Home रूबरू सामान्य “जब इतने राज्य विरोध में हों तो क्या केंद्रीय कानून राष्ट्रीय कानून हो सकता है?”

“जब इतने राज्य विरोध में हों तो क्या केंद्रीय कानून राष्ट्रीय कानून हो सकता है?”

रूबेन बनर्जी - MAR 19 , 2020
“जब इतने राज्य विरोध में हों तो क्या केंद्रीय कानून राष्ट्रीय कानून हो सकता है?”
“जब इतने राज्य विरोध में हों तो क्या केंद्रीय कानून राष्ट्रीय कानून हो सकता है?”
रूबेन बनर्जी

कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों में से एक कैप्टन अमरिंदर सिंह ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो आज सबसे अधिक स्थायी सरकार का संचालन कर रहे हैं। दूसरे राज्यों में जहां सत्ता संघर्ष के लिए मुख्यमंत्रियों को चुनौती है, वहीं कैप्टन अमरिंदर को अपने राज्य पंजाब में विरोध का कम सामना करना पड़ रहा है। कभी भारतीय सेना की सिख रेज‌िमेंट में रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुकाबले पंजाब कांग्रेस में कोई दूसरा व्यक्ति मुख्यमंत्री पद के लिए नहीं उभर पाया है। पंजाब के मुख्यमंत्री के बतौर अपने मौजूदा कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे करने वाले कैप्टन अमरिंदर का ध्यान अब पूरी तरह से अगले बचे दो वर्ष के कार्यकाल पर केंद्रित है। बीते तीन वर्ष में उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा और अगले दो साल के कार्यकाल के लिए उनकी क्या योजनाएं हैं, इस पर उनसे विस्तृत बात की आउटलुक अंग्रेजी के एडिटर-इन-चीफ रुबेन बनर्जी ने। मुख्य अंश:

पंजाब के मुख्यमंत्री के बतौर आपने तीन वर्ष पूरे कर लिए हैं। इन तीन वर्ष के अपने कार्यकाल की रेटिंग कैसे करेंगे? क्या कोई निराशा है?

रेटिंग का काम मैं मीडिया पर छोडूंगा। पर मैं सोचता हूं कि हमारे तीन वर्ष के काम से पंजाब के ज्यादातर लोग खुश हैं। वे पंजाब को शांत और खुशहाल राज्य के रूप में देख रहे हैं। वे चारों ओर विकास देखते हैं। वे देखते हैं कि राज्य से गैंगस्टर्स, अपराधी और आतंकी या तो खत्म हो रहे हैं या पंजाब छोड़कर भाग रहे हैं। वे देखते हैं कि उद्योग वापस आ रहे हैं। वे देखते हैं कि किसान कर्ज के चक्र से बाहर निकल रहे हैं। वे देखते हैं कि नए स्कूल, कॉलेज और अस्पताल खुल रहे हैं और पुराने अपग्रेड हो रहे हैं। वे देखते हैं कि आखिरकार युवाओं को नौकरियों के अवसर मिल रहे हैं और वे नशे के खतरों से बाहर निकल रहे हैं। इन सबसे मुझे खुशी मिलती है और संतोष होता है कि कैसे इस कार्यकाल में चीजें बदली हैं। हालांकि अभी बहुत कुछ करना बाकी है पर मुझे पूरा विश्वास है कि बाकी बचे कार्यकाल में हम वे तमाम वादे पूरे करने में सक्षम होंगे जो हमने जनता से किए हैं। मैं कहूंगा कि निराशा कहीं नहीं है। यह प्रक्रिया का एक हिस्सा है जिसके सुधार में समय लगता है, विशेषकर तब जब पिछली शिरोमणि अकाली दल-भाजपा सरकार राज्य को गड़बड़ हालात में छोड़ गई हो। मैंने पंजाब की जनता से जो भी वादे किए हैं, उन्हें मैं पूरा करूंगा, भले ही इसके लिए कुछ और समय लगेगा।

अगले दो साल के कार्यकाल में आपकी क्या प्राथमिकताएं और क्या चुनौतियां होंगी?

