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एससी/एसटी अत्याचार निवारण बिल पर लगी संसद की मुहर

AUG 09 , 2018

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कमजोर हुए अनुसूचित जाति/ जनजाति अत्याचार निवारण कानून को फिर से मूल स्वरूप में लाने संबंधी संशोधन बिल पर गुरुवार को संसद की मुहर लग गई। राज्यसभा में अनुसूचित जातियां/अनुसूचित जनजातियां (अत्याचार निवारण) संशोधन बिल 2018 पर करीब पौने दो घंटे तक चली चर्चा के बाद इसे ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने बिल पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि मोदी सरकार गरीबों और दलित वर्गों के हितों के प्रति समर्पित है। इस सरकार ने इन वर्गों के हितों का संरक्षण किया है। उन्होंने कहा कि विधेयक में अनुसूचित जाति एवं जनजातियों पर अत्याचार के मामलों में जल्दी सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन का प्रावधान किया गया है। चर्चा के दौरान कई सदस्यों ने विशेष अदालतों के गठन की मांग की थी।

उन्होंने कहा कि 14 राज्यों में 195 विशेष अदालतों का गठन किया गया है तथा कुछ राज्यों में जिला एवं सत्र न्यायालय को विशेष अदालत घोषित किया गया है। प्राथमिकी दर्ज किए जाने के दो माह के अंदर मामले की जांच पूरी करने तथा दो माह के अंदर विशेष अदालत में सुनवाई पूरी करने का विधेयक में प्रावधान किया गया है ।

गहलोत ने कहा कि वह अच्छी नीयत, अच्छी नीति और अच्छी कार्ययोजना के साथ कठोर प्रयास कर इन वर्गों के हकों के संरक्षण के लिए प्रयासरत है। इसमें उन्हें सफलता भी मिली है। उन्होंने विपक्षी सदस्यों के इस दावे को नकार दिया कि सरकार विभिन्न दबावों में यह विधेयक लाई है।

उन्होंने कहा कि यह सरकार शुरू से ही इन वर्गों के लोगों के हकों के संरक्षण के लिए प्रयासरत रही है। उन्होंने कहा कि इस सरकार की शुरू से ही इन वर्गों के प्रति प्रतिबद्धता थी. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद विधेयक लाए जाने की पृष्ठभूमि का भी जिक्र किया और कहा कि जिस मंशा से मूल कानून बनाया गया था, उसे बहाल करने के लिए यह विधेयक लाया गया है।

 इससे पहले चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस की कुमारी शैलजा ने कहा कि देश में दलितों के खिलाफ अपराध में वृद्धि हो रही है और हर 15 मिनट पर दलितों के खिलाफ कोई ने कोई अपराध होता है। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि यह दलित हितैषी नहीं है औ इसकी कथनी व करनी में अंतर है। उन्होंने मांग की कि इस कानून को नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए, नहीं तो इसे बार बार अदालतों में चुनौतियां दी जाएगी। 


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