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“यह तो कैश फॉर वोट बजट है”

हरिमोहन मिश्र - FEB 08 , 2019
“यह तो कैश फॉर वोट बजट है”
पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा
त्रिभुवन तिवारी
हरिमोहन मिश्र

नब्बे के दशक में चंद्रशेखर सरकार और फिर पहली एनडीए सरकार में वित्त मंत्री रह चुके यशवंत सिन्हा मौजूदा मोदी सरकार के छठवें बजट को संवैधानिक मर्यादाओं का घोर उल्लंघन मानते हैं। आजकल विपक्षी एकता की पहल में सक्रिय सिन्हा से अंतरिम बजट के साथ मौजूदा हालात के बारे में हरिमोहन मिश्र ने विस्तार से बातचीत की। कुछ अंशः

कहा तो गया अंतरिम बजट मगर साथ में फाइनेंस बिल भी रख दिया गया। यह कितना जायज है और इसे हम क्या समझ सकते हैं?

अंतरिम बजट और फाइनेंस बिल का फर्क समझना जरूरी है। संविधान में बजट शब्द नहीं, सिर्फ एनुअल फाइनेंशियल स्टेटमेंट (सालाना वित्तीय लेखा-जोखा) का जिक्र है। लेकिन पार्लियामेंट्री प्रैक्टिस में बजट आ गया है। तो, बजट और अंतरिम बजट में अंतर क्या है? अंतरिम बजट के बारे में संविधान में धारा-116 में प्रावधान है, जिसमें कहा गया है कि सरकार साल के कुछ महीनों के व्यय के लिए संसद में प्रस्ताव ला सकती है। इसका तकनीकी टर्म है वोट ऑन अकाउंट (लेखानुदान)। जब पूरा बजट आता है, तो उसके पहले आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया जाता है। इस बार नहीं किया गया, क्योंकि पूरा बजट नहीं था। अंतरिम बजट में आप भविष्य के बारे में घोषणा तो कर सकते हैं, लेकिन नए खर्च की बात नहीं कर सकते। जैसे, इस बार धड़ल्ले से किया गया। फिर, आप अंतरिम बजट के साथ वित्त विधेयक यानी फाइनेंस बिल नहीं ला सकते। फाइनेंस बिल का मतलब है करों में संशोधन करना। अंतरिम बजट में आप करों में संशोधन नहीं कर सकते हैं। अरुण जेटली ने न्यूयॉर्क से टिप्पणी की कि प्रणब मुखर्जी ने 2009 और चिदंबरम ने 2014 में किया था। लेकिन उन्होंने अप्रत्यक्ष करों में संशोधन किया था, प्रत्यक्ष कर में नहीं। प्रत्यक्ष कर में संशोधन फाइनेंस बिल से होता है। इसीलिए मेरा मानना है कि इन लोगों ने फाइनेंस बिल और खर्च का नया आइटम लाकर अंतरिम बजट को खत्म कर दिया। इसे रेगुलर बजट ही माना जाए। संविधान की 70 साल की परंपराओं को इस सरकार ने खत्म कर दिया। संविधान और संसद की परंपराओं का उल्लंघन बेहद चिंताजनक है।

इससे संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है?

यह बात संसद में विपक्ष को उठानी चाहिए। उन्हें पूछना चाहिए कि अंतरिम बजट में फाइनेंस बिल कब आया, अंतरिम बजट में खर्च का नया स्वरूप कब आया? सरकार के पास उत्तर नहीं होगा। इसलिए संसद में जब बहस होगी, ये बातें उठनी चाहिए।

सरकार फाइनेंस बिल पास भी करा लेगी?

करा लेंगे। देखा नहीं आपने, लोग कैसे मेज थपथपा रहे थे। मोदी जी तो ऐसे थपथपा रहे थे, जैसे वे उस डेस्क को ही तोड़ देंगे।

मोदी कह रहे हैं कि यह तो ट्रेलर है।

हां, उनका कहा सच हो सकता है कि फिल्म ट्रेलर तक सिमट कर रह जाए, आगे बढ़ेगी ही नहीं।

बजट में कुछ वर्गों को रियायत देने की कोशिश है, उन रियायतों की हकीकत क्या है?

