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टोक्यो ओलंपिक: अब हजारों युवाओं के सपनों की प्रेरणा बने गोल्डन ब्वॉय

हरीश मानव - SEP 11 , 2021
टोक्यो ओलंपिक: अब हजारों युवाओं के सपनों की प्रेरणा बने गोल्डन ब्वॉय
नीरज चोपड़ा
हरीश मानव

बेमतलब विवादों को छोड़ दें तो टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक विजेता अब हजारों युवाओं के सपनों की प्रेरणा बने

हरियाणा के पानीपत का शिवाजी स्टेडियम। सुबह के पांच बजे। दर्जनों लड़के-लड़कियां हाथ में भाला थामे दौड़ रहे हैं, इस उम्मीद में कि उनमें से कोई अगला ‘नीरज’ होगा। लेकिन विडंबना देखिए कि टोक्यो ओलंपिक में भाला फेंक (जेवलीन थ्रो) स्पर्धा के स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा को अपने एक पड़ोसी देश की मासूम सराहना पर बददिमाग विवादों ने घेरा और उन्हें सफाई देनी पड़ी। खैर! उनकी ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद इस ऐतिहासिक शहर के स्टेडियम का नजारा बदला हुआ है। ओलंपिक पदक की खुमारी में सुबह-शाम यहां आसपास के गांवों से आने वाले युवाओं की भीड़ बढ़ गई है। यह वही स्टेडियम है, जहां दशक पहले 13 साल का नीरज अपने भारी-भरकम डील-डौल को हल्का करने के लिए क्रिकेट गेंद के पीछे दौड़ा करता था। तभी अचानक एक दिन उसने देखा कि उसके गांव का जयवीर चौधरी भाला फेंकने का अभ्यास कर रहा है। उसकी भी दिलचस्पी इस खेल में ऐसी जागी कि क्रिकेट आउट, जेवलिन थ्रो इन। पहले कोच के तौर पर जयवीर चौधरी ने ही नीरज को बल्ले की जगह भाला थमाया।

ओलंपिक एथलेटिक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले नीरज पहले भारतीय एथलीट हैं। नीरज की कहानी पानीपत-जींद मार्ग पर खंडरा गांव के किसान परिवार से शुरू हुई। 24 दिसंबर 1997 को जन्मे नीरज को 12 साल की उम्र में मोटापे के कारण गांव वाले ‘सरपंच’ कहकर चिढ़ाया करते थे। चाचा भीम सिंह चोपड़ा गांव के पास मडलौडा थर्मल प्लांट के एक जिम में नीरज को ले जाने लगे। सालभर बाद नीरज खुद खंडरा से 17 किलोमीटर का सफर तय कर पानीपत के शिवाजी स्टेडियम जाने लगा। गांव से पानीपत तक आने-जाने के लिए वाहन सुविधा न होने से स्टेडियम तक 17 किलोमीटर के सफर में वह रास्ते में गुजरने वाले वाहनों से लिफ्ट ले लेता था।

पानीपत के शिवाजी स्टेडियम में कुछ समय तक अभ्यास करने के बाद नीरज चोपड़ा ने अपने पहले कोच जयवीर के साथ पंचकूला के ताऊ देवीलाल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का रुख किया। वहां का सिंथेटिक ट्रैक नीरज के सुनहरे सफर का गवाह है।

चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से स्नातक नीरज का पैशन जेवलिन थ्रो है तो मोटरसाइकल पर लंबी ड्राइव उनका शौक है। पंडित लख्मी चंद की हरियाणवी रागिनियों से लेकर पंजाबी गायक बब्बू मान उनकी प्ले लिस्ट में हैं। बचपन से ही नीरज को मीठा खाने का बहुत शौक है। स्वर्ण पदक जीत कर नीरज जब गांव लौटे तो घर के द्वार पर उनकी दोनों बहनों ने मां के हाथों बने देसी घी के चूरमे से मुंह मीठा कराया। नीरज ने भी रक्षाबंधन के तोहफे के तौर पर गोल्ड मेडल उन्हें थमा दिया।  

नीरज ने 2011 से पंचकूला के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में पसीना बहाते अपने खेल करिअर के पहले चार साल में ही पांच रिकॉर्ड बनाए थे। पहले ही प्रयास में नवंबर-2012 लखनऊ में आयोजित जूनियर नेशनल में अंडर-16 कटगरी में 68.46 मीटर के साथ जैवलिन थ्रो में नया रिकॉर्ड बनाया। 2013 में यूक्रेन में आयोजित आइएएएफ वर्ल्ड यूथ चैंपियनशिप में नीरज 19वें स्थान पर रहे पर हार नहीं मानी और अपनी फिटनेस पर ध्यान लगाया। लखनऊ के पीएसी ग्राउंड में अक्टूबर 2014 को 26वीं नॉर्थ जोन एथलेटिक्स चैंपियनशिप के जैवलिन थ्रो के पिछले रिकॉर्ड 66.90 मीटर के मुकबले 74.76 मीटर भाला फेंक कर रिकॉर्ड तोड़ा। नवंबर, 2014 में विजयवाड़ा में 30वें जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप अंडर-18 आयु वर्ग में उत्तर प्रदेश के अभिषेक का 73.40 मीटर का रिकॉर्ड तोड़कर 76.50 मीटर का नया रिकॉर्ड बनाया था। दिसंबर-2015 में ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 81.04 मीटर भाला फेंक नया रिकॉर्ड बनाया था।

