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इस व्यक्ति ने दी थी इंदिरा गांधी को खुली चुनौती

OCT 11 , 2017

वह इमरजेंसी का दौर था। इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। सारी शक्तियां उनके हाथों में केंद्रित हो गईं थी। ऐसे में उन्हें चुनौती देने के लिए सामने आता है एक ऐसा व्यक्ति जिसकी उम्र 72 वर्ष हो चुकी थी। इस व्यक्तित्व का नाम था लोकनायक जयप्रकाश नारायण यानी जेपी। संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंक युवाओं सहित देशवासियों को जगाने वाले जेपी की आज 115वीं जयंती है।

देश की आजादी की लड़ाई के सेनानी रहे जेपी इमरजेंसी के खिलाफ आंदोलन के सेनानायक बन कर उभरे। “संपूर्ण क्रांति अब नारा है भावी इतिहास तुम्हारा है”, “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” (राष्‍ट्रक‌वि रामध्‍ाारी ‌सिंह ‌दिनकर की गण्‍ातंत्र ‌दिवस पर ‌लिख्‍ाी मश्‍ाहूर क‌विता की पंक्ति) जैसे उनके नारों ने समाज में अलग ही अलख जगाई थी। परिणाम यह हुआ कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस मार्च 1977 में हुए चुनाव में पराजित होती है और केंद्र में मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार का गठन होता है। मगर आज एक अनुत्तरित प्रश्न है कि जिन सवालों पर जेपी ने लोगों को खासकर युवा पीढ़ी को लामबंद किया वह ज्यों के त्यों पड़े हैं। भ्रष्टाचार आज भी है, सत्ता का निरंकुश रुख बरकरार है।

जिस आंदोलन से नेताओं की एक पूरी पीढ़ी निकली हो उससे काफी उम्मीदें थीं। पर मोरारजी भाई की सरकार ढाई साल में गिर गई और चरण सिंह की सरकार तो लोकसभा का मुंह तक नहीं देख पाई। आंदोलन के अगुआ रहे लालू प्रसाद यादव पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। उन्हें इन आरोपों के चलते सजा भी हुई और जेल भी जाना पड़ा। जातिवाद का विरोध करने वाले उस समय के नेता आज अपनी जाति के लोगों से घिरे नजर आते हैं।

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जेपी का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को सिताबदियारा में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई तो उच्च शिक्षा अमेरिका में। विवाह प्रभावती देवी से हुआ। जब वे अमेरिका में थे तभी प्रभावती जी ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया। जेपी ने उनकी इस भावना का पूरा सम्मान किया। अमेरिका के वापस आने के बाद उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। कांग्रेस में भी रहे। महात्मा गांधी के प्रति उनके मन में काफी सम्मान था तो जवाहरलाल नेहरू से अच्छी मित्रता। देश की आजादी के बाद आमंत्रण के बाद भी वह सरकार में शामिल नहीं हुए। बाद में सोशलिस्ट पार्टी में गए पर चुनावों में मिली हार के बाद राजनीति से दूर हो गए और सामाजिक बदलाव के लिए काम करने लगे।

पांच जून 1975 को पटना कें गांधी मैदान में उन्होंने एक बड़ी सभा को संबोधित किया था। संपूर्ण क्रांति का उद्घोष करने वाली इस सभा में उन्होंने आंदोलन की रूपरेखा तय कर दी थी। आंदोलन हिंसक न हो उसके लिए उन्होंने सभा में मौजूद पांच लाख लोगों से यह वचन लिया था कि वे अहिंसक रहेंगे। इसी दौरान एक नारा लगा “हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा।” और हुआ भी ऐसा ही। आज देश की जो स्थिति है उसमें जेपी के विचार और उनके कार्य उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके जीवनकाल में थे।


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