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कश्मीर मुद्दे पर आइएएस की नौकरी से इस्तीफा देने वाले कन्नन गोपीनाथन से विशेष बातचीत

SEP 08 , 2019
कश्मीर मुद्दे पर आइएएस की नौकरी से इस्तीफा देने वाले कन्नन गोपीनाथन से विशेष बातचीत
दानिक्स काडर के 2012 बैच के आइएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन
“जम्मू-कश्मीर में लोगों की अभिव्यक्ति पर पहरा बिठा देने के खिलाफ व्यवस्था के भीतर से उठी इसे इकलौती आवाज कह सकते हैं। दादर नगर हवेली में कार्यरत दानिक्स काडर के 2012 बैच के आइएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन ने कश्मीर के हालात पर घुटन महसूस करने की वजह से 21 अगस्त को आइएएस की नौकरी से इस्तीफा देकर नई सुर्खियां हासिल कर लीं। इसके पहले अपने गृह प्रदेश केरल में बाढ़ पीड़ितों की मदद करने के अपने निजी प्रयास से भी वे सुर्खियों में आ चुके हैं। तो, कन्नन के मौजूदा फैसले की वजह, काम के दौरान उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा और आगे वे क्या रास्ता अपनाएंगे, इन सब मुद्दों पर एसोसिएट एडिटर प्रशांत श्रीवास्तव ने उनसे विस्तृत बातचीत की। प्रमुख अंशः”

कश्मीर पर सरकार के फैसले में ऐसा क्या लगा, जिससे आपने आइएएस जैसी प्रतिष्ठित सेवा से इस्तीफा दे दिया?

मैंने इस्तीफा इसलिए नहीं दिया कि सरकार ने कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया और अनुच्छेद 35ए को खत्म किया। सरकार कोई भी फैसला लेने का हक रखती है। फैसला संवैधानिक है या नहीं, यह तय करना सुप्रीम कोर्ट का काम है। मेरा विरोध इस बात पर है कि सरकार ने इस फैसले पर कश्मीर के लोगों को बोलने का मौका नहीं दिया। उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को दबा दिया गया। हमारा लोकतंत्र इतना कमजोर और मजबूर नहीं है कि इस डर से लोगों को बोलने नहीं दिया जाए कि फैसले का विरोध होगा। यह तो पूरी तरह गलत है। अगर देश का नागरिक कोई भी बात कहने से पहले डरे, तो यह किसी भी तरह सही नहीं है। हर नागरिक के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। इसके अलावा मुझे ऐसा लग रहा है कि चाहे मीडिया हो, न्यायपालिका हो या फिर सिविल सोसायटी, सब जगह ऐसी धारणा बन गई है कि अगर आप सरकार के किसी फैसले के खिलाफ बयान देंगे तो वह एंटी-नेशनल हो जाएगा। हम उस ठप्पे से डरने लगे हैं। ये बातें मुझे कचोट रही थीं। साथ ही ज्यादातर लोग इस बदलाव के असर को महसूस नहीं कर रहे हैं। इसलिए मैंने इस्तीफा दे दिया।

आपको क्यों लगता है कि लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खत्म होने के खतरे को महसूस नहीं कर रहे हैं?

असल में हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक सिद्धांत के रूप में देखते हैं। उसे अपने स्तर पर नहीं देखते हैं। मसलन यह नहीं देखते हैं कि इसका एक व्यक्ति के स्तर, पंचायत के स्तर, जिला स्तर, राज्य स्तर और राष्ट्र के स्तर पर क्या असर होगा? जरा सोचिए, कश्मीर जैसा निर्णय आप के ऊपर लागू हो जाए। और वहां की घटनाओं पर मीडिया यह कहे कि सब कुछ ठीक है। मीडिया ऐसा इसलिए करे क्योंकि अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो देश की छवि खराब होगी, पड़ोसी मुल्क उसका फायदा उठाएगा तो सोचिए आप पर क्या बीतेगी। इन चीजों को सोचकर हम अपने घर के मुद्दे पर कोई फैसला न करें, जिसका हमारे लोकतंत्र पर सीधा असर होने वाला है। यह कहां तक ठीक है?

