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एक नहीं, सैंकड़ों सोनी सोरी के लिए लड़ना है

सैकड़ों पीड़ित आदिवासी महिलाओं के लिए संघर्ष करने के लिए छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी बना रही राह, खतरे अब भी हैं बरकरार
एक नहीं, सैंकड़ों सोनी सोरी के लिए लड़ना है

छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज की स्थिति और खासतौर से आदिवासी महिलाओं के उत्पीडऩ के खिलाफ उठी आवाज का मूर्त चेहरा बन गई हैं सोनी सोरी। शिक्षिका सोनी सोरी को नक्सली होने के आरोप में छत्तीसगढ़ पुलिस ने गिरफ्तार कर जो बर्बर यौनिक यातना दी, उसके खिलाफ लंबा आंदोलन चला, सोनी सोरी ने आदिवासी प्रतिरोध की नई बानगी पेश की। अब सोनी सोरी का कहना है कि वह अपनी पीड़ा से बाहर निकल उन सैकड़ों आदिवासी महिलाओं और पुरुषों के लिए संघर्ष करना चाहती हैं, जो व्यवस्था के हाथों बेदखली और निर्मम दमन के शिकार हैं। अपनी ही तरह उत्पीडऩ के खिलाफ संघर्षरत इडमे (आदिवासी लड़की जो आठ साल जेल में झूठे आरोप में भीषण यौन यातना और बीमारी झेलती रही, हालांकि बाद में अदालत ने उसे निर्दोष साबित कर छोड़ दिया) के साथ वह पिछले दिनों दिल्ली आई हुई थीं। सोरी छत्तीसगढ़  में हो रही फर्जी मुठभेड़ों और आदिवासियों की हत्याओं के खिलाफ आवाज उठा रही हैं। उधर राज्य के पुलिस महानिरीक्षक एसआरपी कल्लूरी अब सोनी सोरी पर माओवादी समर्थक होने का आरोप लगा रहे हैं। दंतेवाड़ा में एक व्यापारी की माओवादियों ने कर दी और वहां कल्लूरी ने जाकर सोनी सोरी को माओवादी समर्थक बताया। इसके बाद, फर्जी मुठभेड़ में मारे गए आदिवासी युवक पोडिया हेमलापारी को इंसाफ दिलाने की मांग को लेकर सोनी बाकी आदिवासियों के साथ आंदोलन कर रही थीं तो उसी समय उनके घर पर व्यापारियों के समूह ने पत्थर फेंके और उनके खिलाफ नारे लगाए। इससे उनके बच्चे बेतरह परेशान हो गए। आशंका है कि एक बार फिर सोनी सोरी के खिलाफ प्रशासन मुस्तैद हो रहा है। उनकी कभी भी गिरफ्तारी हो सकती है।

किस तरह से अपने जीवन को वह आगे चलाने की योजना बना रही हैं, इस पर वह खुलकर बोलने की इच्छुक हैं। भीषणतम स्थितियों से गुजर चुकीं सोनी सोरी को अब कुछ भी खोने का डर नहीं। वह अपने जैसी साथियों को जुटाने, उन्हें मुखर करने और उन्हें न्याय दिलाने की लड़ाई में निकल पड़ी हैं। आउटलुक की ब्यूरो प्रमुख भाषा सिंह की सोनी सोरी तथा उनकी साथी इडमे से बातचीत के अंश:

soni sori with edmay

  जेल से छूटने के बाद क्या कुछ बदला आपके जीवन में?

मैं टूटकर चावल खाती हूं। जेल में इसकी कमी बहुत खलती थी। जेल ने सिखाया कि मेरी पहली और आखिरी पहचान आदिवासी औरत की है। 

मुझे अपना आदिवासी खाना बहुत पसंद है। खास तौर से बास्ता, पूट (देसी मशरूम), टोरा आदि खाना मुझे बहुत अच्छा लगता है। लाल चींटों की चटनी, जिसे चटक लाल मिर्च के साथ बनाते हैं...वह तो बस पूछिए नहीं । जब बुखार होता है तो इसे खासतौर से खाते हैं, तुरंत आराम आता है। मैं जब शिक्षक थी तो बाकी पढ़े-लिखे लोगों की तरह सोचती थी कि ये सब लोग ञ्चयों खाते हैं। आदिवासी खाने से परहेज करती थी। अब मैं आंदोलन में हूं तो इनका महत्व समझ आता है।

 आपके तीनों बच्चे कैसे हैं.. अभी आपके घर पर पत्थर भी फेंके गए। उन्होंने इसका कैसे सामना किया?

मेरी बड़ी बेटी मुस्कान को अभी 16 लगा (साल) हुआ  है। बेटे का नाम है दीपेंद्र औऱ उसे अभी 14 लगा हुआ है। और छोटी 12 साल की है और उसने पढऩा छोड़ दिया है। वह बिल्कुल भी तैयार नहीं है। मेरे जेल जाने से और उसके पिता की मौत ने उसे अंदर तक परेशान कर दिया। बड़े-बड़े सवाल पूछती है, कहती है, आप तो मक्वमी स्कूल गई थी न, पढ़ाई की थी न, फिर भी आपके साथ कितना बुरा हुआ। सब स्कूल में जानते हैं कि आपके साथ क्या-क्या हुआ। मैं नहीं जाऊंगी। आपके साथ रहकर ही आपके जैसा बनूंगी। मुझे सबसे ज्यादा प्यार यही करती है। अभी कुछ दिनों पहले घर की तलाशी भी हुई है। वह परेशान हो गई। अभी सब पत्थर फेंकने पहुंच गए। क्यों ये सब मेरे बच्चों के पीछे पड़ गए हैं?

