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'मोदी की सफलता मतलब भारत की सफलता’

राजेश सिरोठिया - JUN 02 , 2016
'मोदी की सफलता मतलब भारत की सफलता’
'मोदी की सफलता मतलब भारत की सफलता’
नरेंद्र बिष्ट

सिंहस्थ के आयोजन को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने आपको कई टिप्स दिए थे। अब मोदी इस आयोजन का आकलन किस तरह कर रहे हैं?

प्रधानमंत्री जी सिंहस्थ से संतुष्ट हैं। दरअसल, मोदी जी 'मैन ऑफ आइडियाज’ हैं। आइडिया का भंडार उनके पास है। वह कोई न कोई नई चीज और निकालते हैं कि ये और करें...वो करें। मेरे दिमाग में जो होता था मैं बताता था और फिर हम चर्चा करते थे। सिंहस्थ और वैचारिक कुंभ की कामयाबी इसी का प्रताप है।

सिंहस्थ के बाद मोदी ने आपसे क्या कहा है?

उन्होंने कहा कि इतना बड़ा आयोजन बगैर किसी विघ्न के कैसे संपन्न हो गया, इसकी केस स्टडी होनी चाहिए। तैयारियों का दस्तावेजीकरण होना चाहिए। इसका प्रजेंटेशन नीति आयोग के सामने करने को कहा है। सिंहस्थ से जुड़े अफसरों से भी हम यह पूछेंगे कि ऐसी क्या कमी रह गई, जिसे सुधारना चाहिए।  

आपको तो आडवाणी-सुषमा कैंप का माना जाता था। फिर मोदी के मुरीद कैसे हो गए?

भाजपा में कभी कोई ऐसी बात नहीं रही। आप तो बचपन से ही मुझे देख रहे हैं। खेमे का कोई सवाल नहीं है। सब हमारी पार्टी के नेता हैं और पार्टी में सभी का मान-सम्मान है। मोदी जी ने पहले गुजरात में और अब केंद्र में जो काम किया है, वह एक्सीलेंट है। एक कार्यकर्ता के नाते मुझे यह लगता है कि मोदी जी के पीछे हम जितनी ताकत लगा सकते हैं, लगाएं। मोदी जी की सफलता मतलब भारत की सफलता है। उनके आइडिया को सफल करना राज्य की जवाबदारी है। 

मोदी की अगुआई में केंद्र सरकार के दो साल के काम को कैसे देखते हैं? 

इस सरकार ने देश के बुनियादी ढांचे को तेजी से ठीक करने के प्रयास किए हैं। चाहे पोर्ट हो, एयरपोर्ट हो, हाईवेज हो- सभी की सूरत बदल रही है। सिंचाई जैसे बुनियादी विषय पर जोर डाला है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी चीजों पर जोर दिया है। 'मेक इन इंडिया’ अभियान ले आए, जिससे निवेश हो और भारत में चीजें बनें। प्रधानमंत्री जनधन योजना अच्छा प्रयोग है। देश की आर्थिक विकास दर बढ़ रही है। महंगाई घट रही है। गरीबों के कल्याण के लिए बीमा योजना है। महिलाओं के लिए गैस चूल्हा देने की स्कीम भी अच्छी है। फिर स्टार्ट अप इंडिया... कितनी गिनाऊं, जो पहली बार हो रही हैं। सबसे गर्व तो विदेश नीति पर है। अब पूरी दुनिया भारत की कायल है। वे ईरान गए और जो समझौते हुए, वे सभी ऐतिहासिक हैं। हर दिशा में मोदी जी प्रभावी वैश्विक नेता बनकर उभरे हैं।

लेकिन देश में बतौर प्रधानमंत्री लोग क्या उनसे मायूस नहीं हैं? 

जब मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब लोग उनमें प्रधानमंत्री ढूंढ़ते थे। आज वह प्रधानमंत्री हैं तो वैश्विक नेता ढूंढ़ते हैं। प्रधानमंत्री से एक मुख्यमंत्री की मुलाकात दस मिनट हो जाए तो बहुत होता था। लेकिन मोदी जी से मैं कभी भी 45 मिनट से कम नहीं मिला। सूखे के मामले पर वह चाहते तो सारे प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुला लेते। एक साथ बात कर लेते। लेकिन उन्होंने एक-एक राज्य के मुख्यमंत्री से इस विषय में घंटों बात की और समाधान के रास्ते खोजे।

 

केंद्र की आर्थिक नीतियों को लेकर देश भर में हाहाकार है और आप तारीफ कर रहे हैं?

