चुनावों की घोषणा के साथ ही दिल्ली में सियासी पारा चढ़ गया है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की चुनौती को भारतीय जनता पार्टी इतनी गंभीरता से ले रही है
छावनी परिषद के चुनावों में इन दोनों जगहों पर भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया है। बनारस और लखनऊ में भाजपा ने क्रमश: आठ और सात सीटों पर चुनाव लड़ा मगर इसे एक भी सीट नहीं मिली।
हर ओर से यही सवाल उठ रहे हैं कि यह आयोग आखिर करेगा क्या? इसके अधिकारों और काम-काज के दायरे को अब तक परिभाषित नहीं किया गया है और फिलहाल इसे सिर्फ थिंक टैंक के रूप में लिया जा रहा है।
नरेंद्र मोदी कभी मीडिया से दूरी बना लेते हैं तो कभी मीडियाकर्मियों को गले भी लगा लेते हैं। मोदी सरकार के छह मार पूरे होने पर जब कुछ टीवी चैनलों ने सरकार की आलोचना करनी शुरू की तो प्रधानमंत्री को लगा कि कहीं दूरी बनाने के कारण तो ऐसा नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव नृपेन्द्र मिश्रा की नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर भले कानून बदला पर मिश्रा से संबंधित हितों के टकराव का एक नया विवाद आकार लेता दिख रहा है।
सन 2002 में कौन कल्पना कर सकता था कि अमेरिका में एक अश्वेत नेता राष्ट्रपति बन सकेगा? भारत में किसने सोचा होगा कि गुजरात के घृणित दंगों की पृष्ठïभूमि के बावजूद प्रदेश के नवोदित नेता नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बन सकते हैं?
बीते बारह सालों में भारतीय राजनीति में बड़ा उतार-चढ़ाव रहा है। साल 2002 की अगर बात करें तो केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे।