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राजस्थान में प्रचार का आखिरी दिन, क्या कांग्रेस के हाथ से जीत छीन पाएगी भाजपा?

आउटलुक ब्यूरो - DEC 05 , 2018
राजस्थान में प्रचार का आखिरी दिन, क्या कांग्रेस के हाथ से जीत छीन पाएगी भाजपा?
राजस्थान में प्रचार का आखिरी दिन, क्या कांग्रेस के हाथ से जीत छीन पाएगी भाजपा?

राजस्थान में बुधवार को चुनाव प्रचार का शोर थम गया। 200 सदस्यीय विधानसभा की 199 सीटों के लिए सात दिसंबर को वोट डाले जाएंगे। नतीजे 11 दिसंबर को आएंगे। अलवर की रामगढ़ सीट पर बसपा उम्मीदवार के निधन के कारण मतदान स्थगित कर दिया गया है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी आनंद कुमार ने बताया कि 199 सीटों पर 2,274 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें 189 महिलाएं।  

राज्य में सत्ता बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस के पास आने की परिपाटी रही है। इस आधार पर इस बार कांग्रेस की दावेदारी बनती है। शुरुआत में कांग्रेस राजस्थान का रण आसानी से फतह करती भी दिख रही थी। तमाम सर्वेक्षण उसकी जीत की भविष्यवाणी कर रहे थे। लेकिन, राज्य कांग्रेस के नेताओं के आपसी मतभेद, जाट नेता हनुमान बेनीवाल की तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद, आखिरी दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों और सट्टा बाजार में भाजपा के बढ़ते भाव से जाहिर है कि अब लड़ाई एकतरफा नहीं रही। यही कारण है कि मंगलवार को जयपुर की एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया कि कांग्रेस के हाथ से भाजपा जीत छीन लेगी। 

130 सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला बताया जा रहा है। करीब 50 सीटों पर दोनों दलों के लिए बागियों ने मुसीबत खड़ी कर रही है। सत्ता के दो पारंपरिक दावेदारों भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की लड़ाई में निर्णायक साबित होने वाले मुद्दों पर नजर;

बागी कितने भारी

चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत से ही दोनों प्रमुख दल आंतरिक असंतोष और बगावत से जूझ रहे हैं।  कांग्रेस के 26 और भाजपा के 19 बागी मैदान में हैं। भाजपा सरकार में मंत्री सुरेंद्र गोयल, हेम सिंह भड़ाना, धन सिंह रावत, ओमप्रकाश हुड़ला और राजकुमार रिणवा पार्टी से बगावत कर चुनाव लड़ रहे हैं। टिकट नहीं पाने वाले पांच अन्य विधायक भी अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवार को चुनौती दे रहे हैं। मारवाड़ के कई क्षेत्रों में कांग्रेस के लिए बागी चुनौती बने हुए हैं। भाजपा भी मंत्री सुरेंद्र गोयल की बगावत से निबट नहीं पाई है।

चुनावी मुद्दे

कांग्रेस चुनावी बहस को विकास और सुशासन के मुद्दों पर केंद्रित रखने की कोशिश में थी। भाजपा सरकार के विरुद्ध किसानों की कथित खुदकशी, बेरोजगारी, खराब कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, दलित और आदिवासियों के मुद्दे और महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार जैसे मुद्दे थे। लेकिन, भाजपा ने धीरे-धीरे बहस को हिंदुत्व की तरफ धकेल दिया। आखिरी दिनों में बहस के केंद्र में राम मंदिर और अन्य भावनात्मक मुद्दे आ गए।

राज्य में 10 फीसदी मुस्लिम आबादी है। पिछली बार भाजपा ने चार मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। लेकिन, इस बार पार्टी ने केवल एक मुस्लिम चेहरे परिवहन मंत्री यूनुस खान को टोंक में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के खिलाफ खड़ा किया है। समझा जाता है कि पार्टी ने चुनावों में हिंदुत्व को प्रमुख मुद्दे के रूप में उभारने की गरज से ऐसा किया है। इसी कड़ी में भाजपा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सभाएं भ्‍ाी करवा रही है। 

माना जाता है कि किसान, मजदूर, कर्मचारी, दलित, आदिवासी और आम लोगों की नाराजगी भाजपा को भारी पड़ सकती है। सीकर में रसीदपुरा गांव में एक किसान रामेश्वर ने बताया, “किसान वर्ग भाजपा से बहुत नाराज है। नाराजगी का एक बड़ा कारण यह भी है कि भाजपा के विधायक और सरकार के मंत्री आम लोगों से मिलते नहीं थे। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पास भी आम-अवाम के लिए वक्त नहीं होता था।” जोधपुर जिले के फलोदी के युवा बेरोजगार सुरेश और असलम ने बताया, “इस सरकार ने बेरोजगारों के लिए कुछ नहीं किया।” 

जाति समीकरण

राजनैतिक रूप से प्रभावशाली जाट समुदाय से भाजपा और कांग्रेस दोनों ने 33-33 प्रत्याशियों को खड़ा किया है। भाजपा ने राजपूत समाज के 26 लोगों को उम्मीदवारी दी है, जबकि कांग्रेस ने इस समाज के एक दर्जन लोगों को प्रत्याशी बनाया है। लेकिन, पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह के पुत्र मानवेंद्र सिंह का कांग्रेस में जाना भाजपा के लिए झटका माना जा रहा है। इसकी भरपाई के लिए उसने कोटा में पूर्व राज परिवार के सदस्य इज्यराज सिंह को पार्टी में लाकर राजपूतों को साधने की कोशिश की है। महंत प्रतापपुरी को पोकरण से उम्मीदवार बनाया है। 

पारंपरिक रूप से भाजपा के साथ रहे राजपूतों की पिछले कुछ साल में इस पार्टी से दूरी बढ़ी है। राजपूतों के एक संगठन ‘करणी सेना’ के सुखदेव सिंह गोगामेड़ी कहते हैं, “हम पहले कांग्रेस का साथ देना चाहते थे। लेकिन, उसने राजपूतों को टिकट देने में तंगदिली दिखाई है। ऐसे में हमारा समर्थन प्रत्याशी की नीति पर निर्भर करेगा।” राजस्थान जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील कहते हैं, “समाज का रुझान कांग्रेस की तरफ है।”

राज्य में अनुसूचित वर्ग की आबादी 17 फीसदी है। इस वर्ग के लिए 34 सीट है। पिछली बार भाजपा ने इनमें 32 पर जीत हासिल की थी। दलित कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने बताया, “बेशक दलित समाज कांग्रेस से खफा है। लेकिन, उसे लगता है कि कांग्रेस ही भाजपा को शिकस्त दे सकती है। इसलिए दलित समाज कांग्रेस को ही समर्थन देगा।”

मारवाड़

मारवाड़ में ऑयल रिफाइनरी, नर्मदा का पानी, बदहाल किसान और बेरोजगारी बड़े मुद्दे हैं। पिछले चुनाव में यहां की 43 सीटों में से 39 पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का चुनाव क्षेत्र सरदारपुरा भी इसी संभाग में है। ऑयल रिफाइनरी को लेकर गहलोत सरकार पर बराबर हमले करते रहे हैं। ब्यावर के शहाबुद्दीन ने बताया कि बजरी (कंस्ट्रक्शन में काम आने वाली रेत) पर डेढ़ साल से रोक है। इससे निर्माण गतिविधियां बंद हैं। इसका निपटारा नहीं होने के कारण बेरोजगारी बढ़ी है और लोगों के पास काम नहीं है।

मारवाड़ के जालोर, सिरोही जिलों के लिए पिछले चुनावों में भाजपा ने नर्मदा के पानी का वादा किया था। लेकिन यह योजना आगे नहीं बढ़ने से किसान नाराज हैं। कांग्रेस ने जोधपुर की उपेक्षा को भी मुद्दा बना रखा है। पिछले चुनावों में कांग्रेस का जोधपुर जिले में सफाया हो गया था।

मेवाड़

आदिवासी बहुल मेवाड़ में बीते चुनाव की कामयाबी को कायम रखने के लिए भाजपा बहुत मशक्क्त कर रही है। पिछले चुनाव में भाजपा ने इस क्षेत्र की 28 सीटों में से अधिकांश पर कब्जा कर लिया था। इतिहास गवाह है कि चुनाव में जो पार्टी इस इलाके में दबदबा बनाती है, राज्य की सत्ता पर वही काबिज होती है।