जैसा मैंने कहा कि कुछ वादे पूरे करना बाकी है, हम अगले दो साल में उन्हें पूरा करेंगे। इसके साथ ही हम पूरे राज्य में सुधार और विकास के उन कार्यों को गति देंगे जिनकी शुरुआत हमने पहले से ही कर दी है। इनमें उद्योग, पर्यावरण संरक्षण, फसलों का विविधीकरण, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां अब हम और ज्यादा ध्यान देंगे जिसकी नींव हम पहले ही रख चुके हैं। जहां तक बात चुनौतियों की है, हमारी अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर लौट रही है। केंद्र सरकार से किसान कर्ज माफी और वैकल्पिक फसलों के एमएसपी के मसले पर सहयोग न मिलना चुनौती है। केंद्र प्रायोजित बहुत-सी परियोजनाओं में बहुत निवेश की जरूरत पड़ती है, जिसके लिए मैं और मेरे मंत्रिमंडल के सहयोगी केंद्र से मदद के लिए लगातार प्रयासरत हैं। जीएसटी में राज्य को अपने हिस्से का राजस्व मिलने में देरी एक गंभीर मसला है, जिसका निदान केंद्र सरकार को जल्द करना चाहिए क्योंकि नई कर व्यवस्था में राज्य के पास केवल जीएसटी ही राजस्व का स्रोत बचता है। मैं आशा करता हूं कि जल्द ही इन तमाम मसलों का हल निकल आएगा जिससे विकास की प्रक्रिया और तेज होगी।

आप को विरासत में भारी कर्ज मिला। अब राज्य की वित्तीय स्थिति कैसी है, खासकर यह देखते हुए कि पूरे देश में आर्थिक संकट है?

मार्च 2017 में जब हमारी सरकार बनी तब आर्थिक हालात इतने बदतर थे, हमें ऐसी उम्मीद भी नहीं थी। पिछली सरकार वित्तीय कुप्रबंधन के चलते न केवल खजाना खाली छोड़ गई थी बल्कि ऐसे तहस-नहस कर गई थी कि जिससे राज्य के विकास की प्रक्रिया को फिर से शुरू करना एक बड़ी चुनौती थी। संकट बहुत गहरा था पर मुझे यह कहते हुए खुशी है कि हमारी सरकार की वित्तीय नीतियों की वजह से चीजें फिर से आगे बढ़ना शुरू हुई हैं। वित्त मंत्री मनप्रीत बादल ने 2020 के बजट भाषण में बहुत-सी नीतियों के प्रभाव के बारे में सदन को बताया है। हमने राज्य का कर्ज और जीएसडीपी (ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट) अनुपात घटाया है। कोशिश रही है कि चालू वित्त वर्ष में ज्यादातर समय राज्य को कभी दोहरे ओवरड्रॉफ्ट की जरूरत न पड़े। वित्तीय प्रबंधन में सुधार के साथ ही राज्य की अर्थव्यवस्था में गति लाने में जो बात सहायक है, वह है कारोबार को आसान करने की प्रक्रिया, जिसकी मदद से हम पंजाब में 58,000 करोड़ रुपये का निवेश लाने में सफल रहे हैं। उद्योगों को प्रोत्साहित करना हमारी प्राथमिकता रही है। इनमें न केवल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की क्षमता है बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं। मैं खुश हूं कि पिछले साल देश की गिरती अर्थव्यवस्था के बीच पंजाब अपने आप को संभालने में सफल रहा। सच में यह बड़ी उपलब्धि है जिस पर सरकार में हम सभी को गर्व है।

कुछ और राज्यों की तरह पंजाब विधानसभा ने भी नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में प्रस्ताव पास किया, परंतु सीएए केंद्रीय कानून है और नागरिकता केंद्रीय सूची का विषय है। ऐसे में आप सीएए कानून कैसे लागू नहीं कर सकते? क्या यह तेवर मात्र है?

