Home राजनीति राष्ट्रीय दल ममता बनर्जी बनेंगी पीएम मोदी का विकल्प? जानें, उनकी कमजोरी और मजबूतियां

ममता बनर्जी बनेंगी पीएम मोदी का विकल्प? जानें, उनकी कमजोरी और मजबूतियां

आउटलुक टीम - MAY 04 , 2021
ममता बनर्जी बनेंगी पीएम मोदी का विकल्प?  जानें, उनकी कमजोरी और मजबूतियां
क्या ममता बनर्जी बनेंगी पीएम मोदी का विकल्प? जानें, उनके पक्ष और खिलाफ क्या हैं कारण
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आउटलुक टीम

ममता बनर्जी 5 मई को पश्चिम बंगाल के तीसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाली हैं। उनकी शानदार जीत ने विपक्षी नेताओं की कतार में शीर्ष पर पहुंचा दिया है। माना जा रहा है कि विपक्ष को ममता की शक्ल में राष्ट्रीय स्तर पर एक गैर-कांग्रेसी चेहरा मिल सकता है। विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी यह देखी जा रही कि उसके पास मोदी के मुकाबले कोई चेहरा नहीं है। विपक्ष का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा की दुर्जेय चुनाव मशीनरी को 2024 के लोकसभा चुनावों में हराया जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह कांग्रेस समेत असमान पार्टियों को भी साथ ला सकती हैं। विपक्ष के नेता के लिए जहां कई बातें उनके पक्ष में जाती हैं तो कई कारण उनके विरोध में जाते हैं। जानें वो पांच-पांच कारण जो उनके पक्ष में और उनके खिलाफ जाते हैं।

पक्ष के ये हैं कारण

1-ममता देश के सबसे बड़े राज्यों में से एक के निर्विवाद नेता के रूप में उभरी हैं। यूपी से 80 और महाराष्ट्र से 48 सांसदों के बाद पश्चिम बंगाल से 42 सांसद लोकसभा के लिए चुने जाते हैं।

2- वह निडर है और उसने दिखा दिया है कि वह भाजपा नेताओं द्वारा नियोजित हार्डबॉल रणनीति से नहीं बचती है।

3-तीसरे विपक्षी दलों के बीच उनके कद का कोई दूसरा नेता नहीं है जो सभी को स्वीकार्य हो। पहले जो नेता दावेदार माने जा रहे थे, अब और नहीं हैं। इनमें नीतीश कुमार शामिल हैं, जो भाजपा के साथ गठबंधन में हैं, लेकिन वे विपक्ष के नेता के तौर पर स्वीकार्य नहीं हैं। नवीन पटनायक, हालांकि देश के सबसे लंबे समय तक सेवारत मुख्यमंत्रियों में से एक हैं, जो पश्चिम बंगाल के मुकाबले ओडिशा छोटा राज्य हैं और उनका  (ओडिशा) को पश्चिम बंगाल जितना बड़ा नहीं मानते हैं और उनका स्वास्थ्य भी बेहतर नहीं हैं। आप नेता अरविंद केजरीवाल, खुद को मोदी के विकल्प के रूप में मानते हैं, लेकिन देश में उनकी उपस्थिति सीमित है। एनसीपी नेता शरद पवार अब 80 साल के हैं और उन्हें व्यवहार्य विकल्प के रूप में नहीं देखा जाता है। सपा नेता अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती ने भाजपा के खिलाफ ममता की तरह लड़ाई की क्षमता को नहीं दिखाया है।

4-कांग्रेस के पास समय था लेकिन वह फिर से कई अवसरों पर भाजपा के खिलाफ मुद्दे उठाने में नाकाम रही है। उसमें  लड़ने और जीतने के लिए कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखाई दे रही है। इस समय, विपक्षी दलों को गांधीवादी नेतृत्व पर बहुत कम भरोसा है।

5-ममता ने कई मौकों पर दिखाया है कि वह विपक्षी नेताओं को एक साथ लाने की इच्छुक हैं। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, केजरीवाल, यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और नेकां नेता फारूक अब्दुल्ला सहित कई नेताओं ने 2016 में उनके शपथ ग्रहण समारोह में भाग लिया था। हाल ही में 28 मार्च को, उन्होंने 14 विपक्षी दलों के नेताओं को पत्र लिखकर केंद्र के हमले को लेकर संघीयता पर सवाल उठाए थे और उन्हें पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद भाजपा को हराने के लिए एक साथ आने का आग्रह किया था।

खिलाफ ये हैं कारणः

1- क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर राज्य का चुनाव जीतना एक बात है लेकिन राश्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का नेतत्व करना अलग है।

2) एक विपक्षी दल का नेता अपने अहंकार और सम्मान के साथ आता है। ममता सभी के साथ सामंजस्य स्थापित करने और सभी का साथ लेकर चलने में सक्षम नहीं हो सकती है।

3-सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस या  या किसी अन्य क्षेत्रीय पार्टी का नेता भी उन्हें विपक्षी दल के नेता के तौर पर स्वीकार नहीं करेगा। इस बात की संभावना भी कम ही है।

4- भाजपा भले ही पश्चिम बंगाल को टीएमसी से हार गई है लेकिन उसने निश्चित रूप से राज्य में बढ़त बनाई है और असम को बरकरार रखा है। यह निश्चित रूप से कम करके नहीं आंका जा सकता है और एक बिखरे विपक्ष का उससे टकराना आसान नहीं है।

5-भाजपा ने हिंदुत्व की विचारधारा का मुद्दा छेड़कर देश की राजनीतिक दिशा को बदलने में कामयाबी हासिल की। ममता और अन्य दलों को भाजपा पर कब्जा करने के लिए आम वैचारिक आधार खोजना मुश्किल होगा - चाहे इसका विरोध करना हो या केजरीवाल जैसे नरम संस्करण को अपनाना हो। कांग्रेस को राहुल गांधी चलाए गए मंदिर मुद्दे को छोड़ना पड़ा, क्योंकि वह इसका राजनीतिक फायदा लेने में नाकाम रहे।

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