मैं बहुत बेबाकी से कहना चाहता हूं कि इस बजट में सरकार ने तीन वर्गों को टार्गेट किया। एक किसान, दूसरा मध्यम वर्ग और तीसरे असंगठित क्षेत्र के मजदूर। किसानों के लिए 6000 रुपये की इनकम सपोर्ट स्कीम लाई गई। मध्यम वर्ग को पांच लाख रुपये तक की इनकम पर रिबेट दी गई। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए नई पेंशन स्कीम है, जिससे 60 साल के बाद प्रति माह 3000 रुपये मिलेंगे। देखा जाए तो इन तीनों प्रावधानों का मकसद एक ही है कि इन वर्गों का वोट भाजपा को मिले। अगर कोई उम्मीदवार वोटरों को नकद 2000-3000 रुपये देकर उसके बदले वोट मांगता है तो यह बिलकुल गैर-कानूनी और नाजायज है। उस उम्मीदवार को जेल हो सकती है। सरकार ही यह करे तो क्या कहेंगे। इसलिए मेरी राय में यह कैश फॉर वोट बजट है।

इसे दिसंबर से लागू किया गया है? क्या पिछली तारीख से लागू करने का प्रावधान है?

कोई भी खर्च रेट्रोस्पेक्टिव लागू नहीं होता है। मेरी जानकारी में अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। यह टैक्स में लागू होता है, वह भी अप्रत्यक्ष कर में नहीं। प्रत्यक्ष कर या वेतन वगैरह कई बार पिछली तारीख से लागू किया गया है। लेकिन इस बजट में नया खर्च दो महीना पहले से लागू कर दिया है, जिसमें लोगों को राशि चुनाव से पहले दी जाएगी। यही नहीं, रकम मोटी करने के लिए इसे दिसंबर से लागू किया, ताकि मार्च तक 2,000 रुपये किसानों को दिया जा सके। फरवरी से करते तो 1,000 रुपये ही आता।

मान लीजिए सरकार फाइनेंस बिल पास करा लेती है और नई सरकार जो आएगी, वह भी बजट पेश करेगी, तो उस स्थिति में क्या होगा?

चुनाव के बाद नई सरकार को तो पूरा बजट पेश करना ही है। वह इकोनॉमिक सर्वे और नया फाइनेंस बिल लाएगी। उस सरकार को फैसला करना होगा कि इनके फैसलों को कायम रखना है या बदलना है। हो सकता है नई सरकार इससे बेहतर योजना ले आए।

मतलब नई सरकार कर सकती है?

हां, कर सकती है। इन्हें पांच साल के लिए चुना गया था और ठगी करके छह बजट पेश कर दिए।

अभी जीडीपी के जो आंकड़े जारी हुए, उसमें नोटबंदी के दौर में भी आठ फीसदी से ज्यादा वृद्धि बताई गई है। इसे आप कैसे देखते हैं?

इसे मैं बहुत ही गंभीरता और सख्त अफसोस के साथ देखता हूं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। मैं जब वित्त मंत्री था, तो आंकड़ों को अधिक यथार्थवादी और चुस्त बनाने के लिए सी. रंगराजन के नेतृत्व में एक आयोग बनाया। उसकी रिपोर्ट के आधार पर संसद में एक नया बिल आया। सांख्यिकी मंत्रालय में नेशनल कमीशन ऑन स्टैटिसटिक्स बनाया गया। प्रावधान यह है कि इसमें  एक्सपर्ट रहेंगे और ये सारे आंकड़ों की जांच कर लेंगे, तब उसे जारी किया जाएगा। इस सरकार ने आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ करना शुरू किया। लेबर ब्यूरो का काम रोक दिया। छेड़छाड़ इतनी बढ़ गई कि नेशनल स्टैटिसटिक्स कमीशन के बचे दो स्वतंत्र सदस्यों ने भी इस्तीफा दे दिया। मुझे तो इस सरकार के किसी आंकड़े पर भरोसा नहीं है, जो बजट पेश हुआ उसके आंकड़ों पर भी भरोसा नहीं है।

जैसे राजकोषीय घाटा 3.4 फीसदी दिखाया...

जो राजकोषीय घाटा दिखाया है, उसका ट्रिक यह है कि प्राप्ति को अधिक और खर्च को कम करके दिखाओ। दूसरा यह कि इस साल का खर्च अगले साल शिफ्ट कर दो। तो ये चालबाजियां की गई हैं।

राजकोषीय घाटा कितना होगा?