2015 में चीन में हुई एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में नीरज चोपड़ा 9वें स्थान पर रहे। 2016 में जब भारत पीवी सिंधु और साक्षी मलिक के पदक का जश्न मना रहा था तो एथलेक्टिस की दुनिया में कहीं और एक नए सितारे का उदय हो रहा था। उसी साल नीरज ने पोलैंड में यू-20 विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता। तभी उन्हें आर्मी में जूनियर कमिशनड ऑफिसर के तौर पर राजपुताना राइफल्स रेजीमेंट में नायब सूबेदार पद पर नियुक्ति मिली। उसके बाद नीरज ने गोल्ड कोस्ट में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में 86.47 मीटर थ्रो के साथ स्वर्ण पदक जीता तो 2018 में एशियाई खेलों में 88.07 मीटर तक थ्रो का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाकर स्वर्ण पदक जीता।

भले ही ओलंपिक के लिए स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) ने नीरज चोपड़ा की तैयारियों और विदेश में उनकी ट्रेनिंग और टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के लिए 450 दिनों में 4.85 करोड़ रुपये खर्च किए पर 2015 में नीरज के खेल करिअर में ऐसा भी दौर आया था जब महीनों तक उनके पास कोई कोच नहीं था। तब उन्होंने यूट्यूब का सहारा लिया और वीडियो देखकर ट्रेनिंग जारी रखी।

 2019 नीरज के लिए बेहद मुश्किलों भरा रहा। कंधे की चोट के कारण सर्जरी के बाद कई महीने तक आराम करना पड़ा। इसके पहले भी नीरज को चोट से परेशानी हुई। 2012 में वे बास्केटबॉल खेल रहे थे तो कलाई टूट गई थी। तब नीरज को लगा था कि शायद वे न खेल पाएं लेकिन कड़ी मेहनत सार्थक हुई।

चोट से उबरकर नीरज चोपड़ा ने इसी साल मार्च में हुई इंडियन ग्रां प्री में 88.07 मीटर की दूरी तक जेवलिन थ्रो में नेशनल रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया था। टोक्यो ओलंपिक में नीरज ने अपने पहले ही प्रयास में 86.65 मीटर थ्रो करके फाइनल में प्रवेश किया और 87.58 मीटर थ्रो से देश की झोली में 2008 के बाद ओलंपिक का पहला गोल्ड मेडल डाल दिया।

 13 अगस्त को पंचकूला के इंद्रधनूष ऑडिटोरियम में ओंलपिक पदक विजेताओं और प्रतिभागी खिलाड़ियों के सम्मान में राज्य स्तरीय सम्मान समारोह में नीरज का प्रतिनिधित्व करने आए उनके चाचा भीम चोपड़ा ने आउटलुक से कहा, “पिछले 10 साल में परिवार और रिश्तेदारियों में हुई शादियों में नीरज बहुत कम शामिल हुआ पर गोलगप्पे उसका पंसदीदा है।” भीम चोपड़ा के मुताबिक टोक्यो जाने से पहले नीरज ने लंबे स्टाइलिश बाल कटवाए क्योंकि लंबे बाल आंखों पर आ जाते थे। लंबे बालों से सोशल मीडिया पर नीरज को मोगली कहा जाता। नीरज की नजर अब 2024 के पेरिस ओलंपिक पर है।

सुनहरे ओलंपिक तमगे का सफर

नीरज चोपड़ा

वह हफ्ता मेरे और भारतीय ओलंपिक टोली के लिए बहुत कुछ फंतासी जैसा था। मुझमें धीरे-धीरे यह एहसास मजबूत हो रहा है कि मैं ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाला देश का पहला एथलीट बन गया हूं। पीछे मुड़कर देखें तो दिमाग में कई विचार कौंध रहे हैं। किसी खिलाड़ी के लिए लगन, तैयारी, मानसिक मजबूती और प्रदर्शन के मामले में कोई किंतु-परंतु नहीं हो सकता, फिर भी मुझे एहसास हुआ कि समय हमारे जीवन में सबसे बड़ा प्रेरक बल है। अगर टोक्यो ओलंपिक 2020 में होता तो क्या होता? महामारी न होती तो क्या होता? समय हमारा सबसे बड़ा सहयोगी होता है। 2019 के पूरे वर्ष मैं चोटिल था और मेरी सर्जरी भी हुई। मैं प्रशिक्षण में शामिल नहीं हुआ, न मैं विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा ले पाया और सबसे अहम डायमंड लीग से भी गायब रहा। मुझे वापस ट्रैक पर आने और टोक्यो ओलंपिक की तैयारी के लिए 2020 का पूरा साल लग गया। मैं जानता हूं कि कोविड ने लोगों की जिंदगियों को तबाह कर दिया और खेल स्पर्धाओं के कार्यक्रम को खत्म कर दिया, लेकिन महामारी हमारे लिए वरदान भी थी।

