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‘फिरकापरस्त’ तबका समझ रहा हम जो जी चाहें करें-मौ.अरशद मदनी

AUG 20 , 2016
देश के मौजूदा सियासी-सामाजिक हालातों पर जमीयत उलमा-ए-हिंद के सदर मौलाना सय्यद अरशद मदनी मौजूदा सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि कुछ मौजूदा मसलों पर सरकार ने अगर समझदारी का सुबूत न दिया,जो लोग मुल्क के हालात खराब करने की कोशिश कर रहे हैं अगर सरकार के हाथ उनकी गर्दन तक नहीं पहुंचे या उनके हौसले को न तोड़ा गया तो हालात खराब होंगे।

इस समय मुल्क के सामाजिक और सियासी माहौल पर आपकी क्या राय है?

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मैं यह समझ रहा हूं कि मुल्क की अमन-ओ-अमान की जो फिजा थी उसके अंदर बहुत फर्क आया है। खास तरीके से मुल्क की अकलीयतें और उनमें भी खास तरीके से मुसलमान और ईसाई समाज अपने आपको गैर महफूज महसूस कर रहे हैं। इसके साथ एक नई बात यह हुई है कि दलित समाज के साथ जो सूरत-ए-हाल है पूरे मुल्क के अंदर वह भी इंतहाई गंभीर है। हम तो अभी तक मुसलमानों और ईसाईयों के हालात पर ही रोते थे, कहते थे कि मुसलमानों के साथ जो कुछ मुल्क में और कश्मीर के अंदर हो रहा है वह इंतहाई दुख और तकलीफ वाला है लेकिन इस सरकार के समय जो दलित समाज के साथ हुआ वह मुल्क की आजादी के बाद कभी नहीं हुआ था। मौजूदा सरकार जिस तरीके से मुल्क में अमन कायम रख सकती थी, जो पहले से था, उसे रख सकती थी लेकिन रखा नहीं जा रहा। 

 

गाय और राजनीति के मुद्दे पर क्या कहेंगे ?  

असलियत में अगर सरकार चाहती है कि गाय काटने पर पाबंदी लगे तो मैं कहता हूं कि देश में गाय कट रही हैं। नागालैंड, अरुणाचल, मिजोरम आदि में कट रही हैं। आम तरीके से, खुलेआम, कोई जाकर उन्हें रोक नहीं सकता लेकिन देश के दरमियान इस सूरत-ऐ-हाल को पैदा किया जा रहा है यह इंतेहाई खतरनाक है। कुछ लोगों ने स्वीकार किया कि वे गोमांस खाते हैं। विवादों के बाद कुछ लोगों ने गोमांस की दावत भी दी। इसके बावजूद सूरत-ए-हाल यह है कि दलित समाज के लोगों को पीट-पीट कर मार दिया गया। हिंदू को मार दिया गया जो मरी हुई गाय की चमड़ी निकालने के लिए उसे ले जा रहा था। सरकार तो अपनी जगह है, लेकिन एक तबका मुल्क के अंदर ऐसा फिरकापरस्त है जो यह समझ रहा है कि मुल्क में हमें आजादी मिली है। हम जो जी चाहे करें। कानून की हिफाजत करने वाले उन्हें कुछ न बोलें।

(वीडियो इंटरव्यू यहां देख सकते हैं।)

 

गाय के मुद्दे पर पहले अल्पसंख्यक अब दलित निशाने पर हैं?

आरएसएस के लोग अपने आपको आजाद समझ रहे हैं। वह मुल्क के अंदर बदअमनी की फिजा को कायम रखना चाहते हैं। उनके सामने एक चीज है कि मुल्क के अंदर सिर्फ एक ही समाज है जो मुल्क के अंदर हुकूमत करने वाला है और दलित इस लायक नहीं है कि वो मुल्क के अंदर चैन-सुकून से रह सकें। यही बात मुसलमानों और ईसाई के संदर्भ में भी है।

 

कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कोशिशें हैं कि दलितों और मुसलमानों को एक मंच पर लाया जाए, सियासी तौर पर यह असरदार होगा?        

मैं कोई सियासी आदमी नहीं हूं लेकिन अगर दलित-मुसलमान का गठजोड़ हो जाता है तो यह बहुत बड़ी ताकत होगी।

 

मुसलमान हर चुनाव में वोटबैंक की तरह यूज क्यों हो रहे हैं, राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों का कोई मजबूत नेता क्यों नहीं है?

यह सूरत-ए-हाल है और मैं भी इसे महसूस करता हूं। यह बदकिस्मती की बात है। जब भी चुनाव आते हैं तो मुस्लिम नेताओं का ध्यान कौम की तरफ आता है।

 

मुसलमानों के विकास पर अल्पसंख्यक मंत्रालय के गठन से लेकर आज तक अरबों रुपया खर्च हो चुका है लेकिन उनके हालातों में खास फर्क नहीं आया?

मै समझता हूं कि सरकारी विभागों द्वारा सुविधाओं को जिस स्तर तक पहुंचाना चाहिए वह नहीं पहुंचाया जा रहा है। मैं यह भी जानता हूं कि जो पैसा मुसलमानों तक पहुंचना चाहिए वह सही तरीके से नहीं पहुंच रहा है। सरकार को जिस प्रकार इसे संजीदगी से लेना चाहिए वह नहीं लेती। उदाहरण के तौर पर गरीबों के बीपीएल कार्ड ही ईमानदारी से नहीं बन पाते हैं। उसके लिए घूस मांगी जाती है। गरीब को यह भी नहीं पता होता कि इसकी शिकायत कहां करनी है।  

 

इस सरकार को मात्र दो वर्ष हुए हैं लेकिन कई मुद्दों पर देश कई मुद्दों पर बंटा हुआ नजर आरहा है?

इन्हें तजुर्बा नहीं है। इनके अंदर जो बेतजुर्बेकार लोग बैठे हुए हैं उनकी पॉलिसी यही है कि दिलों को दूर कर दो। हमारे एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने कहा भी था कि दिलों को जोड़ना बहुत मुश्किल काम था, इन्होंने आकर तोड़ दिया। हैरत होती है कि संसद के अंदर बैठे हुए लोग जब बाहर आते हैं तो आग उगलते हैं और दिलों को तक्सीम कर रहे हैं। सरकार को बोलना चाहिए लेकिन सरकार नहीं बोल रही है। (ऊना में दलित वाली घटना) अवाम को तो यह कहा गया कि गाय के मसले पर जो सियासत हो रही है उसे न होने दिया जाए, सवाल यह पैदा होता है कि सारी ताकत का मरकज (केंद्र) तो आपके हाथों में है, आपने अपनी ताकत का इस्तेमाल कैसे किया ? आप कुछ न करें और अवाम से कहें कि वो यह कर दें, अवाम क्यों करेंगे, आप अपनी ताकत का इस्तेमाल तो करें, 25 फीसद कीजिए, 35 फीसद कीजिए, 40 फीसद कीजिए, फिर अवाम से कहो कि जो रह गया है वो तुम करो, तो हो सकता है कि अवाम एक कदम आगे आए, लेकिन आप एक फीसद भी न करें और सारी ताकत आपके हाथ में है और अवाम से कहें कि तुम कर डालो। इस मसले में अगर समझदारी का सुबूत न दिया गया, जो लोग हालात खराब करने की कोशिश कर रहे हैं, सरकार का हाथ उनकी गर्दन तक नहीं पहुंचा और उनके हौसले को न तोड़ा गया तो हालात खराब होंगे।   


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