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खुल गए सबरीमला मंदिर के कपाट, पुलिस ने 10 महिलाओं को वापस भेजा

आउटलुक टीम - NOV 16 , 2019
खुल गए सबरीमला मंदिर के कपाट, पुलिस ने 10 महिलाओं को वापस भेजा
आज खुलेंगे सबरीमला मंदिर के कपाट, महिलाओं को सुरक्षा नहीं मुहैया कराएगी सरकार
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आउटलुक टीम

केरल स्थित सबरीमला में मौजूद भगवान अयप्पा मंदिर के कपाट आज यानी शनिवार को श्रद्धालुओं के लिए खुल गए। इस बीच पुलिस ने 10 महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से पहले पंबा से वापस भेज दिया। 16 नवंबर से 2 महीने तक लोग मंदिर में दर्शन कर सकेंगे। आज से ही मंदिर में मंडला पूजा की शुरुआत कर दी जाएगी। महिलाओं के प्रवेश के चलते मंदिर की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। मंदिर में करीब 25000 पुलिसकर्मियों को तैनात कर दिया गया है। साथ ही राज्य सरकार मंदिर की ओर जाने वाली किसी भी महिला को सुरक्षा मुहैया नहीं कराएगी। इस पर एक्टिविस्ट तृप्ति देसाई ने कहा कि सरकार महिलाओं के खिलाफ काम कर रही है।

समाचार एजेंसी पीटीआइ के मुताबिक, कंदरारू महेश मोहनारारू ने मंदिर के गर्भगृह को खोला और वहां पूजा पाठ की। यही नहीं इस दौरान एके सुधीर नंबूदिरी सबरीमला मेलशांति और एमएस परमेश्वुरन नंबुदिरी मलिकापुरम मेलशांति के रूप में कार्यभार संभालेंगे। मंदिर में पादि पूजा कार्यक्रम संपन्न होने के बाद तीर्थयात्रियों को महज 18 पवित्र सीढ़ियों पर चढ़ने और भगवान के दर्शन करने की इजाजत होगी।

किसी भी महिला को सुरक्षा मुहैया नहीं कराएगी

समाचार एजेंसी एएनआइ के मुताबिक, केरल देवस्वोम बोर्ड के मंत्री के. सुरेंद्रन ने कहा था कि राज्य सरकार मंदिर की ओर जाने वाली किसी भी महिला को सुरक्षा मुहैया नहीं कराएगी, जिन महिलाओं को सुरक्षा की जरूरत है उनको सुप्रीम कोर्ट से आदेश पारित कराना चाहिए। दूसरी ओर पथानमथिट्टा जिले के कलेक्टर पीबी नोह ने कहा कि तीर्थयात्रियों के लिए सभी बुनियादी सुविधाएं जैसे शौचालय, पानी के खोखे और चिकित्सा आपातकालीन केंद्र मुहैया कराई गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश संबंधित मामले पर सुनवाई बड़ी बेंच को सौंप

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने केरल के प्रसिद्ध सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश संबंधित मामले पर सुनवाई करते हुए इसे बड़ी बेंच को सौंप दिया है। वहीं, कोर्ट ने 28 सितंबर 2018 के फैसले को बरकरार रखते हुए मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।

शीर्ष अदालत ने 28 सितंबर 2018 को 4 के मुकाबले एक के बहुमत से फैसला दिया था, जिसमें केरल के सुप्रसिद्ध अयप्पा मंदिर में 10 वर्ष से 50 की आयुवर्ग की लड़कियों एवं महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया गया था। फैसले में शीर्ष अदालत ने सदियों से चली आ रही इस धार्मिक प्रथा को गैरकानूनी और असंवैधानिक बताया था।

सबरीमला ही नहीं कई धर्मों में है ऐसी प्रथा

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मामले में दिए गए उसके फैसले की समीक्षा की मांग करने वाली याचिकाएं सात न्यायाधीशों की वृहद पीठ के पास भेजते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध केवल सबरीमला तक ही सीमित नहीं है बल्कि अन्य धर्मों में भी ऐसा है।

'धर्म और आस्था पर बहस फिर से शुरू करना चाहते हैं याचिकाकर्ता'

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपनी ओर से तथा न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा की ओर से फैसला पढ़ा। इसमें उन्होंने कहा कि सबरीमला, मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं में खतना जैसे धार्मिक मुद्दों पर फैसला वृहद पीठ लेगी। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि याचिकाकर्ता धर्म और आस्था पर बहस फिर से शुरू करना चाहते हैं। सबरीमला मामले पर फैसले में न्यायमूर्ति आरएफ नरिमन और डीवाई चंद्रचूड़ की राय अलग थी।

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