मुझे राजकोषीय घाटे से ज्यादा चिंता राजस्व घाटे की है। राजस्व घाटा जीडीपी का 2.2 फीसदी है, इस साल और अगले साल दोनों के लिए। 2.2 फीसदी रेवेन्यू डेफिसिट है और राजकोषीय घाटा 3.4 फीसदी है, तो 1.2 फीसदी हुआ इफेक्टिव रेवेन्यू डेफिसिट। यानी सरकार गैर-उत्पादक खर्च ज्यादा कर रही है।

इस सरकार का सबसे बड़ा विवाद क्या है?

इस सरकार का सबसे बड़ा अपराध यह है कि इसने देश के प्रजातंत्र, प्रजातांत्रिक संस्थाओं, परंपराओं, मान्यताओं सबको ध्वस्त कर दिया। सब कुछ पीएमओ से कंट्रोल हो रहा है। मीडिया जो चौथा स्तंभ है उस पर भी कठोर नियंत्रण है। ये जो चाहते हैं वही खबरें छपती हैं। यह सबसे बड़ा अपराध है।

बजट और 10 फीसदी आर्थिक आरक्षण से एनडीए को चुनाव में लाभ मिलेगा?

कुछ लाभ से इनकार नहीं कर सकते हैं। लेकिन मेरा अनुभव है कि आप चुनाव से ठीक पहले जो भी घोषणा करते हैं, उसका असर नहीं होता है, क्योंकि लोग समझते हैं कि यह चुनाव के लिए किया गया है। पांच साल पहले राजस्थान के चुनाव में मुख्यमंत्री गहलोत ने मुफ्त में दवा देने की घोषणा की थी। उसका क्या असर पड़ा? कांग्रेस बुरी तरह हारी।

विपक्ष की एकजुटता होती तो दिख रही है, मगर उसमें कई तरह की पेचीदगी भी है। ऐसे में भाजपा की संभावना क्या बेहतर हो सकती है?

दोनों पक्ष हैं। यूपी में जो हुआ उसमें एक तर्क दिया जा रहा है कि कांग्रेस का वोट ट्रांसफर नहीं होता है। उनको लगता है कि कांग्रेस को गठबंधन से बाहर छोड़ने से वह भाजपा का ज्यादा वोट कटेंगे। उसके विपरीत दूसरी बात है कि अल्पसंख्यकों का वोट बंट जाएगा। अब प्रियंका गांधी भी आ गई हैं, तो इसलिए ऐसा हो सकता है। देखा जाए कि ये लोग इसी रास्ते चलेंगे या इसमें कुछ बदलाव लाते हैं।

प्रियंका के आने से कांग्रेस को लाभ होगा?

हां, प्रियंका के आने से कांग्रेस को लाभ होगा। वोट के मामले में लाभ होगा। लेकिन मैं यह कहना चाहूंगा कि कांग्रेस का झारखंड, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र में सहयोगियों से समझौता तय हो गया है। सिर्फ उत्तर प्रदेश में पेच फंस रहा है। हां, दिल्ली और पंजाब में भी आप के साथ। हरियाणा में भी है।

आप जैसे लोगों की पहल है कि सभी दल भाजपा के खिलाफ एक उम्मीदवार खड़ा करें। उसमें कितनी सफलता मिल रही है?

मुझे लगता है कि चुनाव आते-आते अधिकांश सीटों पर ऐसा हो जाएगा। शायद बंगाल में ममता-कांग्रेस में नहीं हो पाएगा। ओडिशा में बीजद अपने रास्ते चल रही है। लेकिन वहां क्षेत्रीय पार्टियां इतनी मजबूत हैं कि वे भाजपा को झेल लेंगी। फिर पूर्वोत्तर में भाजपा की उम्मीद धराशायी होती जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट के रवैए पर आपकी राय?

हाल में जो दो बड़े फैसले आए, राफेल और सीबीआइ के मामले में। दोनों को देखकर आश्चर्य होता है कि ऐसे फैसले कोई कोर्ट कैसे सुना सकता है। हमने राफेल मामले में रिव्यू पेटीशन लगाया है क्योंकि तथ्यों पर तो फैसला है ही नहीं। जैसे एयरफोर्स के अफसरों को बुला लिया। उनसे पूछा कि विमान किस जेनरेशन के हैं। उन्होंने प्रक्रिया के बारे में कुछ नहीं कहा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि उन्होंने भी प्रक्रिया में गलती नहीं मानी है। उनका साक्ष्य तो रिकॉर्ड में है। तो तथ्यात्मक गलती कैसे हो सकती है, सुप्रीम कोर्ट के फैसले में। इसी तरह सीबीआइ का मामला है।

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