कहीं हाहाकर नहीं मचा है। सब जगह शांति है। काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था पर अंकुश लगाया जा रहा है। इससे लग सकता है कि थोड़ी बहुत परेशानी हो रही है। लेकिन भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रभावी कदमों की जरूरत थी, इसलिए सख्ती की जा रही है।

मोदी के आने के बाद संघ और संघ के मुखिया मोहन भागवत का सरकारों में दखल घटा या बढ़ा?

न तो पहले भाजपा की राजनीति में संघ दखल देता था और न आज दखल है। हम शेयर करते हैं आइडियाज को। एक वैचारिक प्रतिबद्धता है। उसके लिए हम सब एक साथ काम करते हैं।  

आप कह रहे हैं कि मोदी जी आपको आइडिया देते हैं, लेकिन ग्रामोदय से भारत उदय का आइडिया तो मप्र ने ही दिया। आगे और क्या तैयारी है?

सच में मध्य प्रदेश अपनी तरफ से भी काम करता है और प्रधानमंत्री चूंकि पूरी शिद्दत और गंभीरता से प्रदेश और देश के विकास में लगे हैं तो उनकी भी इच्छा रहती है कि राज्य भी आइडिया दें। भारत उदय से पहले फसल बीमा योजना का कॉन्सेप्ट मप्र में तैयार हुआ था। उसको लांच किया। इस तरह के कई कार्यक्रम हैं। ग्राम उदय अभियान तो इतना अच्छा है कि इसे 10 दिन नहीं, 45 दिन चलना चाहिए। जब मैंने प्रधानमंत्री जी को इसकी अवधारणा बताई थी तो उन्हें बहुत पसंद आई।

क्या आप जीएसटी के मप्र मॉडल को अपनाने की सलाह देंगे? 

जीएसटी को लेकर हमारी केंद्र सरकार से कई बार बात हुई है। इसमें सुधार भी किया है। अब तो जीएसटी का केवल राजनीतिक कारणों से विरोध हो रहा है। हमने तो दो बातें की थीं। पहली यह कि राज्यों की आर्थिक स्वायत्तता बरकरार रहे और राजस्व वसूली में दिक्कत न आए।

आपको मुख्यमंत्री के रूप में काम करते तीसरी पारी का ढाई साल बीत गया, ढाई बचा है? आगे  क्या करेंगे?

इतने सारे काम करने हैं कि ढाई साल भी कम पड़ रहे हैं। प्रदेश के विकास का पूरा रोड मैप बना हुआ है। सिंहस्थ के विचार कुंभ से कई चीजें निकलकर सामने आईं। इन पर काम होना है। नदी बचाने का काम हाथ में लेना है। नर्मदा के दोनों किनारों पर पेड़ लगने हैं। वहां से यात्रा शुरू करनी है। 'मिनिस्ट्री ऑफ हेप्पीनेस’ का 'कॉन्सेप्ट’ आया कि लोगों की जिंदगी में कैसी खुशी रहे, आनंद रहे। इसलिए 'आनंद मंत्रालय’ के गठन का फैसला किया है। और इसे कसौटी पर भी कसा जाएगा। मैं नहीं कहता कि केवल मंत्रालय गठित करने से लोग प्रसन्न हो जाएंगे। लेकिन लोगों की लाइफ स्टाइल व सोच कैसे किस दिशा में जाए। भारतीय संस्कृति के पास ऐसे कई खदानें है। गीता का मंत्र जैसी कई चीजें हैं। उनमें से क्या-क्या इंप्लीमेंट कर सकते हैं, वह करें। शिक्षा के पाठ्यक्रम में कुछ बदलाव करना है। उद्देश्य है कि व्यक्ति चरित्रवान बने, परिश्रमी बने, देश भक्त बने, मानव कल्याण के लिए सोचे।

दस साल से ज्यादा वक्त बीत चुका है। एकरसता का भाव तो सरकार पर हावी नहीं हो रहा?

