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मोदी के राजनैतिक उत्तराधिकारी का जन्म

MAR 18 , 2017
योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश की कमान देकर एक तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुआ खेला है। यह विमुद्रीकरण से भी बड़ा खतरा है, जिसे मोदी ने उठाया है। आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बन जाने से इतना तो साफ हो गया है कि मोदी को धारा के विपरीत बहना ही पसंद है।

चुनाव परिणाम आने के बाद से ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम के कयास लगाए जा रहे थे। यहां तक कहा जा रहा था कि उत्तराखंड में यदि ठाकुर मुख्यमंत्री बनेगा तो उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण चेहरा होगा, यदि ब्राह्मण चेहरा होगा तो उसके ठीक उलट नतीजे आएंगे। लेकिन मोदी ने सभी संभावनाओं को खारिज कर बता दिया कि उन्होंने अपनी जो हिंदुत्ववादी छवि बनाई है, उसे किसी भी रूप में वह बनाए रखेंगे। आदित्यनाथ के मार्फत यह संदेश उन्होंने स्पष्ट रूप से दे दिया है।

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दरअसल मोदी ने इस तरह से दूसरी पार्टियों से जाति समीकरण को बिलकुल छीन लिया है। कुर्मी, पटेल, जाट, जाटव, यादव में लोगों को बांट कर देखने वालों को समझना होगा कि हिंदू जाति से उपर है। चुनाव विश्लेषक किसी भी नतीजे पर पहुंचने को जल्दबाजी कह रहे हैं लेकिन यह भी मान रहे हैं कि उन्होंने हिंदू वोट को संगठित कर दिया है। अब सन 2019 में अन्य दलों के नेता जाति को लेकर सशंकित रहेंगे। दरअसल यह रणनीति भाजपा के मातृ संस्थान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के खांचे में भी फिट बैठती है।

उत्तर प्रदेश में मिले प्रचंड बहुमत को सभी ने अपने ढंग से पढ़ा। मीडिया ने उसके अलग निहितार्थ निकाले लेकिन मोदी ने इस बहुमत को हिंदुत्व मेनडेट की तरह ही लिया है। आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से यह भी साफ हो गया है कि अयोध्या का राम मंदिर अब दूर की कौड़ी नहीं है। आदित्यनाथ की छवि को देखते हुए यह नाममुकिन भी नहीं लगता है। हालांकि आदित्यनाथ को नियंत्रण में रखना मोदी के लिए आसान नहीं होगा। जैसा कि मोदी की छवि है कि वह सभी को नियंत्रण में रखते हैं। क्योंकि आदित्यनाथ का अपना कद है और उनकी छवि भी दबंग है। लेकिन मोदी के इस फैसले से यह तो तय है कि भारतीय जनता पार्टी को कम से कम हिंदुत्व के एजेंडे के लिए मोदी का उत्तराधिकारी मिल गया है।  


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