हम एथलीट सहयोगी माहौल पर निर्भर रहते हैं। मैं खुशकिस्मत हूं कि फेडरेशन, खेल मंत्रालय और मेरे प्रायोजक जेएसडब्लू से पूरी मदद मिली। मेरे सफर में 2018 में अनोखे दिग्गज जेवलिन थ्रोवर यूवे हॉन के साथ का दौर बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन मैं अगर 2019 की निराशा से उबरने और अपनी ताकत वापस पाने तथा सर्वाधिक शारीरिक फिटनेस हासिल करने में कामयाब हुआ तो सारा श्रेय जर्मन बॉयो-मेकनिक विशेषज्ञ डॉ. क्लॉस बार्टोनीट्ज को जाता है। जेवलिन थ्रो में ताकत, लचीलापन और रफ्तार तीनों का मेल होता है। यह सब मिलकर वह विस्फोटक ताकत बनती है, जो भाला फेंकने के लिए जरूरी है। महज भाला फेंकने और उसे दूर तक फेंकने में बड़ा फर्क है।

क्लॉस सिर्फ ट्रेनर नहीं हैं, वे दिमागी संतुलन के कोच भी हैं। आखिरी दिन जब मेरे भीतर आग जल रही थी, उन्होंने मेरी भावनाओं पर काबू रखने में मदद की। स्वर्ण पदक जीतने पर ही फोकस करना मुश्किल पैदा कर सकता है। मेरी तकनीक को तराशने के अलावा क्लॉस ने मुझे उस पल का मजा लेने और अपने प्रदर्शन पर ध्यान लगाने की सलाह दी। वे कहते कि मजे करो और उससे मुझ पर दबाव घट जाता। मुझे लगता है कि पुरुष हॉकी टीम के कोच ने भी जर्मनी के खिलाफ कांस्य पदक वाले मैच में खिलाड़ियों से कहा, आराम से खेलो।

क्वालिफायर और फाइनल मैच के दिन सब कुछ ठीक-ठाक रहा, दिमाग और शरीर में तालमेल एकदम सही था। मेरा लक्ष्य पदक जीतना नहीं था, मैं अपना बेहतरीन रिकॉर्ड हासिल करना चाहता था, यानी भाला राष्ट्रीय रिकॉर्ड 88.07 मीटर के आगे फेंकना था। मैं अपने पहले दो या तीन प्रयासों में अपना बेहतरीन थ्रो हासिल करना चाहता था। मेरी दौड़ और फेंकने की तकनीक अच्छी थी और भाला 87.03 मीटर पर जा गिरा। बाकी औसत रहा।

मैं अपने दूसरे प्रयास से काफी खुश था। 87.58 मीटर तक भाला गया लेकिन मैंने स्कोरबोर्ड देखा तो थोड़ा मायूस हुआ। भारी दबाव था और मेरे सबसे पसंदीदा जर्मन खिलाड़ी जोन्स वेल्टर के जल्दी नाकाम होने से मुझे हैरानी हुई। वेल्टर 2021 में 90 मीटर से ज्यादा का गजब का रिकॉर्ड बना चुके थे लेकिन खेल चौंकाऊ नतीजे दे सकता है और ओलंपिक अजीबोगरीब नतीजे ला सकते हैं। यह साबित हुआ कि कोई एथलीट अजेय नहीं होता।

मैं 90 मीटर का रिकॉर्ड तोड़ना चाहता हूं, लेकिन स्वर्ण पदक जीतना देश के लिए खास था। मुझे याद नहीं आता कि टोक्यो में मैं लगातार छह घंटे सोया होऊंगा। लेकिन उस सारी परेशानी और संघर्ष का फल अच्छा निकला। मैंने अपना पदक मिल्खा सिंह जी को समर्पित किया। वे रोम में स्वर्ण पदक जीतने के काफी करीब पहुंचे थे। और बेशक, पी.टी. उषा भी। मैंने उन सबके सपने को साकार किया और उम्मीद है कि 2024 में पेरिस रवाना होने की तैयारी में जुटे खिलाड़ियों की आकांक्षाओं को ऊपर उठाया है।

(टोक्यो ओलंपिक में भाला फेंक में स्वर्ण पदक विजेता। जैसा उन्होंने सौमित्र बोस को बताया)

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