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“फूड सेफ्टी के लिए सबकुछ ठीक करने में लगेगा समय”

APR 20 , 2018

“फूड पॉइजनिंग की समस्या लगातार बढ़ रही है। वहीं, देश भर में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और मानक तय करने वाली केंद्रीय एजेंसी फूड सेफ्टी ऐंड स्टैंडड्‍‍र्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआइ) इनके रेगुलेशन को लेकर अपनी मजबूरियों का ठीकरा राज्य सरकारों पर फोड़ती है। एफएसएसएआइ की तमाम कोशिशों के बावजूद फूड सेफ्टी अब भी बड़ा सवाल बना हुआ है। इनसे जुड़े तमाम मुद्दों पर आउटलुक ने एफएसएसएआइ के सीईओ पवन कुमार अग्रवाल से लंबी बातचीत की। पेश हैं चंदन कुमार से उनकी बातचीत के मुख्य अंशः”

-एफएसएसएआइ और राज्यों ने पिछले एक साल में कितने सैंपल लिए हैं? इनमें से कितने सैंपल सबस्टैंडर्ड और मिलावट वाले निकले?

खाद्य पदार्थों के सैंपल लेने का काम राज्य सरकारों के जिम्मे आता है। राज्य सरकार की तरफ से हमें वार्षिक रिपोर्ट मिलती है। उस रिपोर्ट के मुताबिक, 2016-17 की बात करें तो इस दौरान कुल 88 हजार 530 सैंपल लिए गए और इनमें से 18 हजार 325 सैंपल सबस्टैंडर्ड और मिसब्रांडेड (उपयुक्त ब्रांड से इतर) निकले।

-इससे संबंधित कितने मामलों में नोटिस जारी किए गए और पिछले एक साल में उत्पादकों के खिलाफ कितने केस दर्ज किए गए?

सैंपल फेल या सबस्टैंडर्ड होने के बाद सिविल और क्रिमिनल अलग-अलग मामले दर्ज किए जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 2016-17 के दौरान इससे संबंधित 13 हजार 80 मामलों में क्रिमिनल और सिविल मामले दर्ज कराए गए।

-बाजार में मिलने वाले कई आयातित उत्पाद एफएसएसएआइ के विभिन्न प्रावधानों का उल्लंघन कर रहे हैं। एफएसएसएआइ की निगरानी के बावजूद रिटेल आउटलेट तक वे कैसे और क्यों पहुंच जाते हैं?

पोर्ट के एंट्री पॉइंट पर आयातित उत्पादों का इंस्पेक्शन होता है। उसके बाद उसे जांच के लिए भेजा जाता है। वैसे भी जो उत्पाद विदेश से आते हैं, उनमें उस तरह की मिलावट नहीं होती है। उनमें मुख्य रूप से लेबलिंग की समस्या होती है, क्योंकि उनकी लेबलिंग हमारे देश के हिसाब से होनी चाहिए। कुछ मामलों में उसे पोर्ट पर ही ठीक किया जाता है तो कुछ में उसे री-एक्सपोर्ट करना होता है। बहुत ही चुनिंदा मामलों में उन्हें नष्ट किया जाता है। लगभग एक या दो फीसदी आयात के मामलों में ही कुछ डिफेक्ट पाया जाता है। इसमें भी 80 फीसदी डिफेक्ट लेबलिंग का होता है।

-जिन कंपनियों के एक्सपोर्ट कंसाइनमेंट रद्द हो जा रहे हैं, उनके खिलाफ एफएसएसएआइ क्या कार्रवाई कर रही है?

हम जो एक्सपोर्ट कंसाइनमेंट रद्द करते हैं, उसका ब्योरा दूसरे देशों की तरह एक पोर्टल में रखते हैं। हम उसे सार्वजनिक करने वाले हैं। उससे पता चलेगा कि हमने कौन-कौन से कंसाइनमेंट रद्द किए और उन्हें किन वजहों से रद्द किया है। 

एफएसएसएआइ लैब में रोज कितने सैंपल जांच के लिए आते हैं और कितने खारिज होते हैं, इसकी जानकारी लोगों तक नहीं पहुंच पाती है। एफएसएसएआइ लोगों से इनकी जानकारियां क्यों साझा नहीं करती है?

