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अभी तो फैसले में देर

अक्टूबर में सेवानिवृत्त होने वाले प्रधान न्यायाधीश के पास अयोध्या पर ‘अंतिम फैसला’ देने की मोहलत नहीं
इंतजारः अयोध्या में ‘रामजन्मभूमि कारखाने’ के सामने ‘राम नामी’ ईंटों की दीवार

अयोध्या विवाद पर अदालती फैसले की लंबी राह 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले तो कतई छोटी होती नहीं दिखती। भ्रामक खबरें ऐसा आभास दे रही हैं कि सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद पर फैसला सुरक्षित है। मगर सच्चाई तो यह है कि सर्वोच्च न्यायालय में केवल उस तकनीकी मुद्दे पर सुनवाई पूरी हुई और फैसला सुनाना है कि संविधान पीठ पहले अपना फैसला 2010 के इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनाए या फिर इस्माइल फारूकी मामले के 1994 के फैसले पर?

इसी दो अक्टूबर को सेवानिवृत्त हो रहे प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने अब तक कई महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई पूरी करके निर्णय सुरक्षित कर दिया है। इसमें हाल ही में आया समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने का फैसला भी रहा है। इसमें संदेह नहीं कि 2010 में इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील शीर्ष अदालत में लंबित हाइप्रोफाइल मामलों में से एक है, मगर इस पर जल्दी फैसला सुनाए जाने की कोई संभावना नहीं है। प्रधान न्यायाधीश की पीठ के सामने मुद्दा बेहद बुनियादी है। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दलील दी कि विवादित स्‍थल को तीन हिस्से में बांटने का इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला इस्माइल फारूकी मामले में पांच सदस्यीय संविधान पीठ के 1994 के फैसले पर आधारित है, जिसमें बहुमत की राय यह थी कि, “इस्लाम के अनुपालन के लिए मस्जिद अभिन्न अंग नहीं है...।” तब वक्फ बोर्ड की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा था कि मस्जिद इस्लाम के लिए अनिवार्य है (या नहीं), इस मसले पर सात सदस्यीय संविधान पीठ को ही विचार करना चाहिए।

इसलिए न्यायमूर्ति मिश्रा सेवानिवृत्त होने से पहले इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर फैसला नहीं कर पाएंगे। इसका एक कारण तो यही है कि प्रधान न्यायाधीश और न्यायाधीश अशोक भूषण तथा अब्दुल नजीर  की पीठ फिलहाल इसी मामले पर फैसला सुनाएगी कि इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के आधार का मुद्दा संविधान पीठ के हवाले किया जाए या नहीं। तीन जजों की यह पीठ पूर्व प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर ने पिछले साल बनाई थी।

अगर प्रधान न्यायाधीश मिश्रा और दो अन्य न्यायाधीश इस मामले को संविधान पीठ के हवाले नहीं भी करते हैं, तो भी लंबित अपीलों में काफी समय लगेगा। मिल्कियत का मुकदमा 1989 से 2010 तक इलाहाबाद हाइकोर्ट में चला था, जिसके साक्ष्य और तर्कों के आधार पर विशद फैसला तीन खंडों में सुनाया गया। अगर कोई वकील अपनी दलील के दौरान इसके विस्तृत उद्घरण ही पढ़ना शुरू करे तो उसमें हफ्तों लग जाएंगे। प्रधान न्यायाधीश के पास पूरी अपील को संविधान पीठ में भेजने का भी विकल्प है। ऐसी नजीर भी है। प्रधान न्यायाधीश खुद मुस्लिम समाज में प्रचलित बहुविवाह की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई सीधे एक संविधान पीठ के हवाले कर चुके हैं। लेकिन बड़ी पीठ को अयोध्या विवाद पर निर्णय देने में काफी समय लगेगा क्योंकि हर दिन सुनवाई रखकर उसे तमाम दलीलों पर गौर करना होगा और फिर फैसला लिखना होगा। मौजूदा मुद्दे को संविधान पीठ में भेजा जाए या नहीं, इसी की सुनवाई में लगभग दो महीने लग गए। फरवरी में इसकी शुरुआत में ही प्रधान न्यायाधीश ने कहा था कि वे इसे सिर्फ जमीन विवाद की तरह ही देखेंगे।

अयोध्या विवाद की सुनवाई से निपटना आसान भी नहीं है। जब 20 अगस्त, 2018 को सुनवाई पूरी हुई तो आदेश में 200 से अधिक वकीलों के नामों का जिक्र किया गया, जो इस कानूनी लड़ाई में विभिन्न पक्षों की तरफ से उपस्थित हुए थे। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आठ साल से लंबित है।

