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“मोदी स्टाइल से बढ़ी मुश्किलें”

OCT 18 , 2018

पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम अर्थव्यवस्था की नब्ज पहचानने वाले देश के चुनिंदा नेताओं में गिने जाते हैं। एच.डी. देवेगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार में अपने 'ड्रीम बजट' के लिए खासे चर्चित चिदंबरम तीन सरकारों में वित्त मंत्रालय का कामकाज संभाल चुके हैं। इन दिनों वे देश की अर्थव्यवस्था की चिंताजनक तसवीर से खासे विचलित हैं। देश की अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों और आम आदमी पर असर समेत तमाम मुद्दों पर उन्‍होंने आउटलुक के संपादक हरवीर सिंह और एसोसिएट एडिटर प्रशांत श्रीवास्तव के साथ लंबी बातचीत की। मुख्य अंश :

जिस तरह से वित्त मंत्रालय को चलाया जा रहा है। पिछले दिनों वहां एक अस्थायी व्यवस्था रही। क्या देश की इकोनॉमी के लिए सबसे अहम मंत्रालय की यह कार्यशैली सही है?

भाजपा सरकार बहुत ज्यादा केंद्रीकृत तरीके से काम कर रही है। सभी प्रमुख फैसले प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा लिए जाते हैं। आप निजी तौर पर किसी भी मंत्री से पूछेंगे या बात करेंगे तो आपको यह पता चल जाएगा कि वे फैसले नहीं लेते। सारे फैसले साबित करते हैं कि सरकार कितनी केंद्रीकृत है। यह संबंधित मंत्रालयों को सचिवों के जरिए दिए जाते हैं। यह उनके काम करने का तरीका है, जिसका नतीजा देश को भुगतना पड़ रहा है। यह सही है कि लंबे समय तक जेटली की गैर-मौजूदगी से नुकसान हुआ जबकि उस समय जिस मंत्री को जिम्मेदारी मिली उनके पास पहले से ही कई मंत्रालय थे। लेकिन मैं यह नहीं बता सकता कि क्या होना चाहिए। भाजपा सरकार को ही इसका समाधान खोजना होगा।

पेट्रोल-डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों की आलोचना के बावजूद सरकार ने पिछले दिनों जो मामूली राहत दी, उसे कैसे देखते हैं?

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कटौती सरकार ने पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए की है। इसके पहले भी गुजरात चुनाव के समय जीएसटी रेट में कटौती कर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की गई थी। सरकार 10 बार कीमत बढ़ाने के बाद मामूली कमी कर देती है। लेकिन लोगों को सब पता है। 18-19 रुपये दाम बढ़ाने के बाद डेढ़ रुपये या ढाई रुपये प्रति लीटर की कटौती से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

इस समय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर है, चालू खाता घाटा बढ़ रहा है, स्टॉक मार्केट गोते खा रहा है। अर्थव्यवस्था किस हाल में है?

रुपये की पतली हालत और चालू खाता घाटा बढ़ने के साथ अब रिजर्व बैंक भी महंगाई को लेकर चिंता जता रहा है। अर्थशास्‍त्री मान रहे हैं कि सरकार के लिए 3.3 फीसदी के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है। फिर, निर्यात अभी भी 2013-14 के स्तर पर है। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (एफपीआइ) शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। सरकार को चुनौतियों से निपटने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है।

आरबीआइ ने मौद्रिक नीति में ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है, जबकि ब्याज दर का बढ़ना तय माना जा रहा था। क्‍या आरबीआइ के फैसले पर सरकार का दबाव है?

आरबीआइ के फैसले में सरकारी दखलंदाजी का मुझे पता नहीं है। लेकिन आरबीआइ का फैसला चौंकाता जरूर है। सभी फैक्टर रेपो रेट में 0.25 फीसदी बढ़ोतरी को सपोर्ट कर रहे थे। ब्याज दरों में बढ़ोतरी नहीं करने की कोई वजह नजर नहीं आती है।

कमजोर रुपये पर सरकार का तर्क है कि दूसरी इमर्जिंग मार्केट की करेंसी की तुलना में भारतीय रुपया बेहतर है।

सरकार के इस बयान का कोई मतलब नहीं है, हमें रुपये की गिरावट पर चिंता करनी चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। हमारी इकोनॉमी आयात पर ज्यादा निर्भर है। जनवरी 2018 से भारतीय रुपया इमर्जिंग मार्केट्स की करेंसी में सबसे ज्यादा कमजोर होने वाली करेंसी है। लगातार कमजोर होता रुपया अर्थव्यवस्था पर हर तरह से निगेटिव असर डाल रहा है। चाहे आयात महंगा होने की बात हो या फिर ईएमआइ में बढ़ोतरी यह सब कुछ हो रहा है। सबसे बुरा असर रुपये के कमजोर होने से विदेशी निवेशकों द्वारा अपने निवेश को बाहर निकालने के रूप में दिखेगा।

जीएसटी लागू हुए एक साल से ज्यादा बीत गए हैं, मगर अभी भी उम्मीद के मुताबिक रेवेन्यू नहीं आ रहा है। कहां चूक हो रही है?

