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यूपी में सरकारें क्यों करती हैं बसों का रंग बदलने की सियासत?

OCT 12 , 2017

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भगवा रंग में डूबे रहते हैं। उनकी कुर्सी से लेकर कार तक सब में भगवा रंग की तौलिया नजर आती है। अब योगी सरकार ने रोडवेज की बसों को भगवा रंग से रंग दिया है। रोडवेज बसें राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करती हैं। दूसरे राज्यों में जाती हैं। शायद इसलिए ये कदम उठाया गया हो कि किसी को कोई कंफ्यूजन नहीं रहे कि उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार चल रही है। यही नहीं सरकारी बुकलेट से लेकर स्कूल बैग तक को भगवा कर दिया गया है।

बुधवार को योगी आदित्यनाथ ने 50 ऐसी बसों को हरी झंडी दिखाई। ग्रामीण इलाकों के लिए शुरू की गई इन बसों को संकल्प सेवा नाम दिया गया है। कार्यक्रम का माहौल ऐसा था कि स्टेज भी भगवा रंग से सजा हुआ था, बसों में भगवा गुब्बारे लगे हुए थे। बताया गया कि बसों को भगवा रंगने का काम कानपुर की वर्कशॉप में हुआ है। बाद में और भी बसें आएंगी।

राज्य सरकार के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा ने कहा, 'हमें सभी रंग पसंद हैं लेकिन भगवा रंग त्याग और बलिदान को दिखाता है। तिरंगे में भी यह रंग है। यह हमारे चुनाव का मसला है और किसी को भी इसमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए।'

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ऐसा पहली बार नहीं है जब यूपी में रोडवेज बसों का रंग बदला जा रहा हो। इससे पहले अखिलेश यादव की सपा सरकार में इन बसों का रंग लाल और हरा था यानी सपा के झंडे का रंग।

मायावती की सरकार में बसें उनकी पार्टी के झंडे के नीले रंग में रंग दी गई थीं। उस दौरान बसपा सरकार का स्लोगन 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' भी बसों पर लिखा होता था।

क्यों करती हैं सरकारें बसों का रंग बदलने की सियासत?

जब सरकार बदलती है तो वह पूरी मजबूती से अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहती है। ये मनोविज्ञान का भी मामला है। इसके अलावा विरोधी पार्टी से खुद को आगे दिखाने की होड़ भी है। हालांकि सरकार अपने आप में अलग आइडेंटिटी है और उसे पार्टीगत राजनीति से दूर रखना चाहिए लेकिन सरकारों में पार्टी का असर आ ही जाता है। यही बात योजनाओं और सरकारी भवनों के नामकरण पर भी लागू होती है।

इसके अलावा यह प्रतीकों की राजनीति का भी हिस्सा है। इस तरह की प्रतीकों से असल मुद्दे कहीं न कहीं पीछे छूट जाते हैं। लोगों को लगता है कि कुछ हो रहा है। बसों का रंग बदलने की बजाय सड़कों की स्थिति, बसों के परिचालन पर ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

उत्तर प्रदेश परिवहन

राज्य में रोडवेज सेवा 15 मई, 1947 को लखनऊ से बाराबंकी के बीच शुरू हुई थी। शुरु में इस सेवा का नाम यूपी गवर्नमेंट रोडवेज था। तब कॉर्पोरेशन के पास 4253 बसें थीं, जो 1123 अलग-अलग रूट पर चलती थीं। बाद में चौथी पंचवर्षीय योजना के दौरान 1972 में इस सेवा का नाम बदलकर उत्तर प्रदेश स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (यूपीएसआरटीसी) कर दिया गया। इसका हेड ऑफिस लखनऊ में है। विकीपीडिया के मुताबिक, इस वक्त यूपीएसआरटीसी के पास 12,194 बसें हैं। इनमें जनता बस, मिनी बस, साधारण बस, गोल्ड लाइन, स्लीपर, एसी, प्लेटिनम लाइन, रॉयल क्रूजर, सिटी बस सर्विस जैसी सेवाएं शामिल हैं।


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