Home राजनीति राष्ट्रीय दल गिरफ्तारियों पर राहुल का तंज, 'भारत में ‌सिर्फ एक ‘एनजीओ’ के लिए स्‍थ्‍ाान, वह है आरएसएस'

गिरफ्तारियों पर राहुल का तंज, 'भारत में ‌सिर्फ एक ‘एनजीओ’ के लिए स्‍थ्‍ाान, वह है आरएसएस'

AUG 29 , 2018
गिरफ्तारियों पर राहुल का तंज, 'भारत में ‌सिर्फ एक ‘एनजीओ’ के लिए स्‍थ्‍ाान, वह है आरएसएस'
सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर राहुल का तंज, 'भारत में एक एनजीओ, इसका नाम

मंगलवार को देश के कई शहरों में नक्सली संबंध के आरोपों में सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गलत बताया है। उन्होंने कहा कि भारत में केवल एक एनजीओ के लिए स्थान है और इसका नाम आरएसएस है। बाकी सभी एनजीओ बंद कर दो। सभी एक्टिविस्टों को जेल में भेज दो और जो लोग शिकायत करें उन्हें गोली मार दो। न्यू इंडिया में आपका स्वागत है।

बता दें कि  महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में पुणे पुलिस ने मंगलवार को देश के 6 शहरों में छापा मारा। इस छापे के बाद 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें हैदराबाद से वामपंथी विचारक और कवि वरवर राव, फरीदाबाद से वकील सुधा भारद्वाज, दिल्ली से गौतम नवलखा, मुंबई से वरनन गोंसाल्विस और ठाणे से एडवोकेट अरुण फरेरा को गिरफ्तार किया। वहीं रांची में स्टेन स्वामी और गोवा में आनंद तेलतुंबडे से पूछताछ की गई। यह कार्रवाई एल्गार परिषद और नक्सलियों के संपर्क की जांच के बाद की गई। परिषद के कार्यक्रम में 31 दिसंबर, 2017 को हिंसा हुई थी। पुलिस ने इसके पीछे नक्सलियों का हाथ होने का दावा किया था।

ये हुए गिरफ्तार

वरवर राव कवि और वामपंथी विचारक हैं। सुधा भारद्वाज सोशल वर्कर, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में गेस्ट फैकल्टी हैं। गौतम नवलखा नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं। वरनन गोंसाल्विस जिनेस ऑर्गनाइजेशन के प्रोफेसर भी रह चुके हैं। जबकि अरुण फरेरा एक लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

क्या है आरोप?

गौरतलब है कि कोरेगांव - भीमा, दलित इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वहां करीब 200 साल पहले एक बड़ी लड़ाई हुई थी, जिसमें पेशवा शासकों को एक जनवरी 1818 को ब्रिटिश सेना ने हराया था। अंग्रेजों की सेना में काफी संख्या में दलित सैनिक भी शामिल थे। इस लड़ाई की वर्षगांठ मनाने के लिए हर साल पुणे में हजारों की संख्या में दलित समुदाय के लोग एकत्र होते हैं और कोरेगांव भीमा से एक युद्ध स्मारक तक मार्च करते हैं।

पुलिस के मुताबिक, इस लड़ाई की 200 वीं वर्षगांठ मनाए जाने से एक दिन पहले 31 दिसंबर को एल्गार परिषद कार्यक्रम में दिए गए भाषण ने हिंसा भड़काई।

वहीं, आज का घटनाक्रम जून में की गई छापेमारी के ही समान है जब हिंसा की इस घटना के सिलसिले में पांच कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था।

पुणे पु‌लिस ने एल्गार परिषद के सिलसिले में जून में गिरफ्तार किए गए पांच लोगों में एक के परिसर में ली गई तलाशी के दौरान एक पत्र बरामद होने का दावा किया था, जिसमें राव के नाम का जिक्र था। विश्रामबाग थाने में दर्ज एक प्राथमिकी के मुताबिक, इन पांच लोगों पर माओवादियों से करीबी संबंध रखने का आरोप है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने की गिरफ्तारी की निंदा

सिविल लिबर्टीज कमेटी के अध्यक्ष गद्दम लक्ष्मण ने भाजपा सरकार पर आरोप लगाया है कि वह बुद्धिजीवियों को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रही है।

लक्ष्मण ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘हम कानूनी विशेषज्ञों से मशविरा कर रहे हैं। हम कानूनी लड़ाई लड़ेंगे ...उनकी गिरफ्तारी मानवाधिकारों का घोर हनन है।’’

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने ट्वीट किया, ‘‘फासीवादी फन अब खुल कर सामने आ गए हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘यह आपातकाल की स्पष्ट घोषणा है। वे अधिकारों के मुद्दों पर सरकार के खिलाफ बोलने वाले किसी भी शख्स के पीछे पड़ जा रहे हैं। वे किसी भी असहमति के खिलाफ हैं।’’

चर्चित इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने पुलिस की कार्रवाई को ‘‘काफी डराने वाला’’ करार दिया और उच्चतम न्यायालय के दखल की मांग की, ताकि आजाद आवाजों पर ‘‘अत्याचार और उत्पीड़न’’ को रोका जा सके।

गुहा ने ट्वीट किया, ‘‘सुधा भारद्वाज हिंसा और गैर-कानूनी चीजों से उतनी ही दूर हैं जितना अमित शाह इन चीजों के करीब हैं।’’

नागरिक अधिकार कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने भी छापेमारियों की कड़ी निंदा की। उन्होंने ट्विटर पर कल लिखा, ‘‘महाराष्ट्र, झारखंड, तेलंगाना, दिल्ली, गोवा में सुबह से ही मानवाधिकार के रक्षकों के घरों पर हो रही छापेमारी की कड़ी निंदा करती हूं। मानवाधिकार के रक्षकों का उत्पीड़न बंद हो। मोदी के निरंकुश शासन की निंदा करती हूं।’’

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