तो क्या आप कश्मीरियों की आवाज बन कर खड़े होंगे?

इस्तीफा देते समय मैंने ऐसा कुछ नहीं सोचा। न ऐसा मैंने किसी सिद्धांत की वजह से किया है। मुझे नहीं पता कि आगे मैं क्या करूंगा। यह सब प्लान करके नहीं किया। मुझे इन सब चीजों को लेकर बेचैनी होने लगी थी। इसे व्यक्त करने के लिए ट्वीट करता था। उसमें भी गोल-मोल रवैया रखता था क्योंकि खुलकर नहीं बोल सकता था। सरकारी नौकरी में रहकर ऐसा करना मेरे लिए संभव नहीं था। इसलिए मैंने इस्तीफा देना ही बेहतर समझा। मैं चाहता था कि लोगों तक यह संदेश दे सकूं कि हमें लोगों की पीड़ा समझनी चाहिए, उदासीन रवैया ठीक नहीं है। अगर हम ऐसे रहेंगे, तो कल कोई दूसरा फैसला होगा और कहा जाएगा कि इस पर विरोध करने का हम अवसर नहीं देंगे। यह लोकतंत्र के लिए किसी भी सूरत में सही नहीं होगा।

इस्तीफा देते वक्त आपके परिवार और साथियों की क्या प्रतिक्रिया रही?

देखिए, कश्मीर मसले पर बहुत-से साथी मानते हैं कि वहां गलत हो रहा है लेकिन इस पर कोई बोलेगा नहीं। ऐसा वे शायद डर की वजह से कर रहे हैं या फिर सोचते हैं कि इससे मुझे क्या फर्क पड़ता है? ऐसे में जब मैंने इस्तीफा दिया तो कई साथियों ने कहा अरे यह क्या कर रहे हो? आइएएस की नौकरी इतनी-सी बात पर कोई छोड़ता है क्या? कुछ लोगों ने कहा, कौन-सा तुम्हारे यहां कुछ हो रहा है, भावुक मत बनो। लेकिन जब मैंने उन्हें अपनी बात समझाई तो भले ही वे लोग मेरी बात से सहमत नहीं थे, लेकिन मेरे फैसले का उन्होंने सम्मान किया। इसके अलावा मुझे मेरे परिवार से भी पूरा सहयोग मिला।

भारत में आइएएस की नौकरी बेहद प्रतिष्ठित है। ऐसे में इस तरह बीच में निराश होकर नौकरी छोड़ने से क्या गलत संदेश नहीं जाता है?

मैं भागा नहीं हूं। अगर ऐसा होता तो मैं इस नौकरी में ही क्यों आता? मैं पिछले सात साल से नौकरी कर रहा था। इस दौरान कई चुनौतियां आईं लेकिन मैं उससे डरा नहीं। आइएएस बनने की ख्वाहिश रखने वाले युवाओं से मैं कहना चाहता हूं कि यह सर्विस जितना अच्छा काम करने का मौका देती है, वैसा आपको दूसरी जगह नहीं मिलेगा। इसके अलावा यहां सीखने को बहुत मिलता है। लेकिन एक नकारात्मक बात जरूर है कि अगर कुछ गलत हो रहा है तो उसमें सुधार करना इस नौकरी में थोड़ा मुश्किल है। अच्छा काम करने के लिए बहुत जगह है। कई बार अधिकारी रहकर आप जानते हैं कि गलत हो रहा है लेकिन उसे ठीक करने में असहाय महसूस करते हैं। खास तौर पर अगर वह आपके विभाग का मामला नहीं है। ऐसी स्थिति में कुढ़न महसूस होती है।

आपको गृह मंत्रालय से नोटिस भी मिला था, कहीं इस वजह से तो इस्तीफा नहीं दिया?

