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जॉन्टी रोड्स इंटरव्यू: “टी-20 ने बाउंड्री बचाना ही खास बना दिया”

OCT 18 , 2020
जॉन्टी रोड्स इंटरव्यू: “टी-20 ने बाउंड्री बचाना ही खास बना दिया”
कैच पकड़ने की जोंटी रोड्स की खास शैली

क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट में फील्डिंग के निर्विवाद बादशाह तो जॉन्टी रोड्स ही कहलाएंगे। ब्रिसबेन में 1992 विश्वकप मैच में जब उन्होंने पाकिस्तानी खिलाड़ी इंजमाम-उल-हक को रनआउट करने के लिए किसी पक्षी की तरह हवा में गोता लगाया, तभी से वे फील्डिंग के शिखर पर स्थापित हो गए। 51 वर्षीय यह खिलाड़ी अब किंग्स इलेवन पंजाब का फील्डिंग कोच है। रोड्स के खांटी क्रिकेट सफर में भारत की खास अहमियत है। कश्मीर में स्नोबोर्डिंग, केरल में हाउस-बोटिंग, बंगाल की खाड़ी में सर्फिंग या आयुर्वेद और योग के दीवाने रोड्स का तखल्लुस ‘इंडिया’ भी हो सकता है, जैसा कि उन्होंने अपनी  बेटी का नाम रखा है। सौमित्र बोस के साथ दुबई में एक बेबाक बातचीत में रोड्स ने क्रिकेट, वेलनेस, समाजिक बुराइयों और स्वीडन की अपनी आगामी योजना के बारे में बात की। कुछ अंशः

जॉन्टी, आप कितनी शख्सियतों के धनी हैं- क्रिकेटर, बिजनेस बैंकर, पर्यटन एंबेसेडर, वेलनेस वक्ता, सर्फिंग के शौकीन, मोटरबाइकर...

मुझे लगता है, यह अनावश्यक जोखिम उठाए बिना अधिकतम जीवन जीने जैसा है। एकाध बार मेरी उंगलियां टूटीं, कुछ चोटें आईं, लेकिन मेरी कोशिश तकरीबन हर मौके को साधने की होती है। बेशक, मैं आधे भरे गिलास जैसा हूं, कुछ भरा, कुछ खाली। स्कूल में मैंने टेनिस, हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट खेली और मैं एथलीट भी था। मेरे टेनिस कोच कहते थे, मैं किसी में माहिर नहीं, मगर सब थोड़ा-थोड़ा जानता हूं। यही मेरी जिंदगी है।

यह तो कुछ ज्यादा ही विनम्र बात है। आखिर आप दो ओलंपिक खेलों में हॉकी खेल सकते थे लेकिन इंटरनेशनल क्रिकेटर हो गए। आप पॉइंट में शानदार फील्डर थे।

मेरी फील्डिंग में उन सभी खेलों का असर है, जो मैंने खेला है। हॉकी और फुटबॉल में मैं सेंटर-फॉर्वर्ड की पोजिशन में खेलते वक्त अंदाजा लगाता था कि गोलकीपर क्या करेगा। फील्डिंग में मैं खुद को गोलकीपर जैसा समझता रहा। टेनिस में सर्विस लौटाने के लिए बैकहैंड और फोरहैंड चलता है। इसलिए छलांग लगाकर आगे-पीछे होना पड़ता है। हॉकी में मैं तेजी से भाग सकता था क्योंकि स्टिक के आखिरी सिरे पर बॉल होती थी। हर खेल की तकनीक ने मेरे अंदर फील्डिंग का स्वाभाविक गुर विकसित कर दिया।  

आपका जन्म पीटरमारिट्जबर्ग में हुआ। महात्मा गांधी ने वहीं से 1893 में शोषण, रंगभेद और उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई शुरू की थी। आपको समाज में कोई बदलाव दिखता है?