जब काम करने की तड़प होती है तो एकरसता नहीं आ सकती। यह समस्या तो उन लोगों के साथ होती है जो अपने पद को केवल प्रतिष्ठा का विषय मानते हैं। जिसके दिमाग में काम करने का जुनून हो, उसके मन में ऐसे भाव नहीं आ सकते।

क्या आपको नहीं लगता कि प्रदेश में बढ़ते अवैध उत्खनन की वजह राज्य और केंद्र सरकारों के बीच तालमेल की कमी है?

यह समस्या अभी की नहीं है। यूपीए सरकार के दौरान उपजी। वन और पर्यावरणीय अनुमति के सैकड़ों मामले लंबित हो गए थे। एक बात तो मानेंगे कि लोगों को रेत की आवश्यकता है। नदियों में मीलों तक रेत फैली हुई है। अगर आप वैध तरीकों से रास्ता नहीं खोलोगे तो लोग चोरी करेंगे। अब चंबल में 300 किमी लंबाई में रेत फैली है। कोई कितना पुलिस बल तैनात कर सकता है। हमने लंबित मामलों को निपटाने की पहल की है। केंद्र से अनुमति जल्द मिल रही है। मंत्री प्रकाश जावडेकर के आने के बाद समस्या कम हुई है। जावडेकर जी बहुत तेजी से फैसले ले रहे हैं।

आपकी सरकार के सकारात्मक पहलुओं पर नौकरशाहों की निरंकुशता का दाग क्यों हैं?

नौकरशाह नियंत्रण में हैं। ऐसी बातों का कोई मतलब नहीं है। नर्मदा को क्षिप्रा में लाना था तो हुआ। इसमें काहे का नौकरशाह? मैंने तय किया कि सिंहस्थ होगा, मंदिरों का जीर्णोद्धार होगा। हमने चार महादेव, चौरासी महादेव, मंगलनाथ से लगा कर सबका जीर्णोद्धार किया, हमने कहा कि अखाड़ों में स्थायी काम होंगे, अब इसमें काहे की नौकरशाही। जो फैसले हमने किए उसे नौकरशाहों ने जमीन पर उतारा। लाडली लक्ष्मी योजना, कन्यादान योजना किसने बनाई? महिलाओं को 50 प्रतिशत रिजर्वेशन का फैसला किसने किया? मुख्यमंत्री मजदूर सुरक्षा योजना किसने बनाई? ये बनाई शिवराज सिंह चौहान ने। नौकरशाहों ने उसे क्रियान्वित किया। 

कांग्रेस कह रही है कि देश को 'कांग्रेस मुक्त’ कहने वाले मोदी 2019 में देश को 'भाजपा मुक्त’ कर देंगे। आप क्या कहेंगे?

ऐसा तो वही कहेगा, जो पागल और सनकी हो।

आप पर जब कांग्रेस व्यक्तिगत प्रहार करती है तो कैसा महसूस होता है?

मुझे कुछ नहीं लगता। इससे उनका दिवालियापन ही जाहिर होता है।

मुख्यमंत्री के बाद आगे क्या सपने हैं?

मेरी कोई ख्वाहिश नहीं है। मैं चाहता हूं कि यह मानव जीवन प्रदेश की जनता की सेवा में बीते। जब तक सांस चले लोगों की सेवा करते रहें। इसी में अपने जीवन की सार्थकता है। 

आपको नहीं लगता है कि आगे और मुकाम हैं, जिन्हें तय करना है।

काहे के लिए लगेगा। दरअसल, मनुष्य का स्वभाव है कि जो नहीं होता है, वह करना चाहता है। जो होता है, वह नहीं करता। मैं गीता को मानता हूं। कर्म किए जाओ। चिंता मत करो। इसी में आनंद आता है।

उमा भारती जी तो सिंहस्थ को लेकर आपकी काफी तारीफ कर रही हैं।

उमा जी स्नेह करती हैं। उन्होंने केंद्रीय मंत्री के नाते जो मदद की है, वह बेजोड़ है। वह हमेशा देश की सेवा को तत्पर रहती हैं। हम सब भाई और बहन की तरह स्नेह से काम कर रहे हैं।

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विश्लेषण - मोदी की आंखों के नूर बन रहे शिवराज