(हंसते हुए) जून-जुलाई में मुझे यह नोटिस मिला था। मुझसे पूछा गया था कि आपने प्रधानमंत्री पुरस्कार के लिए नामांकन क्यों नहीं भरा? केरल में जब बाढ़ आई थी तो मैं अपने स्तर पर बाढ़ राहत कार्य के लिए गया था, उस पर पूछा गया कि टूर रिपोर्ट क्यों नहीं पेश की? एक फाइल मैंने एमडी से सीधे चैयरमैन को भेज दी, तो उस पर सवाल किया गया कि सीधे फाइल क्यों भेज दी, पहले सलाहकार को फाइल भेजनी चाहिए थी। इस तरह के सवाल क्यों पूछे जाते हैं, आप ब्यूरोक्रेसी में किसी से भी पूछ लीजिए समझ में आ जाएगा। असल में लोकसभा चुनाव के दौरान एडमिनिस्ट्रेटर ने नोटिस के रूप में मुझसे कुछ अटपटे सवाल पूछे थे, जिसमें कहा गया था कि आपके काम उम्मीद के अनुसार नहीं थे। उस वक्त चुनाव आचार संहिता लगी हुई थी। ऐसे में मैंने उस नोटिस को चुनाव आयोग के पास भेज दिया था। इसके बाद आयोग ने एडमिनिस्ट्रेटर को नोटिस वापस लेने को कहा था। इसके बाद मुझे इस बात का अंदेशा हो गया था कि कुछ न कुछ जरूर होगा। लेकिन इस तरह के फर्जी आरोपों पर क्या कोई नौकरी छोड़ता है? मुझे तो पांच अगस्त को अतिरिक्त जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं।

आइएएस के अनुभव से आप सिस्टम में क्या अहम बदलाव चाहते हैं?

अभी हमारे काम करने का सिस्टम पूरी तरह सप्लाई पर आधारित है। यानी कोई अच्छा अधिकारी आएगा तो बेहतर काम होगा। लेकिन अधिकारी अच्छा नहीं है तो काम प्रभावित होगा। ऐसा नहीं होना चाहिए। सिस्टम डिमांड आधारित होना चाहिए। अधिकारी कोई भी हो, काम अच्छा होना चाहिए। ऐसा करना संभव है अगर मीडिया, सिविल सोसायटी और लोग अपनी आवाज उठाएं। लोग अगर सवाल करेंगे, अपना हक मांगेंगे तो काम खुद ही अच्छा होगा। अधिकारी की जवाबदेही ज्यादा बढ़ जाएगी। कुल मिलाकर सुशासन किसी अच्छे अधिकारी के भरोसे नहीं होना चाहिए।

अब आगे क्या करने की योजना है, क्या राजनीति में आएंगे?

सबसे पहले तो रेग्युलर इनकम की व्यवस्था करना है, क्योंकि अब मेरे पास कोई नौकरी नहीं है। अच्छी बात यह है आइएस में जितनी सैलरी मिलती है, उस वेतन की नौकरी कहीं न कहीं मिल जाएगी। लोगों से जुड़ा हुआ कोई काम करना है। राजनीति में जाऊंगा कि नहीं, अभी मुझे कुछ नहीं पता है। सही मायने में अभी तक मैंने कुछ नहीं सोचा है। अभी मैं कोई नौकरी करना चाहता हूं। मेरे पास तो अभी अपना घर भी नहीं है। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जब मेरे क्षेत्र के लोगों को पता चला तो एक शख्स ने अपनी जमीन का एक हिस्सा मुझे देने का ऑफर कर दिया। कहा आप यहीं घर बना लीजिए। यह प्यार ही मेरे लिए बहुत है। जहां तक राजनीति में आने की बात है तो अगर कोई ऐसा करता है तो उसमें कुछ गलत नहीं है। बस आगे बढ़ने के लिए गलत तरीका नहीं अपनाना चाहिए। हमारे प्रधानमंत्री से लेकर विपक्ष के नेता सभी तो राजनीति में हैं। आखिर हम पिछले 70 साल से ज्यादातर नेताओं से ही प्रभावित होते रहे हैं।

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