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इंटरव्यू/रवीना टंडन: “बड़ी अभिनेत्रियां भी कंफर्ट जोन से बाहर निकलने में कतराती हैं”

गिरिधर झा - DEC 26 , 2021
इंटरव्यू/रवीना टंडन: “बड़ी अभिनेत्रियां भी कंफर्ट जोन से बाहर निकलने में कतराती हैं”
रवीना टंडन
गिरिधर झा

बॉलीवुड में 30 साल पहले पत्थर के फूल (1991) से एंट्री लेने वाली 47 साल की रवीना टंडन अब नेटफ्लिक्स पर आ रहे थ्रिलर अरण्यक के साथ ओटीटी पर शुरुआत कर रही हैं। 1990 के दशक में मस्त-मस्त गर्ल के नाम से पहचान बनाने वाली रवीना ने अचानक अपने करिअर की दिशा बदली और शूल (1999) और दमन (2001) जैसी ऑफबीट फिल्में कर अल्ट्रा ग्लैमरस छवि तोड़कर लोगों को अपनी बहुमुखी प्रतिभा से परिचित कराया। गिरिधर झा के साथ बातचीत में, उन्होंने डिजिटल स्पेस में प्रवेश, नए चरित्र और लोकप्रियता की ऊंचाई पर कंफर्ट जोन से बाहर निकलने के फैसले के बारे में बात की। पेश हैं अंशः 

 

नेटफ्लिक्स पर 10 दिसंबर से आपकी वेब सीरीज अरण्यक स्ट्रीम हो रही है। ओवर द टॉप (ओटीटी) दुनिया में आने के लिए आपने इस थ्रिलर को क्यों चुना?

अरण्यक से पहले कई वेब शो के ऑफर थे। पिछले कुछ सालों में मैंने जिन स्क्रिप्ट पर काम किया है यदि आप उस पर गौर करें, तो पाएंगे कि मेरे द्वारा निभाए चरित्र में पात्र हमेशा मजबूत, परिपक्व और संवेदना से भरपूर संदेश देता है। चाहे वह शूल (1999), दमन (2001), सत्ता (2003) या फिर आखिरी फिल्म मातृ (2017) ही क्यों न हो। मैंने इन्हें किया ही इसलिए कि समाज में मजबूत संदेश जाता है। अरण्यक में मैं कस्तूरी डोगरा का किरदार निभा रही हूं, जो मेरे दिल के करीब है। मुझे इसकी स्क्रिप्ट अच्छी लगी। ऐसी भूमिका का मुझे इंतजार था। यह चरित्र उन सभी महिलाओं से संबंधित है, जो व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में विभिन्न बाधाओं का सामना करती हुईं करिअर में सर्वश्रेष्ठ हासिल करने का सपना देखती हैं। मैं उन कुछ भाग्यशाली लोगों में हूं, जिनके निर्णय को हमेशा परिवार का सहयोग मिला। मेरे परिवार ने हमेशा मुझे न सिर्फ भावनात्मक संबल दिया, बल्कि मैंने जो करिअर चुना उस पर अच्छा से अच्छा हासिल करने के लिए हौसला भी बढ़ाया। लेकिन हमारे समाज में ऐसी कई कस्तूरी डोगरा हैं, जो इतनी भाग्यशाली नहीं हैं कि उन्हें ऐसा सहयोग मिल पाए।

आपने बहुत सी ऐसी फिल्में की हैं, जिनमें नायिकाओं के किरदार मजबूत रहे हैं। कस्तूरी डोगरा भी ऐसा ही किरदार है। असल जिंदगी में यह किरदार आपके कितना करीब है?

