका सबसे बड़ा असर आगामी लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिलेगा।

दूसरी तरफ कांग्रेस पिछले विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनाव में इन तीनों राज्यों में इस कदर हाशिए पर थी कि इस बार लचर प्रदर्शन से पार्टी के अस्तित्व पर व्यापक असर पड़ता। हालांकि, अंततः यह वापसी करने में सफल रही। भले ही राजस्थान या एमपी में बहुत प्रभावशाली प्रदर्शन नहीं रहा। मिजोरम में दो कार्यकाल के बाद सत्ता को बरकरार नहीं रख सकी। वहां, कांग्रेस अपने पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी एमएनएफ से हार गई, जो एनडीए का सहयोगी रहा है। कांग्रेस तेलंगाना में भी सत्ता में आने में विफल रही। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को ‘महाकुटमी’ यानी कांग्रेस, तेलुगूदेशम पार्टी (तेदेपा) और वामपंथी दलों के गठबंधन का सामना करना पड़ा। इस नवगठित राज्य में भी राष्ट्रीय मुद्दों के साथ विकास के मुद्दे चुनावी बहस में हावी रहे।

छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भाजपा की हार में एक महत्वपूर्ण वजह मुख्य रूप से राज्य सरकार और केंद्र सरकार के साथ मतदाताओं की संतुष्टि का स्तर रहा। इन तीनों राज्यों के लिए लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि राज्य सरकार के खिलाफ असंतोष बहुत अधिक था। इसके साथ-साथ यह भी था कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार से मतदाता कम खुश थे। हालांकि, राजस्थान में केंद्र सरकार के प्रति अधिक नाराजगी नहीं थी, लेकिन राज्य सरकार के खिलाफ असंतोष की वजह से वह सत्ता में नहीं आ पाई। दूसरी तरफ तेलंगाना में, मौजूदा टीआरएस सरकार के प्रदर्शन की वजह से उसे मतदाताओं का साथ मिला, जबकि वही मतदाता भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार की आलोचना करते थे। सर्वे के नतीजे स्पष्ट रूप से राज्य स्तर पर (राष्ट्रीय स्तर पर भी) सरकार के प्रदर्शन के प्रति लोगों की धारणाओं को बतलाते हैं कि वे किसके लिए मतदान करना चाहते हैं।

सभी राज्यों में लोगों की मुख्य समस्याएं एक-समान ही दिखाई देती हैं। विकास के मुद्दे, रोजगार के सीमित अवसर और महंगाई लोगों के लिए सबसे अहम मुद्दे थे। किसी राज्य में सरकार के खिलाफ वोट करना या दूसरा कार्यकाल देना, इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित राज्य ने लोगों की अहम समस्याओं को हल करने के लिए कितना काम किया है। राज्य सरकारों के प्रति संतुष्टि का स्तर इससे भी पता चलता है कि राज्य में विकास/कल्याणकारी योजनाओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया कैसी है। जब बात सड़कों, जल आपूर्ति और बिजली की स्थिति में सुधार की आती है, तो इन मामलों में तेलंगाना की राज्य सरकार को बहुत सकारात्मक रेटिंग मिली थी।

हर 10 में से सात से अधिक ने जोर देकर कहा कि एक अलग राज्य तेलंगाना के निर्माण से लोगों की उम्मीदें पूरी हुई हैं। दूसरी तरफ, राजस्थान और मध्य प्रदेश में मतदाताओं ने राज्य सरकारों की  कल्याणकारी योजनाओं के बारे में सुना था, लेकिन अधिकांश लोगों को उसका फायदा नहीं मिला। यह साफ तौर पर जमीनी स्तर पर ‘सरकार तक लोगों की पहुंच’ न होने को भी बतलाता है।

उत्तर भारत के तीन महत्वपूर्ण राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सत्ता में वापसी को समाज के विभिन्न वर्गों में उसके समर्थन से जोड़ा जा सकता है, जिसे वह हासिल करने में सफल रही।

उत्तर भारत के तीन राज्यों में लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि गरीब और आर्थिक रूप से हाशिए पर रहने वाले लोगों ने भाजपा की अपेक्षा कांग्रेस का अधिक साथ दिया। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने गरीबों और आर्थिक रूप से वंचित लोगों के बीच भाजपा की तुलना में तीन प्रतिशत अंक अधिक वोट हासिल किए, जबकि मध्य प्रदेश में यह अंतर आठ प्रतिशत अंक का था। गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर तबका राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं पर अधिक निर्भर रहता है। इस का भाजपा की अपेक्षा कांग्रेस को अधिक तरजीह देना, राज्य सरकार की ‘गरीब हितैषी’ नीतियों और कार्यक्रमों की पोल खोलता है। तेलंगाना में सत्तारूढ़ टीआरएस अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की तुलना में प्रचंड बहुमत से सत्ता में लौटी।

यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि उत्तर भारत के इन तीन राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा के दलित समर्थक वोटों में गिरावट देखी गई। लोकनीति- सीएसडीएस के सर्वे से पता चलता है कि कांग्रेस को मध्य प्रदेश में भाजपा की तुलना में 15 प्रतिशत अंक अधिक दलित वोट मिले। राजस्थान में कांग्रेस दलितों के बीच भाजपा की तुलना में सात प्रतिशत अंक बढ़त लिए हुई थी, जबकि छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा चार प्रतिशत अंक का था। जहां तक दलित वोटों की बात है, तो अगर लोकनीति-सीएसडीएस के 2014 लोकसभा चुनाव के बाद के सर्वे पर नजर डालें तो इन सभी तीनों राज्यों में भाजपा कांग्रेस से आगे थी।