जीएसटी को बहुत खराब तरीके से लागू किया गया है। इसकी वजह से रेवेन्यू उम्मीद के अनुसार नहीं आ रहा है। बजट अनुमान की तुलना में वास्तविक जीएसटी रेवेन्यू में काफी अंतर रहने की आशंका है। हालांकि, डायरेक्ट टैक्स रेवेन्यू थोड़ा सपोर्ट कर रहा है, लेकिन वह किस हद तक कारगर होगा, सही तस्वीर फरवरी 2019 तक जाकर साफ होगी।

नोटबंदी का ऐलान करते वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दावा था कि कालेधन पर लगाम लगेगी, लेकिन सरकार उसके उद्देश्यों को लेकर लगातार बयान बदलती रही, सरकार के स्‍तर पर कहां चूक हुई?

मैं नोटबंदी पर पहले भी कह चुका हूं कि सरकार ने जो भी दावे किए थे, उसमें से कोई भी लक्ष्य सरकार हासिल नहीं कर पाई। उल्टे उसकी वजह से इकोनॉमी को बुरी तरह से नुकसान हुआ। लोगों की नौकरियां गईं, बिजनेस पर बुरा असर पड़ा, अगर आप नोटबंदी के 10 महीने या एक साल बाद होने वाले दूसरे चरण के असर की बात करें तो आप देखेंगे कि बड़े पैमाने पर छोटे कारोबारियों के बिजनेस ठप हो गए हैं। लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं, लोग निवेश करने से बच रहे हैं। तीसरे चरण का असर अब हम यह देख रहे हैं कि विदेशी निवेशक निवेश से दूरी बना रहे हैं। नोटबंदी में मौके का फायदा उठाने वाले बैंकर, मिडिलमैन को हेरा-फेरी करने का मौका मिल गया। सभी जानते हैं कि कैसे उस दौर में ब्लैकमनी को व्हाइट करने का खेल पिछले दरवाजे से खेला गया। मुझे नहीं लगता कि डिमोनेटाइजेशन से कुछ फायदा हुआ। इससे लगभग 1.5 फीसदी तक अर्थव्यवस्था की वृद्धि प्रभावित हुई।

एनपीए की समस्या लगातार पेचीदा होती जा रही है। मोदी सरकार का आरोप है कि सारे एनपीए की जड़ यूपीए सरकार के समय के फैसले हैं।

ऐसा पहली बार नहीं है कि बैंकों के सामने एनपीए की समस्या आई है। यशवंत सिन्हा जब वित्त मंत्री थे और जब मैं वित्त मंत्री था तब भी इस तरह की समस्या आई थी। लेकिन दोनों मौकों पर बिना कोई खलबली मचाए हम समस्या को नियंत्रित करने और बैंकों को ट्रैक पर लाने में सक्षम थे। इस सरकार की सबसे बड़ी दिक्कत है कि हर बात के लिए यह दूसरों पर दोष मढ़ती है। सत्ता के पांचवें वर्ष में होने के बाद आप पिछली सरकार को दोष नहीं दे सकते। हमने वाजपेयी सरकार पर दोष नहीं मढ़ा था, जो कि छह साल सत्ता में थी। यह महज बहाना है। बैंकों ने लोन दिए और वे इसकी रिकवरी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इसका हल निकाले। कोई जवाब नहीं है। मैं यह भी पूछता हूं कि 26 मई 2014 के बाद कितने लोन दिए गए और इसमें कितना एनपीए है। यूपीए के समय कितना लोन दिया गया और उसमें से कितना एनडीए सरकार के समय एनपीए बना। इसका कोई जवाब नहीं है।

2019 में लोकसभा चुनाव है और आप मेनिफेस्टो कमेटी के इंचार्ज हैं। इन तमाम समस्याओं का आपकी पार्टी के पास क्या समाधान है?

अर्थव्यवस्था को संभालने में मनमोहन सिंह सरकार अधिक सक्षम थी। 2008 में हमने दुनिया का सबसे बुरा वित्तीय संकट झेला, लेकिन देश में एक भी बैंक की हालत खराब नहीं हुई। 2013 में भी हमने खराब दौर देखा, फिर भी हम राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने में सफल रहे। महंगाई काबू करने और 6.4 फीसदी तक विकास बरकरार रखने में सफल रहे। विपक्ष में रहते हुए मैं यह नहीं कहूंगा कि मौजूदा परिस्थितियों में हम क्या करते। इसका जवाब तभी दिया जा सकता है, जब आपके पास पूरी जानकारी हो और यह सरकार के पास है। विपक्ष में रहते हुए आप सिर्फ समस्याओं की तरफ इशारा कर सकते हैं।

क्या हम गठबंधन के दौर में फिर से प्रवेश कर रहे हैं?     

मुझे तो ऐसा ही लगता है। मौजूदा एनडीए सरकार भी गठबंधन की सरकार है। देश में कई क्षेत्रीय दल हैं और गठबंधन की सरकार चलाने में कोई गलती नहीं है। आखिरकार यूपीए भी कई दलों के गठबंधन की सरकार थी और हमने 10 साल तक सरकार चलाई। अगर 2019 में भी गठबंधन की सरकार बनती है, तो मैं उसका स्वागत करूंगा।

(यह साक्षात्कार अंग्रेजी में लिया गया है)


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