 आप अब क्या करना चाहती हैं?

मैं किताब लिखना चाहती हूं। वैसे तो बहुत लोगों ने लिखा है लेकिन मैं जो लिखूंगी, वह बिल्कुल अलग होगा। जो मैंने अपने ऊपर झेला है, मेरे बदन पर हुआ है, वह सब वैसा का वैसा ही लोगों के सामने लाना चाहती हूं। देश के लोगों को पता तो चले कि इस देश में आदिवासी औरत की स्थिति क्या है। उसे क्यों नहीं इंसाफ और स्वाभिमान मिलता है। देश के बाकी नागरिकों को पता होना चाहिए कि यहां लोकतंत्र के मायने क्या है। एक आदिवासी औरत के लिए देश का कानून क्या मायने रखता है-ऐसे अनगिनत सवाल मैं देशवासियों के दिमाग में डालना चाहती हूं। बस्तर में जो चल रहा है, जो दबाया जा रहा है और जिसके खिलाफ थोड़े-थोड़े प्रयास चल रहे हैं, लोग जुट रहे हैं, वह सब लिखना चाहती हूं। यह लिखकर मैं पूरे देश में क्रांति लाने की कोशिश करूंगी। वैसे यह मेरा आखिरी प्रयास होगा। पहले तो मैं शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने की, लोगों को एकजुट करने की कोशिश कर रही हूं। अगर इसमें नाकाम रही तो इधर बढ़ूंगी।

आपको भरोसा है कि क्रांति आएगी?

वह तो जरूर आएगी। क्योंकि देखिए जेल में जो हुआ, जो मेरे साथ किया गया, आप सोच सकती हैं क्या ? जैसे मुझे नंगा करके बिजली का शॉक दिया गया, बलात्कार किया गया, मेरे अंदर पत्थर डाले गए...मैं कितना रोई। मैंने तीन बच्चों को अपनी योनि से ही बाहर निकाला, लेकिन जब कोलकाता में मेरी योनि से पत्थर निकाले जा रहे थे तो मुझे जो दर्द हुआ वह बच्चा पैदा करने के दर्द से कई गुना ज्यादा था। मेरा क्या गुनाह था, सिवा इसके कि मैं एक पढ़ी-लिखी आदिवासी महिला थी। मेरी जैसी अनगिनत आदिवासी औरतें इस यातना को आज भी झेल रही हैं। मैं यह सब दिखाना चाहती हूं, लिखना चाहती हूं, ताकि देश के लोग सोचें कि क्या हो रहा है। तभी सही मायने में क्रांति आएगी।

आपके खिलाफ पूरा राज्य है, कैसे इंसाफ मिलेगा?

हमारे पास लडऩे के अलावा, आवाज उठाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। वैसे यह हम आदिवासियों का राज्य है, हमारी जमीन है, हमारे पर्वत हैं, इन पर हमारा हक है। अब बाहर निकल कर समझ आता है कि हर जगह लड़ाई चल रही है। हम शांतिपूर्ण ढंग से लड़ाई चला रहे हैं। हालांकि जितना बुरा हमारे साथ हुआ है, उसका गुस्सा बहुत है, लेकिन हम नक्सली नहीं हैं। प्रतिरोध भर जाता है, फिर उसे शांत करती हूं, क्योंकि यह कोई व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है।

आप और भी आदिवासी महिलाओं के मामले उठा रही हैं, क्या सोचकर यह कदम उठाया?

यह बहुत जरूरी है। सोनी सोरी एक नहीं है, सैकड़ों हैं। मेरी इस साथी इडमे को देखिए, कितनी यातना सही इसने। यह न होती तो मैं जबलपुर जेल से जिंदा न निकल पाती। इसकी खुद की कहानी कितनी दर्दनाक है। जब यह 14-15 साल की थी, जब पुलिस ने इस अनाथ को उठा लिया, थाने-थाने घुमाया। इतनी बर्बर (यौन) यातना दी कि यह न शादी के लायक रही, न मां बनने के। 

togetherness

इडमे से: इतना कम क्यों बोलती हैं?

मन नहीं, बोलने से क्या होगा। कुछ सूझता नहीं था। हर जगह से खून रिसता था-हर जगह से (इशारे से बताती हैं) चार बार ऑपरेशन हुआ, अब भी दवा चल रही है। बहुत हैं जेल में हम सी। उन्हें बाहर लाना है। यही काम है। अपनी अर्जी भी यहां दी है (सुप्रीम कोर्ट में), देखो। अब अपनी दीदी (सोनी सोरी) के साथ हूं। लड़ूंगी आखिरी तक, बस (यह कहकर सोनी से चिपट जाती हैं इडमे और दोनों की आंखें नम हो जाती हैं)।

इडमे सेः क्या सोचकर आपने केस डाला है ?

मैं चुप रहती हूं। बोलने का मन ही नहीं करता था। कुछ आता भी नहीं था दिमाग में...खाली हो गया था। पर अब लगता है कि उन लोगों के जुल्म बताने जरूरी हैं, ताकि कोई फिर इडमे न बने। इंसाफ मिले न मिले, हमारा काम गलत को गलत बोलना है। वरना अब जीवन में क्या है।

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