नहीं, यह केवल तेवर नहीं है। मत भूलिए, पंजाब ऐसा अकेला राज्य नहीं जिसने यह फैसला लिया हो। हमने पहले ही घोषणा की है कि न्यायालयों में चुनौती देने के साथ केंद्र के इस मसले को हम हर मंच पर रखेंगे। कैसे केंद्र का एक कानून राष्‍ट्रीय कानून बन सकता है, जब बहुत-से राज्य इसके खिलाफ हों और इसके विरोध में देश के लोग सड़कों पर हों। सीएए के विरोध में प्रस्ताव पास करने के वक्त विधायकों को उम्मीद थी कि लोगों में इसका विराध हो सकता है, पर यही लोगों की इच्छा है, इसका विरोध कहीं नजर नहीं आया। केंद्र को इस कानून की समीक्षा करने और इसे फिर से समझने की जरूरत है क्योंकि इसका स्वरूप पूरी तरह से असंवैधानिक है। भारतीय संविधान कभी धर्म के आधार पर भेदभाव की इजाजत नहीं देता और संविधान की संरक्षक होने के नाते यह केंद्र सरकार का कर्तव्य है कि वह पूरी आत्मीयता से इसकी रक्षा करे।

आपने बार-बार कहा कि अरविंद केजरीवाल का दिल्ली मॉडल नया नहीं है, जबकि आपकी सरकार का मॉडल उससे बेहतर है। फिर पंजाब के मॉडल की चर्चा उतनी क्यों नहीं होती जितनी दिल्ली या गुजरात मॉडल की होती है?

यह मीडिया ही है जो इस तरह की बातें करता है। हम पंजाब में जो कर रहे हैं वह दिल्ली में जो हुआ है, उससे कहीं बेहतर है। दिल्ली का कथित मॉडल केवल आक्रामक चुनावी प्रचार था जो केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ने किया। आप पंजाब के सरकारी स्कूलों का दौरा करेंगे तो पाएंगे कि हम कितना बेहतर काम कर रहे हैं। जिस मुफ्त बिजली की बात केजरीवाल कर रहे हैं, क्या आपने यह देखा है कि कितने लोगों को यह मिल रही है? मार्च 2017 में पंजाब के खराब आर्थिक हालात में बनी हमारी सरकार इसके बावजूद कहीं अधिक बिजली सब्सिडी दे रही है। दिल्ली में उन्होंने चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के लिए बस में मुफ्त सफर की घोषणा वोटों पर नजर रखते हुए की। मैंने बजट सत्र में राज्य की महिलाओं के बस किराए में 50 फीसदी छूट की घोषणा की है, जबकि यहां तो आगे चुनाव भी नहीं हैं। गुजरात मॉडल के बारे में मैं ज्यादा जानता नहीं पर लगता है कि यह सब बड़ी परियोजनाओं और बड़े कारोबार के लिए है। देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह अच्छा हो सकता है, पर इसमें आम आदमी के लिए क्या है? वहां हकीकत में क्या कल्याणकारी उपाय किए जा रहे हैं?

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की ताजा जीत से क्या आप आशा करते हैं कि यही जीत वे पंजाब में भी दोहरा सकते हैं? क्या 2022 में कांग्रेस, अकाली दल और आप में त्रिकोणीय मुकाबला दिखेगा?