1998 के विधानसभा चुनाव में मेवाड़ क्षेत्र की कुल 30 सीटों में से कांग्रेस को 23 जबकि भाजपा को केवल चार सीटें मिलीं और सरकार कांग्रेस ने बनाई। 2003 के विधानसभा चुनाव में 21 पर भाजपा और सात पर कांग्रेस को जीत मिली और सरकार भाजपा ने बनाई। 2008 में जब विधानसभा चुनाव हुए तो परिसीमन के कारण इस इलाके की कुल सीटें 30 से घटकर 28 हो गईं। उस समय कांग्रेस को 20 और भाजपा को छह सीटें मिली थीं और सरकार कांग्रेस की बनी। बीते चुनाव में भाजपा ने बाजी पलटते हुए 25 सीटों पर कब्जा जमाया जबकि कांग्रेस केवल दो सीटें जीत पाई और वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी।

यही कारण है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अगस्त माह के शुरू में अपनी गौरव यात्रा की शुरुआत के लिए मेवाड़ के राजसमंद जिले के चारभुजा को चुना। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने 24 अगस्त को ‘संकल्प रैली’ का आगाज चित्तौड़गढ़ के सांवलिया सेठ से की।

पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत भी अपने कार्यकाल की मुफ्त दवा योजना जैसे कार्यों का हवाला देकर इस इलाके में वोट मांग रहे हैं। गहलोत ने आरोप लगाया है कि यूपीए सरकार के वक्त बांसवाड़ा के लिए रेल लाने की योजना शुरू की गई थी। लेकिन, भाजपा सरकार ने इसे रोक दिया। कांग्रेस ने मनरेगा को भी मुद्दा बना रखा है।

गुजरात और मध्य प्रदेश की सीमा से लगते मेवाड़ में भील, मीणा, डामोर, गरासिया, कथौड़ी और पटेलिया जनजातियों का बाहुल्य है। आदिवासी बहुल डूंगरपुर के पत्रकार नितेश गर्ग का कहना है, “जनजाति क्षेत्र में मनरेगा एक प्रमुख मुद्दा है। मनरेगा का काम ठप्प पड़ने से आदिवासी नाराज हैं। खाद्य सुरक्षा योजना, मुफ्त दवा योजना और पूर्ववर्ती कांग्रेस राज में शुरू की गई अन्य योजनाओं में बदलाव से भी आदिवासियों का मोहभंग हुआ है।”

बेनीवाल-तिवाड़ी की जुगलबंदी

निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल इस बार ‘राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी’ बनाकर मैदान में हैं। घ्‍ानश्याम तिवाड़ी की ‘भारत वाहिनी पार्टी’ भी उनके साथ है। दोनों नेता भाजपा में रह चुके हैं। राजाराम मील के नेतृत्व वाली ‘राजस्थान जाट महासभा’ इसे फिजूल की कवायद बता रही है। मील ने आउटलुक से कहा, “न केवल जाट बल्कि अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियां, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग और किसान भी मौजूदा हालात से खुश नहीं हैं। सभी लोग कांग्रेस की तरफ जाते दिख रहे हैं।”

राजस्थान की राजनीति में जाटों को प्रभावशाली तबका माना जाता है। सबसे ज्यादा विधायक इसी वर्ग से आते हैं। फिलहाल राज्य के 30 से ज्यादा विधायक जाट समुदाय से हैं। नागौर, सीकर, झुंझुनू, भरतपुर, जोधपुर जैसे इलाके जाट बेल्ट माने जाते हैं। 200 विधानसभा सीटों में से करीब 60 पर जाट मतदाता प्रभावी हैं।

130 सीटों पर जाटों के प्रभावी होने का दावा करने वाले मील ने बताया, “जाट समुदाय के कुछ नौजवान भले बेनीवाल के साथ चले जाएं, लेकिन बहुसंख्यक समाज का मत इससे अलग है।” आदर्श जाट महासभा के रामनारायण चौधरी ने आउटलुक से कहा, “समाज के लोग अपने आदमी को वोट देंगे। लेकिन जहां समाज का व्यक्ति नहीं होगा वहां कांग्रेस को वोट देंगे।” 

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