एफएसएसएआइ एक अलग इकाई है। राज्यों में फूड सेफ्टी कमिश्नर होते हैं। वे भी इसी कानून के तहत काम करते हैं। लोग कई बार इसमें घालमेल कर देते हैं। सैंपलिंग की जांच वगैरह राज्य का काम है। एनफोर्समेंट का ज्यादातर काम राज्य के फूड कमिश्नर करते हैं और हमारा काम स्टैंडर्ड यानी मानकों को बनाए रखने का है। बड़े व्यवसायों को लाइसेंस देने का काम है। एनफोर्समेंट का काम राज्य का है। हमारे पास न तो अभी मैनपावर है और न ही अथॉरिटी। ये सारे अधिकार राज्यों को दिए गए हैं।

-अदालतों ने मिलावटी खाद्य उत्पादों और स्कूलों में जंक फूड को लेकर कई टिप्पणियां की हैं। एफएसएसएआइ ने उन पर क्या कार्रवाई की है?

इस तरह की जिम्मेदारियां राज्य की एनफोर्समेंट एजेंसियां निभाती हैं। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन उनके पास भेजी गई हैं। उनके साथ जब भी हमारी बैठक होती है, तो विस्तार से उनकी आलोचना होती है। स्टेट फूड कमिश्नर के साथ हमारी बैठकें होती हैं और उनसे इन विषयों पर जवाब मांगा जाता है। हम भी उनसे कहते हैं कि इन मामलों के साथ सख्ती से निपटें।  

-खुदरा विक्रेता और आम लोग कहते हैं कि एफएसएसएआइ में भ्रष्टाचार की वजह से खराब मैन्यूफैक्चरर्स के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती। आपने भ्रष्ट अधिकारियों और खराब सप्लायर के खिलाफ क्या कार्रवाई की है?

राज्य में एनफोर्समेंट एजेंसी या फील्ड ऑफिसर हैं, उनमें कहीं-कहीं पर कमियां हो सकती हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि कमियां नहीं हैं। उसमें पारदर्शिता लाने के लिए हम इंस्पेक्शन कराते हैं। इंस्‍पेक्शन के लिए एक मैट्रिक्स बना दिया गया है, ताकि मोबाइल पर ही इंस्‍पेक्शन हो सके और वहीं पर यह प्रक्रिया बंद भी हो जाए। यानी आप घर आकर नेगोशिएट नहीं कर सकते हैं। इस तरह की समस्या को दूर करने के लिए पारदर्शिता लानी है।

-एफएसएसएआइ के अस्तित्व में आने के बाद मिलावट के मामलों में कितनी कमी आई है। इसका क्या ट्रेंड रहा है?

ठीक तरीके से रहने और स्वच्छ खाने को लेकर लोगों में जागरूकता आई है। मिलावट के प्रति लोग अधिक सतर्क हो गए हैं। हम उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए लगातार अभियान चलाते हैं। इसके दुरुस्त होने में समय लगेगा। लेकिन यह प्रक्रिया ठीक होने की तरफ है। इतना बड़ा देश है और खाद्य पदार्थों का बड़ा ईकोसिस्टम है, तो सबकुछ ठीकठाक होने में समय लगेगा।

-एफएसएसएआइ लैब जो अंतिम रिपोर्ट जारी करती है और वैसी रिपोर्ट जो किसी मामले में कोर्ट में स्वीकार्य हो, अगर कोई इन लैब का जायजा लेना चाहे या वहां से रिपोर्ट लेना चाहे तो उसकी क्या प्रक्रिया है?

जो सैंपल भेजा जाता है, उसे फूड सेफ्टी ऑफिसर भेजते हैं। उसका रिजल्ट तो उन्हें ही मिलेगा। जब उसमें कुछ कमी पाई जाती है और पार्टी को नोटिस भेजने का फैसला किया जाता है तभी उसके साथ वह कॉपी साझा की जाती है।


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