सच कहूं तो शायद मैं खुद को कस्तूरी डोगरा के करीब नहीं पाती क्योंकि मैं ऐसी पृष्ठभूमि से आती हूं जहां मेरे परिवार ने हमेशा मेरे फैसलों का समर्थन किया और करिअर को आगे बढ़ाने में मदद की है। लेकिन मैं कस्तूरी डोगरा की महत्वाकांक्षा और जो करिअर उसने चुना, उसमें कड़ी मेहनत करने और कुछ हासिल करने की इच्छा शक्ति से खुद को जुड़ा पाती हूं। यकीन कीजिए, जब मैंने कस्तूरी डोगरा के बारे में सुना तो मैं पूरी तरह से उसके लिए समर्पित हो गई। दुनिया में ऐसी बहुत सी कस्तूरी डोगरा हैं, जिनके पंखों को परिवार के हौसले की परवाज चाहिए।

आपका यह चरित्र आपके द्वारा शूल में निभाए किरदार की याद दिलाता है, जहां आपने पुलिस इंस्पेक्टर की पत्नी की भूमिका निभाई थी। अब आप खुद पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं। भारतीय सिनेमा में महिलाओं की मुख्य भूमिका ने पिछले दो दशकों में कितनी लंबी यात्रा की है?

हम बहुत सकारात्मक बदलाव देख रहे हैं। आज आपके पास ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं, जो वैश्विक सिनेमा को आपके घर ला रहा है। इसने उन दर्शकों का दायरा बढ़ाया है, जो प्रयोगधर्मी चीजें देखने के इच्छुक हैं। दृष्टिकोण बदले हैं और महिलाओं द्वारा संचालित शो देखने के लिए उपलब्ध हैं। अब परदे पर केवल पुरुष ही साहस का प्रदर्शन नहीं करता। आज आप कहानीकारों के अलग-अलग शो देख रहे हैं, जो घिसे-पिटे ढंग के बजाय अलग तरीके से कहानी कहना चाहते हैं। पहले वे जो कहना चाहते थे, उसे दो घंटे में समेटना होता था। लेकिन आज उनके पास बताने के लिए आठ एपिसोड हैं जिससे हर किरदार खुल कर बाहर आता है। अब प्रत्येक चरित्र की बारीकियों को समझा जा सकता है। यह बहुत ही क्रांतिकारी विचार है और यही स्वतंत्रता है, जो अब फिल्मकारों को मिली है। इसलिए इतने सारे अभिनेताओं के प्रदर्शन की विविधता देखने को मिल रही है, जो पहले नहीं दिखती थी।

अरण्यक के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि शोले (1975) वाले सिप्पी परिवार की तीसरी पीढ़ी के साथ आप फिल्म कर रही हैं। आपने जी.पी. सिप्पी की पत्थर के फूल से शुरुआत की, फिर रमेश सिप्पी की निर्देशित जमाना दीवाना (1995) की। अब आप निर्माता रोहन सिप्पी के साथ अरण्यक कर रही हैं?  इस यात्रा को कैसे याद करती हैं?

यह बात मुझे बुजुर्ग होने का अहसास कराती है। सच कहूं तो सोचती हूं इतने बड़े प्रोडक्शन हाउस के साथ काम करके बहुत कुछ सीखा। और फिर सिद्धार्थ रॉय कपूर (सह-निर्माता) भी इसमें साथ हैं। मुझे वास्तव में निर्देशक विनय वैकुल और सभी सह कलाकारों के साथ काम कर बहुत मजा आया। परमब्रत चटर्जी, मेघना मलिक, जाकिर हुसैन और हां आशुतोष राणा जी भी, जिनके साथ इससे पहले मैंने कभी काम नहीं किया। महामारी के समय हम सभी अपने परिवार से दूर थे, तो काम का माहौल बहुत पारिवारिक था।

नेटफ्लिक्स जैसे बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म आने से आप जैसे कलाकारों पर क्या फर्क पड़ा है?

यह मेरे लिए एक और प्लस पॉइंट था कि नेटफ्लिक्स पूरे शो का संचालन कर रहा है। यदि आप पैटर्न देखें, नेटफ्लिक्स मजबूत शक्तिशाली महिला चरित्र के साथ बहुत सफल सीरीज बना रहा है। अब वे अरण्यक के साथ आए हैं। आपको खुद ही लगने लगता है कि यहां आपार संभावनाएं हैं। कभी-कभी किसी पहेली के सारे टुकड़े एक जगह इकट्ठे हो जाते हैं और यही हमें अरण्यक के साथ महसूस होता है। इस बारे में हमेशा अच्छा ख्याल रहता है।

ओटीटी पर डेब्यू के कारण लोग आपको रवीना 2.0 कह रहे हैं। आपको कैसा लगता है?