आम आदमी पार्टी ने 2015 में भी दिल्ली में चुनाव जीता था, पर किसी दूसरे राज्य में वह कुछ भी करने में विफल रही। वह 2019 के आम चुनाव में भी विफल रही। पंजाब में वह अपनी साख बचाने में विफल रही और यहां उनके पास कोई नेतृत्व भी नहीं है। एक साल में तीसरी बार आम आदमी पार्टी ने पंजाब में अपना प्रभारी बदला है। इससे पता चलता है कि मजबूत नेतृत्व को लेकर उनका रवैया क्या है। सच कहूं तो पंजाब दिल्ली नहीं है। यहां के लोग लंबे समय तक पीड़ित रहे हैं, और पिछले तीन साल में उन्हें इस पीड़ा से कुछ राहत मिली है। आप की पंजाब में जड़ें नहीं हैं और न ही यहां उनका आधार है। 2017 के चुनाव में भी आम आदमी पार्टी मुकाबले को त्रिकोणीय बता रही थी, लेकिन कांग्रेस ने चुनाव में उसका सफाया कर दिया। हम इसे दोहराएंगे भी।

जब से राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ा है, तब से ऐसा लगता है कि राष्‍ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी बिना नेतृत्व के बस चली जा रही है। अब फिर उन्हें वापस लाने की बात हो रही है। पार्टी के लिए बेहतर क्या रहेगा?

ऐसा नहीं है। सोनिया गांधी हमारी मजबूत और बड़ी नेता हैं। राहुल के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद सर्वसम्मति से उन्हें चुना गया और वे बहुत अच्छा काम कर रही हैं। पर किसी कारण वे पीछे हटने का फैसला लेती हैं तो मेरे विचार में पार्टी नेतृत्व के लिए राहुल बेहतर हैं। यही विचार पार्टी में बहुत से दूसरे लोगों का भी है। इसलिए उन्हें वापस लाए जाने की बात हो रही है। अंततः उन्हें वापस आना ही है। वह योग्य हैं, सक्षम हैं और युवा हैं। कांग्रेस को और राष्‍ट्र को भी इसकी जरूरत है।

गांधी-नेहरु परिवार से परे भी कोई नेता हो सकता है?

मजबूत नेतृत्व के साथ कांग्रेस एक पुरानी पार्टी है। मुझे विश्वास है कि जब भी जरूरत पड़ेगी, यहां बहुत से अच्छे नेता हैं जो जिम्मेदारी संभाल सकते हैं।

प्रियंका गांधी को राज्यसभा के लिए नामित किए जाने की चर्चा है। क्या आप मानते हैं कि यह सही है? हालांकि वे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने में सफल नहीं रहीं?

उनके हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं है जो रातों-रात चीजें बदल सकें। यूपी में हकीकत में बदलाव हो रहा है और इसके नतीजे जल्द ही देखने को मिलेंगे। मैं सोचता हूं कि पार्टी और संसद में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने की जरूरत है। वे न केवल उत्तर प्रदेश और पार्टी के लिए, बल्कि पूरे राष्‍ट्र के लिए कुछ हटकर कर सकती हैं।

हाल ही में कांग्रेस के जयराम रमेश, शशि थरूर और मनीष तिवारी जैसे कई नेताओं ने कहा कि विचारधारा के मामले में पार्टी को पुनर्विचार करने की जरूरत है। पार्टी को इस मुद्दे पर अपनी स्थिति भी स्पष्‍ट करने की आवश्यकता है। इस पर पार्टी का रुख क्या है और इसके पीछे की कहानी क्या है? क्या इतना कहना काफी नहीं कि कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष पार्टी है? आपके मुताबिक कांग्रेस में किस तरह के सुधार की जरूरत है?

भारत इन दिनों काफी दर्दनाक समय से गुजर रहा है। ऐसे में मैं सोचता हूं कि एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी होना ही कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत है। हम हर भारतीय की पार्टी हैं, धर्मनिरपेक्ष होने का यही मतलब है। हम समाज के सभी वर्गों के साथ खड़े हैं। जब कुछ नेता बदलाव की बात करते हैं तो मैं नहीं सोचता कि वे विचारधारा में बदलाव की बात करते हैं। यह नेतृत्व में और युवाओं को शामिल करने की बात है। यह क्षेत्रीय नेतृत्व को और अधिक महत्व दिए जाने के बारे में है और यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। मुझे लगता है कि आगे इन बातों को और  मजबूती मिलेगी।

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