इस मुद्दे को लेकर अदालत में लगातार गहमागहमी जारी है। पिछले दिसंबर में अदालत ऐसे ही एक वाकये से रूबरू हुई। पूर्व केंद्रीय मंत्री और वकील कपिल सिब्बल वक्फ बोर्ड की ओर से पेश हुए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि अदालत 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले फैसला सुनाने के दबाव में है। गैर-राजनीतिक, धार्मिक संगठन सुन्नी वक्फ बोर्ड ने फौरन सिब्बल की दलील से पल्ला झाड़ लिया। कुछ वकीलों ने सिब्बल के खिलाफ अदालती कार्यवाही की अवमानना का मामला चलाने की दलील पेश की। लेकिन अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल इसके खिलाफ थे। उन्हीं की वजह से यह मामला टल गया।

प्रधान न्यायाधीश मिश्रा के दो पूर्ववर्ती प्रधान न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर और जे.एस. खेहर को इस विवाद पर सुनवाई करने का मौका नहीं मिला। न्यायाधीश ठाकुर इसके लिए उत्सुक थे लेकिन कई तरह की देरी से मामला उनके सामने नहीं आ पाया। जैसे, इलाहाबाद हाइकोर्ट में मामला चलने के दौरान कई याचिकाकर्ताओं की मृत्यु हो जाने से उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को अधिकार देने में हुई देरी।

आखिरकार, कुछ संबंधित मामले तो 1950 से चल रहे थे। इस साल के शुरुआत तक अपील के कागजात भी पूरे नहीं थे। न्यायाधीश ठाकुर के बाद न्यायाधीश खेहर ने भी अदालत से बाहर समझौता करने का सुझाव दिया था। उन्होंने इस मसले में खुद मध्यस्थता की पेशकश भी की थी। इससे कुछ लोगों ने अयोध्या विवाद में खुद ही मध्यस्थता निभाने की कोशिश की। धर्म गुरु श्री श्री रविशंकर फिर से सीन में आए लेकिन वह बात को अंजाम तक नहीं पहुंचा सके। विश्व हिंदू परिषद सहित कोई भी पक्ष समझौते का इच्छुक नहीं था। विहिप का कहना है कि ‘पुरातात्विक साक्ष्य’ उसके दावे को मजबूत करते हैं।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे कई लोगों के पक्षकार बनने की अपील को ठुकरा दिया। कोर्ट ने कहा कि मिल्कियत के मामले में सिर्फ उन्हीं का हक बनता है, जिनका उस पर दावा हो। एडिशनल सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता इस दृष्टिकोण से सहमत भी थे।  

लेकिन स्वामी ने हार नहीं मानी और एक रिट याचिका में उन्होंने विवादित स्थल पर पूजा-अर्चना करने का अपना मौलिक अधिकार मांगा, क्योंकि वे मानते हैं कि यह राम का जन्मस्थान है।

मामला अभी लंबित है मगर कुछ विवादास्पद बयान सार्वजनिक होने लगे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने कर्नाटक के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था कि मंदिर विवादित स्थल पर ही बनेगा। पिछले महीने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, ‘‘भगवान राम मंदिर बनाने की तारीख तय करेंगे।’’ इसके कुछ दिनों बाद ही आदित्यनाथ के कैबिनेट के एक सदस्य मुकुट बिहारी वर्मा ने कहा कि भाजपा मंदिर बनाने के वादे को पूरा करेगी। जबकि 1968 में सर्वोच्च न्यायालय ने बंगाल के मुख्यमंत्री पी.सी. सेन को रेडियो पर भाषण देने के नाते अदालत की अवमानना का दोषी ठहरा दिया था। वे उस कानून के बारे में भाषण दे रहे थे जिसे पारित तो किया गया था, मगर कलकत्ता हाइकोर्ट में उस पर सुनवाई चल रही थी। देखना यह है कि ‘राम जन्मभूमि’ के मामले में दिए गए उपरोक्त बयानों  के ‌िखलाफ ऐसी कार्रवाई कब होती है। 

अयोध्या मसला हालांकि अभी और लंबे समय तक टंगा रह सकता है और मंदिर निर्माण मुद्दा कम से कम अगले चुनाव के लिए भाजपा के घोषणा-पत्र में दिखाई देगा ही। इस बीच प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के पास शायद मौका है कि वे अपनी उतार-चढ़ाव वाली विरासत से कम से कम एक विवाद को तो दूर का रास्ता दिखा सकें।

 लंबित मामले

-2010 में इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ 13 अपील

-सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका विवादित स्थल पर ‘पूजा-अर्चना का अधिकार’ देने की मांग करती है 

-वरिष्ठ भाजपा नेताओं और अन्य के खिलाफ मस्जिद ढहाने का आपराधिक मामला लखनऊ में चल रहा है जिसकी समय सीमा अप्रैल 2019 की है

 सेवानिवृत्त होने से पहले प्रधान न्यायाधीश की पीठ क्या तय करेगी

-अपील (आंशिक या पूरी) को संविधान पीठ को सौंपा जाए या नहीं

कानूनी नुक्ते

-क्‍या मस्जिद इस्लाम के अनुपालन का अनिवार्य अंग है 

क्या है उम्मीद

-आगामी आदेश के आधार पर अपील न्यायमूर्ति मिश्रा के बिना तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ सुनेगी या यह आंशिक या पूरी तरह संविधान पीठ को सौंपा जाएगा

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