मध्य प्रदेश के अपने हर दौरे में प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री की तारीफ में कसीदे काढ़े, ट्विटर पर भी खूब तारीफ की। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंखों का तारा बनने के लिए जमीन-आसमान एक कर रहे हैं। बीते तीन महीनों के दौरान उन्होंने तीन-तीन बड़े आयोजन किए। सीहोर के पास शेरपुर में किसानों का महासम्मेलन हुआ, जिसमें किसानों की फसल बीमा योजना के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया गया। इसके बाद 14 अप्रैल को महू में अंबेडकर जयंती के बहाने दलितों को भाजपा के पाले में लाने के लिए सम्मेलन किया गया। मोदी के सपनों का सिंहस्थ साकार करने के साथ ही वैचारिक कुंभ का आयोजन किया गया। प्रधानमंत्री बनने के पांच महीनों के भीतर इंदौर में ग्लोबल इन्वेस्टर मीट में भी मोदी शिवराज के मुरीद दिखे।

शिवराज ने इन तमाम आयोजनों के जरिये सबको दिखा दिया है कि बड़े इवेंट करने के मामले में वे नरेंद्र मोदी के सच्चे अनुयायी हैं। मोदी की किसी भी योजना को आगे बढ़ाने में वे फर्राटे भरते नजर आते हैं। मोदी भी कह चुके हैं कि उनके इरादों को जमीन पर उतारने के मामले में शिवराज का कोई सानी नहीं है। शिवराज के दस साल के कार्यकाल में मप्र सरकार की कई योजनाओं को देश-विदेश में शोहरत मिली है तो कई को दूसरे राज्यों ने भी अपनाया है। किसी आइडिया को योजना का रूप देने के मामले में भी शिवराज अच्छे फनकार हैं। इसी के चलते ग्रामोदय से भारत उदय की अवधारणा का मसौदा तैयार करने के लिए मोदी ने टीम शिवराज को ही चुना। आज पूरे देश में मप्र में तैयार मसौदे पर काम हो रहा है।

शिवराज को मूलत: लालकृष्ण आडवाणी का शिष्य माना जाता रहा है। भाजपा में लोग उन्हें सुषमा स्वराज के शिविर का प्रभावी नेता मानते रहे हैं। 2013 का चुनाव जीतने के बाद शिवराज को मोदी के बाद सर्व स्वीकार्य नेता के रूप में भी आंका जा रहा था। लेकिन 2014 में जब मोदी स्पष्ट बहुमत के साथ जीतकर आए तो राजनीतिक प्रेक्षकों के साथ ही विरोधियों को भी लगा कि शिवराज अब गए तब गए। लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद शिवराज दो साल से मप्र की गद्दी पर डटे हुए हैं। मोदी जब भी मप्र आते हैं तो शिवराज की तारीफ करना नहीं भूलते। गाहे बगाहे अपने ट्विटर पर भी शिवराज और मप्र का महिमा मंडन करके वह शिव विरोधियों के अरमानों पर पानी फेर देते हैं। राज्यों के विधानसभा चुनावों के अभियान में भी वह मप्र की तरक्की का जिक्र करना नहीं भूलते।

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद शिवराज जब पहली बार सौजन्य भेंट करने पहुंचे थे तो शिवराज ने उनसे बातचीत के दौरान सिंहस्थ का जिक्र छेड़ा था। 15 मिनट की निर्धारित मुलाकात 45 मिनट लंबी खिंच गई। मोदी ने उन्हें सिंहस्थ को लेकर कई टिप्स दे डाले। इसके बाद वह जब भी मिले, मोदी कोई न कोई आइडिया देते गए। मोदी चाहते थे कि सिंहस्थ के बहाने मप्र की देश विदेश में ब्रांडिंग हो। उज्जैन को ऐसा विकसित किया जाए कि वह देश में धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बनकर उभरे। शिवराज ने पूरी शिद्दत से काम करते हुए उज्जैन में मोदी के सपनों का सिंहस्थ साकार कर डाला। मोदी की स्मार्ट सिटी की योजनाएं तो देश में आकार लेंगी, लेकिन अब उज्जैन स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित हो चुका है। मध्य प्रदेश की सबसे पहली स्मार्ट सिटी। सच पूछा जाए तो नौकरशाहों के भरोसे सिंहस्थ की तैयारियां छोड़ने का जोखिम उठाने वाले शिवराज को जैसे ही पता चला कि इस आयोजन में पलीता लगने वाला है तो पहले उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद साथी कैबिनेट मंत्री भूपेंद्र सिंह को उज्जैन में झोंका और खुद भी सीधी निगरानी में जुट गए।

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