चूंकि यह अलग प्लेटफॉर्म है इसलिए मुझे लगता है वे डेब्यू शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं। शुक्र है लोगों ने वापसी शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। मुझे लगता है कि जिंदगी ने एक चक्र पूरा कर लिया है। मैंने 1991 में पत्थर के फूल के साथ शुरुआत की और अब देखिए निश्चित रूप से 2021 में अरण्यक ओटीटी पर मेरी नई शुरुआत है।

रवीना टंडन

करिअर के शुरुआती दशक में आपके पास बॉलीवुड की बेहद ग्लैमरस दिवा ‘मस्त-मस्त गर्ल’ की छवि थी। अचानक आपने यू-टर्न लिया और शूल और दमन जैसी फिल्में कीं। कब और कैसे आपने यह निर्णय लिया? क्या आप अपने कंफर्ट जोन से बाहर आना चाहती थीं?

हां, मैं इससे बाहर आना चाहती थी। एक समय होता है, जब आप अभिनेता के तौर पर एक ही तरह की फिल्में और एक ही तरह की भूमिकाएं करते हैं। फिर अचानक एक दिन आप सोचने लगते हैं कि आखिर कब आप इससे आगे निकलेंगे? कब अभिनेता के रूप में विकास होगा? क्या मैं यहीं तक सीमित हूं? कब मैं अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाना शुरू कर सकती हूं? जब मैं अलग-अलग भूमिकाएं निभाने और करने की कोशिश कर रही थी, तब लगातार ये प्रश्न मेरे मन में थे। लेकिन मैंने आज भी, मैंने बहुत सी अभिनेत्रियों को देखा है, जो वास्तव में महान मानी जाती हैं, लेकिन वे अपने कंफर्ट जोन में ही फिल्में करती हैं। वे ज्यादातर फिल्मों में खुद को ही दोहराती है। मैं नहीं जानती कि इनमें से कितनी हैं, जो ऐसी भूमिकाएं करना चाहेंगी, जो मैंने कीं। इसके लिए मैं दर्शकों को धन्यवाद देती हूं कि उन्होंने मुझे अंखियों से गोली मारे (2002) से लेकर शूल में मध्यवर्गीय बिहारी गृहिणी तक, जिद्दी में कम्मो किधर (1997) गाने से लेकर सत्ता में राजनेता तक, अक्स (2001) में ग्लैमरस निगेटिव रोल से लेकर दमन में घरेलू हिंसा और वैवाहिक बलात्कार पीड़ित की भूमिका निभाने तक में सराहा और विभिन्न भूमिकाओं में स्वीकार किया।  

आपकी बड़ी फैन-फॉलोइंग है और आपके प्रशंसक चाहते हैं कि भविष्य में आपकी और फिल्में आएं। क्या आप बॉलीवुड और ओटीटी के और ऑफर के लिए तैयार हैं?

हां, बिलकुल। लेकिन सभी मेरा रिकॉर्ड जानते हैं। मैं फिल्मों के चुनाव में वक्त लेती हूं। अरण्यक से पहले मुझे बहुत से शो ऑफर हुए थे लेकिन पता नहीं क्यों वे मेरे जेहन में जगह नहीं बना सके। जो मुझे अच्छा लगेगा, दिल के करीब पहुंचेगा मैं उसे ही स्वीकार करूंगी। कस्तूरी डोगरा के चरित्र में कुछ तो ऐसा था, जिसे मैं वाकई निभाना चाहती थी। अगर दिल को छूने वाला फिर ऐसा कोई ऑफर आता है, तो निश्चित तौर पर मैं ना नहीं करूंगी। काम तो करना ही है।

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