अगर लोकनीति-सीएसडीएस के विश्लेषण को देखें, तो इसी तरह का रुझान आदिवासी वोटों को लेकर देखा गया था। 2014 लोकसभा चुनाव के बाद सर्वे के मुताबिक, भाजपा कांग्रेस से 14 प्रतिशत अंक आगे थी। हालिया संपन्न विधानसभा चुनाव के बाद सर्वे बताते हैं कि भाजपा आदिवासी वोटों के मामले में कांग्रेस से 12 प्रतिशत अंक पीछे थी। राजस्थान में 2014 में भाजपा कांग्रेस से 22 प्रतिशत अंक आगे थी। अब वह लुढ़ककर एक प्रतिशत अंक पर आ गई। छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य है और यहां भाजपा कांग्रेस से आठ प्रतिशत अंक पीछे रही।

यह भी याद रखना चाहिए कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ दो ध्रुवीय राज्य हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस को अपेक्षाकृत मामूली बढ़त मिलना इस बात का संकेत है कि वह इन दोनों राज्यों में अभी जनाधार के मामले में पीछे है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस को भाजपा की तुलना में थोड़े कम ओबीसी वोट मिले। मध्य प्रदेश में भाजपा उच्च जातियों और मध्यम जातियों के मतदाताओं के साथ ओबीसी का भी समर्थन हासिल कर सकी। इसलिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के बीच कांग्रेस के प्रति झुकाव होने के बावजूद इस चुनाव में कोई नया या नाटकीय सामाजिक समीकरण देखने को नहीं मिला।

उत्तर भारत के इन तीनों राज्यों में ग्रामीण संकट एक महत्वपूर्ण कारक साबित हुआ। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की तुलना में कांग्रेस को किसानों का अधिक वोट मिला। इन तीन राज्यों के ग्रामीण इलाकों में भाजपा के वोटों में तेज गिरावट देखने को मिली। इन राज्यों में ग्रामीण आबादी के बड़े हिस्से को देखते हुए, ऐसा लगता है कि भाजपा ने इन तीनों राज्यों में बड़ी संख्या में ग्रामीण सीटें गंवाई हैं। (पिछले साल गुजरात में इसी तरह का रुझान देखा गया था, लेकिन शहरी इलाकों में मिले समर्थन से भाजपा सत्ता बरकरार रखने में सफल रही थी)।

उत्तर भारत के इन तीनों राज्यों में सत्ता परिवर्तन में किसान, छोटे उद्यमी, दलित और आदिवासी वोटों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2014 के लोकसभा चुनावों में देखा गया था कि भाजपा को हर वर्ग का समर्थन हासिल था। इसमें विशेष सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि वालों के बीच व्यापक समर्थन था, तो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ों के बीच कम था। ऐसा लगता है कि उत्तर भारत के तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव परिणामों में यह खाई और बढ़ी है।

राजनीतिक दलों की रणनीति के लिहाज से हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजों का छह महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव पर व्यापक असर पड़ेगा। उत्तर भारत में हार निश्चित रूप से भाजपा के लिए एक झटका है। एंटी इंकंबेंसी अब पूरी तरह दिखने लगी है। पिछले चार साल में भाजपा ने राज्य-दर-राज्य इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया और उसका लाभ उसे मिला। यह गुजरात से शुरू हुआ, जब भाजपा को चुनौती मिलनी शुरू हुई। हालांकि, वह प्रधानमंत्री के गृह राज्य को बचाने में सफल रही, लेकिन दूसरे प्रमुख राज्यों में विफल रही।

कांग्रेस इस जीत से खुश हो सकती है, लेकिन उसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मिजोरम में सत्ता खोने के बाद वह अब पूर्वोत्तर के किसी भी राज्य में अब सत्ता में नहीं है। दक्षिण में, तेदेपा और वामदलों के साथ महागठबंधन बनाने की कोशिशों के बावजूद वह टीआरएस को सत्ता में आने से नहीं रोक सकी।

अगले साल लोकसभा चुनावों के मद्देनजर, दोनों प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही हैं। लोकनीति-सीएसडीएस ने सर्वे के जरिए राज्यों में लोगों का मिजाज भांपने की कोशिश की थी। यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि अगर आज लोकसभा चुनाव होते, तो सभी राज्यों के नतीजे से मेल खाते। हालांकि, राजस्थान एकमात्र ऐसा राज्य होता, जहां लोग भाजपा के साथ जाना चाहते।

हालिया चुनावों ने लोकसभा के लिए माहौल बना दिया है। फिर भी यह बताना जरूरी है कि राजनीति में चार महीना काफी लंबा समय होता है। इस दौरान कई रोचक और अप्रत्याशित मोड़ देखने को मिलेंगे। जब राजनीतिक दल अहम राष्ट्रीय चुनाव की तैयारियां करेंगे, तो निश्चित तौर पर उन्हें अपनी रणनीतियों और प्राथमिकताओं को फिर से तय करना होगा। फिर भी, जहां तक इन चुनावों का संदेश है, तो भाजपा के लिए चिंता की बात है लेकिन कांग्रेस को भी शह नहीं मिली है और क्षत्रपों की अहम भूमिका होगी, जैसा कि टीआरएस की जीत से पता चलता है।

(संदीप शास्‍त्री लोकनीति के को-ऑर्डिनेटर हैं, सुहास पलशिकर लोकनीति के को-डायरेक्टर हैं और संजय कुमार सीएसडीएस के डायरेक्टर और लोकनीति के को-डायरेक्टर हैं) 

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