लगता है, गांधी का अहिंसा का संदेश खो गया है। आज भी विरोध प्रदर्शनों की जरूरत पड़ती है, इसका मतलब तो यही है कि जिसकी लड़ाई उन्होंने लड़ी या जो बदलने की कोशिश की, वह अभी भी हासिल नहीं हुआ। हम रंगभेद या नस्लभेद के कई रूप आज भी देखते हैं और 26 साल के लोकतंत्र के बाद भी दक्षिण अफ्रीका में नस्ल बड़ा मुद्दा बना हुआ है। हमारा लोकतंत्र अभी अपरिपक्व है और दक्षिण अफ्रीका अभी अपने पैर नहीं जमा पाया है। लंबे समय तक हमारे पहले राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका को सतरंगी राष्ट्र कहा था। अफसोस! वह संदेश एक हद तक यह खो गया है।

दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट की हालत ठीक नहीं। क्या यह सामाजिक हालात का आईना है?

हमारा क्रिकेट बड़ी व्यवस्‍था का हिस्सा है। कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन ने साफ कर दिया कि अफ्रीका में भले राजनैतिक स्वतंत्रता है लेकिन आर्थिक गैर-बराबरी रंगभेदी राज जैसी ही आज भी बनी हुई है। हैरानी होती है कि यह कैसे जारी रहने दी जा रही है। हमारे यहां सरकार और कॉरपोरेट्स में काफी भ्रष्टाचार है। हमारे यहां भारी गैर-बराबरी है। लेकिन नस्लवाद दक्षिण अफ्रीका ही नहीं, बल्कि अमेरिका, यूरोप और दुनिया भर के दूसरे देशों में है। यह कट्टरता और भेदभाव का ही एक रूप है, जो दूसरों की हालात न समझने या दूसरों की संस्कृति को न पहचानने की फितरत से पैदा होता है।

आप भारत के बड़े प्रशंसक रहे हैं।

जब भी मैं भारत में होता हूं, तय करता हूं कि मुझे एक एनफील्ड (मोटरसाइकिल) मिले और मैं देश भर घूमूं। जमीन के 36,000 फुट ऊपर से आप संस्कृति का एहसास नहीं कर सकते। अफसोस, हमने अपने भीतर कितनी सीमाएं खींच ली हैं।

भारत में न जाने कितनी महिलाओं के साथ बलात्कार होते हैं, क्या इससे भारत के लिए आपका प्रेम प्रभावित हुआ है?

मैंने भारत का दसवां हिस्सा भी नहीं देखा है। इस मुद्दे पर उंगली उठाना ठीक नहीं होगा। लेकिन हां, दक्षिण अफ्रीका में महिलाओं-बच्चों के खिलाफ हिंसा होती है, जो हमें माहमारी से ज्यादा दुख देती है। भारत में जो हो रहा है, उस पर मैं नजर रखता हूं। किसी पितृसत्तात्मक समाज में इस तरह के मुद्दे होते हैं। भारत में पैदा हुई अपनी बच्ची (2015 में) का नाम हमने ‘इंडिया’ रखा है। देश की समृद्धि के लिए बेटियां बहुत जरूरी हैं। लड़कियों का मुद्दा दुनिया भर में है। यह दुखद स्थिति सिर्फ भारत में ही नहीं है।

आपने बेटी का नाम ‘इंडिया’ क्यों रखा?

मेरी पत्नी मेलेनी योग शिक्षक और आर्किटेक्ट हैं। वे वेदांत दर्शन में विश्वास रखती हैं। इसलिए भारत में बेटी का जन्म उनके लिए वास्तव में एक आध्यात्मिक अनुभव था। लेकिन बेटी का नाम ‘इंडिया’ रखने की मेलेनी की वजह मुझसे थोड़ा अलग है। मेरे लिए यह विविधता का अनुभव है...हर बार जब मैं नरीमन पॉइंट से वानखेड़े स्टेडियम तक बाइक से गया, तो कुछ अलग अनुभव हुआ। यह अतुलनीय है।

आपके बेटे नाथन का जन्म 2017 में हुआ। आपने ‘भारतीय’ नाम के बारे में नहीं सोचा?

देखिए, हम नहीं चाहते कि भारतीय यह सोचें कि बेटी का नाम ‘इंडिया’ रखना मार्केटिंग पॉलिसी थी क्योंकि इसकी हमें सराहना मिली थी। हम नहीं चाहते थे कि लोग कहें, अब जॉन्टी को बेटा हुआ तो उसका नाम भारत रखा है! यह तो मार्केटिंग 2.0 जैसा है।

आप भारत की वेलनेस कंपनी से जुड़े हैं...

