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‘विकास’ का मारा मध्यवर्ग बेचारा

‘विकास’ के ‘अच्छे दिन’ घोटालों के करोड़ों से खरबों में पहुंचने के दिनों में बदल रहे हैं, क्षमता के अनुकूल रोजगार के वादे पकौड़ापरक रोजगार में बदल रहे हैं, और मध्यवर्ग बेचारा बना ‘विकास’ की मार झेल रहा है

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस!

पीएनबी के 2011 से अभी तक के सभी चेयरमैन और ऑडिटरों को इसके लिए जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया जाना चाहिए? फिर, बैंकिंग सेक्टर का रेग्यूलेटर आरबीआइ इस जिम्मेदारी से कैसे बच सकता है

तवज्जो घटी पर बहलाने को भावनात्मक मुद्दे हैं ही

नोटबंदी, जीएसटी और अर्थव्यवस्थाे में आम तौर पर छाई निराशा को दूर करने के लिए सरकार ने चुनावों के मद्देनजर किसान और गरीब पर फोकस बढ़ाया, मध्यवर्ग को भ्रम में छोड़ा

हताश और उदास मध्यवर्ग

रोजगार, काम-धंधे के मोर्चे पर मंदी से लाचार, उदास मध्यवर्ग के लिए क्या विपक्ष दिखा पाएगा उम्मीद

मौके सिकुड़ने का दौर क्षणिक

ईज ऑफ लिविंग से मध्यवर्ग की आकांक्षाओं और अवसरों के लिए खुलेंगे दरवाजे

खतरे और नाउम्मीदी की हदें पार

जम्मू-कश्मीर में फिदायीन हमले का सिलसिला बढ़ा, केंद्र की सख्त नीति बेअसर, घाटी में अलगाव और एलओसी पर धमाके बेइंतहा

जमींदोज होने लगे लाल खंडहर

कांग्रेस के साथ गठबंधन करके पार्टी को कुछ भी हाथ नहीं लगता क्योंरकि गांवों में माकपा के काडर अब तकरीबन पूरी तरह खत्मा हो चले हैं

प्रक्रिया में उलझी राहत

जटिल नियमों और गड़बड़ियों में फंसी फडनवीस सरकार की किसान कर्जमाफी योजना

सरयू फांस में रघुवर

मुख्य सचिव पर कार्रवाई की मांग कर राय ने बढ़ाई भाजपा की परेशानी

कांग्रेस का जाति एजेंडा

राज्य में पार्टी नेतृत्व को नई धार देने के लिए राहुल गांधी ने खूब इस्तेमाल की सोशल इंजीनियरिंग

बजट का मरहम

सरकारी खजाने से सियासी समीकरण साधने के प्रयास

हाथ पीले कराने का लक्ष्य बना सिरदर्द

मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना का लक्ष्य पूरा करने में छूटे पसीने

स्कूल से ओलंपिक होगा कितना सुगम

अंतरराष्ट्रीय पदक पाने की लालसा से देश में खेल का जज्बा भरने की महत्वाकांक्षी पहल कितनी पर्याप्त, खिलाड़ियों पर होगी कैसी मेहरबानी

भावनाओं के सागर में डूबता देश

मुझे पुराना जमाना इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि मेरे मुताबिक दुनिया पुराने जमाने में आसान थी

छोटे पड़ाेसी की बड़ी चुनौती

हिंद महासागर में दखल बढ़ाने की मंशा से चीन दे रहा मालदीव को शह, सख्त और सधे कदम की दरकार

मामा-भांजे की हीरा-फेरी

शानो-शौकत के लिए मशहूर नीरव मोदी और मेहुल चौकसी ने दूसरे बड़े सरकारी बैंक की चमक उतार दी

टैक्स बचाने के 10 तरीके

जान‌िए, टैक्स बचाने का कौन-सा तरीका आपके लिए ठीक रहेगा

कहानी नई अंदाज क्यों हो पुराना

युवा लेखकों की एक पूरी पीढ़ी विषयों और किस्सागोई के तटबंध खोल रही तो पाठकों का एक भरापूरा पूर्व भी हिंदी की ओर उमड़ा

‘सत्य’ का सोबती सरोकार

हाल ही में 93 साल की कृष्णा सोबती को साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ से नवाजा गया

नानी की विरासत खुशी से उठाना चाहूंगी, अपने अंदाज में

राइमा सेन ने जब चोखेर बाली (2003) से आलोचकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया तब राइमा की तुलना उनकी नानी और दिग्गज अदाकारा सुचित्रा सेन (1931-2014) से होना लाजिमी था। इसमें कोई शक नहीं कि राइमा ने उम्मीदों का पहाड़ खड़ा कर दिया था। धीरे-धीरे राइमा खुद की ‘सोच’ वाली अभिनेत्री के रूप में विकसित हुईं। उन्होंने हिंदी और बांग्ला में अर्थपूर्ण सिनेमा लगातार में कई साल लगाए। गिरिधर झा के साथ बातचीत में उन्होंने कॅरिअर, फिल्म, अभिनेत्री मां मुनमुन सेन की राजनीतिक यात्रा और इन सबके साथ इस पर भी बात की कि आखिर क्यों महान अदाकारा उनकी नानी ने लोकप्रियता के शिखर पर एकांतवासी होना चुना। इंटरव्यू के चुनिंदा अंशः

कवि-मन का उद्बोधन

इस किताब में मुक्तिबोध के संघर्ष को नई शब्दावली मिली

भारतीय संगीत का स्वरूप

कर्नाटक संगीत में कोई भी राग कभी भी गाया-बजाया जा सकता है, हिंदुस्तानी संगीत में समय निर्धारित है

असगर वजाहत के बहाने

लेखक संगठनों में अल्पसंख्यक, महिला और दलित लेखक उचित प्रतिनिधित्व और सम्मान से क्यों वंचित रहे