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मैगज़ीन डिटेल

काम के बोझ से दोहरे प्रोफेशनल

आउटलुक-कार्वी हेल्थ सर्वे से चौंकाने वाले खुलासे, काम के बोझ से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बहुत गंभीर

फैसलों की वजह ढूंढ़ते सवाल

नागरिकता संशोधन विधेयक जल्दबाजी में लाकर सरकार कहीं आर्थिक मोर्चे पर तमाम तरह की चुनौतियों से लोगों का ध्यान बंटाने की कोशिश तो नहीं कर रही है?

घाटी, लद्दाख, जम्मू में बढ़ीं आशंकाएं

जम्मू-कश्मीर के मुस्लिम बहुल जिलों को मिलाकर दो डिवीजन बनाने की चर्चा की नई सुगबुगाहट

उन्नाव में बर्बर अंधेरगर्दी

गैंगरेप पीड़िता को जलाने की घटना से भाजपा की आदित्यनाथ सरकार की कानून-व्यवस्था के दावों की पोल खुली, विपक्ष हुआ हमलावर

भाजपा की राह में ‘आदिवासी’ रोड़ा

पार्टी को चुकानी पड़ सकती है रघुवर सरकार की नीतियों की कीमत, बीच चुनाव में मुख्यमंत्री पर फोकस की रणनीति बदली

बघेल के लिए एक मौका और या....?

लोकसभा चुनाव लड़ने वाले बड़े नेता भी नगर निकाय चुनाव में जोर-आजमाइश में लगे, कांग्रेस-भाजपा दोनों आधार बढ़ाने की तैयारी में

कांग्रेस का कायाकल्प

पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा ने प्रदेश में लगभग वैसी ही भूमिका निभाई, जैसी महाराष्ट्र में शरद पवार ने

पेशेवरो खबरदार खतरे में है सोशल लाइफ

ऑफिस में काम का दबाव सोख रहा है जिंदगी का रस, थकान बेहिसाब, सेक्स लाइफ घटी, नींद उड़ी, घर-परिवार के लिए वक्त सिकुड़ा

क्या आप चुस्त-दुरुस्त हैं?

आवरण कथा/स्वास्‍थ्य सर्वे

बात का बतंगड़

महानायक बन चुके क्रिकेट खिलाड़ियों की नजर सिर्फ पैसे पर होती है, अन्य बातों से उनका सरोकार नहीं

धार्मिक पहचान के विवाद की नई जमीन

विवादास्पद विधेयक संसद में पारित, विरोध में पूर्वोत्तर जला

भारत दुर्दशा का यह कैसा मुकाम!

महिलाओं के खिलाफ वहशीपन की हद लांघते अपराधों से देश में बेचैनी मगर जुनूनी समाधान और फटाफट न्याय की मांग कोई हल नहीं

विपक्ष का हाथ ऊपर, मोदी-शाह का जादू फीका

राज्यों में सत्ता खोती भाजपा के सामने सहयोगियों के साथ घर में भी विरोधियों को संभालने की चुनौती, जमीनी मुद्दों से विपक्ष को मौका

“स्थिर सरकार को ही मिलेगा जनादेश”

झारखंड विधानसभा चुनाव

सांवली खूबसूरती

सप्तारंग

जवाबदेही तय करना जरूरी

महिलाओं के प्रति अपराध का सबसे बड़ा कारण है सुशासन या जवाबदेही की कमी, न कि कानून का अभाव

सत्ता, साहस और चीख

सत्ता का चरित्र हमेशा एक जैसा रहता है, उसका हुलिया, रंग-रूप और चाल-ढाल भले ही कुछ बदल जाए

विभाजन और तनाव पैदा करने की साजिश

बांग्लाभाषियों की पहचान पश्चिम बंगाल में सुरक्षित है, पर असम में उनकी संख्या बढ़ने से असमियों की संस्कृति को खतरा

गांव बदहाल मंदी बेलगाम

जीडीपी और निजी खपत में लगभग आधा योगदान करने वाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था की अनदेखी से बिगड़े हालात

यूरोप का कलियुग

यूरोप मानो एज ऑफ डाउनफॉल में प्रवेश कर गया है, कई परिवर्तनों से एशियाई लोग हक्का-बक्का

चीनी मिलों के ‘अच्छे दिन’

गन्ना मूल्य स्थिर रखकर किसान की आय दोगुनी करने के फॉमूले के लिए तो शायद किसी नोबेल अर्थशास्‍त्री को ही तलाशना होगा