पांच साल की बातचीत के बाद मैं वी आर वेलनेस का निदेशक बन गया हूं। भारत में लोग बॉलीवुड अभिनेताओं को देखते हैं और खासकर पुरुष चाहते हैं कि उनके बाजू गठीले और सिक्स पैक एब्स हों। लेकिन एक एथलीट के नजरिये से मैं बताऊं कि आप सब कुछ खानपान से नहीं पा सकते। मजबूती और स्वास्थ्य के लिए प्राकृतिक उपचार एक रास्ता है।

आपने स्वीडन का कोच बनना क्यों चुना?

मैंने पिछले दो साल से आइपीएल से ब्रेक लिया हुआ है। मैं बुनियादी स्तर की कोचिंग कर रहा हूं। मेरे माता-पिता शिक्षक थे और मुझे शिक्षक बनना बहुत पसंद है। मैंने दक्षिण अफ्रीका में वंचित बच्चों के साथ समय बिताया है। मैं दो बार नेपाल, जिम्बाब्वे भी गया हूं। उन इलाकों में ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की है जहां युवा खिलाड़ियों को ही नहीं, कोच को भी प्रशिक्षण की जरूरत है। मैं यूरोप और उत्तरी अमेरिका के क्रिकेट पर भी नजर रखे हूं, ये बाजार उभर रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका में दो तिमाहियां नकारात्मक वृद्धि में गुजरी थीं; महामारी के प्रकोप के पहले ही, हम वित्तीय संकट में घिर गए थे और बेरोजगारी की दर 35 प्रतिशत से अधिक हो गई थी। मेरी पत्नी आर्किटेक्ट हैं और स्वीडिश डिजाइन और वहां की स्कूली शिक्षा प्रणाली की बड़ी प्रशंसक हैं। स्वीडन समाजवादी देश है और उसकी सबको समान शिक्षा की दुनिया भर में प्रशंसा होती है। क्रिकेट के मामले में स्वीडन में खास महारत नहीं है लेकिन पिछले तीन साल में यहां यह खेल 300 फीसदी से ज्यादा बढ़ गया है। मुझे टेस्ट मैच खेलने वाले देश में कोच बनने की कतई इच्छा नहीं है, किसी आइपीएल टीम का मुख्य कोच बनने की भी ख्वाहिश नहीं है। हम सपरिवार स्वीडन जाने वाले हैं। हम दिसंबर के मध्य में वहां जाएंगे।

ट्वेंटी-20 से फील्डिंग कैसे बदली? आप स्वीडिश खिलाड़ियों को क्या बताएंगे? जॉन्टी जैसी फील्डिंग करें या निकोलस पूरन जैसी?

बाउंड्री पर फील्डिंग अहम बन गई है। पॉवर प्ले आने से पहले ऐसा नहीं था। ट्वेंटी-20 में बल्लेबाज हवा में शॉट खेलते हैं। बाउंड्री को बचाना, कैच पकड़ना ऐसा है जिसका हम अभ्यास करते हैं। पूरन ने कैच पूरा नहीं लिया, लेकिन उन्होंने जो चार रन बचाए, वे जीत और हार का अंतर हो सकते हैं। आपको कम से कम सात ऐसे बढ़िया एथलीट चाहिए, जो हर कोण पर खेल सकें।

नब्बे के दशक में फील्डिंग कैसी थी?

बल्लेबाज अलग तरह के थे, कोई पॉवरप्ले नहीं था और ऑफ स्पिनर के लिए बैकवर्ड पॉइंट या मिड-विकेट या लेफ्ट आर्म स्पिनर के लिए शॉर्ट कवर के अलावा कहीं और जाने की जरूरत नहीं थी। दक्षिण अफ्रीका के पास डोनाल्ड, मैकमिलन, पोलक और क्लूजनर ‌की आक्रमक गेंदबाजी थी। उन दिनों पहले छह ओवर तो आप घेरे में ही रहते थे और उसके बाद खिलाड़ी एक्शन में आते थे- लॉन्ग ऑन, लॉन्ग ऑफ, काउशाट कॉर्नर और ऐसी ही जगहों पर टीम के अच्छे फील्डर होते थे। अब तो 1992 में मेरी गोते लगाने वाली शैली भी फैशन में नहीं है!

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