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जम्मू-कश्मीर: फारूक की पहेली में फंसी मोदी सरकार

नसीर गनई - JAN 11 , 2020
जम्मू-कश्मीर: फारूक की पहेली में फंसी मोदी सरकार
नई रणनीतिः फारूक अब्दुला, उमर और पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती के चुप्पी के दांव

कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने अपने नेताओं की गिरफ्तारी पर अपेक्षाकृत चुप्पी ही रखी तो लगता है, केंद्र भी कदम पीछे खींचने पर मजबूर हुआ। इसका संकेत और किसी हलके से नहीं, बल्कि खुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से आया है। शाह ने दिल्ली में एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में कहा कि तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों डॉ. फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को न तो उन्होंने और न ही सरकार में किसी अन्य ने कभी “राष्ट्रविरोधी” कहा, उन्हें तो कुछ भड़काऊ बयानों के बाद “कुछ समय के लिए” नजरबंद किया गया। गृह मंत्री ने यह भी कहा कि इन नेताओं को रिहा करने का फैसला जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश का प्रशासन करेगा। हालांकि पिछले साल पांच अगस्त से बंद तीनों मुख्यमंत्रियों और अन्य नेताओं को पता है कि रिहाई के बारे में फैसला केंद्र सरकार को करना है, स्‍थानीय प्रशासन का इससे कोई लेना-देना नहीं है।

गृह मंत्रालय के निर्देश पर श्रीनगर के एमएलए हॉस्टल में बंद नेताओं को रिहा करना शुरू हो चुका है। एमएलए हॉस्टल में अभी 25 नेता हिरासत में हैं। सरकार ने पांच नेताओं- पीडीपी के पूर्व विधायक जहूर मीर, पीडीपी के ही अशरफ मीर, नेशनल कॉन्फ्रेंस के डॉ. गुलाम नबी, पूर्व विधायक और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता इशफाक जब्बार और पूर्व विधायक यासिर रेशी को रिहा किया है। शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर (एसकेआइसीसी) और एमएलए हॉस्टल से पहले रिहा किए गए नेताओं में नेशनल कॉन्फ्रेंस के मोहम्मद सैयद आखून, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के इमरान अंसारी, कांग्रेस के हिलाल शाह और पीडीपी के नूर मोहम्मद शेख और यावर मीर शामिल हैं। अपने घर में ही नजरबंद रहे पीडीपी के गुलाम हसन मीर को पिछले महीने छोड़ा गया था। उन्हें घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी। हालांकि दूसरे लोग मीर से मुलाकात और बातचीत कर सकते थे। मीर कहते हैं कि मुख्यधारा के नेता राजनैतिक गतिविधियों में शामिल होने से बच नहीं सकते हैं। नेताओं को पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली की मांग के साथ संघर्ष शुरू करना चाहिए।

रिहा हुए एक नेता ने आउटलुक को बताया कि जम्मू-कश्मीर में राजनीति आखिरी पायदान पर है। अपना नाम उजागर न करने की शर्त पर इस नेता ने कहा, “मैं नहीं समझता कि अब कुछ बचा है। बात करने के लिए कुछ नहीं है। सबकुछ खत्म हो चुका है। मुख्यधारा की राजनीति खत्म हो गई है।”

सरकार ने पिछले साल पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 के तहत विशेष प्रावधानों को बेमानी कर दिया था। संचार माध्यमों पर प्रतिबंध लगाने और सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत कड़ी करने के साथ करीब 6,000 लोग गिरफ्तार किए गए थे। सरकार ने घाटी में गिरफ्तार किए गए नेताओं में से ज्यादातर को रिहा कर दिया है, लेकिन तीनों पूर्व मुख्यमंत्री समेत करीब 1,000 लोग अब भी जेलों में बंद हैं। इनमें 200 लोगों को उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों की जेलों में रखा गया है। अगस्त में सरकार ने घाटी में भाजपा नेताओं को छोड़कर मुख्यधारा के सभी नेताओं को गिरफ्तार कर एसकेआइसीसी में बंद कर दिया था। नवंबर में उन्हें एमएलए हॉस्टल में शिफ्ट कर दिया गया। अब उन्हें छोटे समूहों में गोपनीय तरीके के इस शर्त के साथ रिहा किया जा रहा है कि वे अनुच्छेद 370 को बेमानी बनाने के खिलाफ कोई बात नहीं करेंगे।

सूत्रों के अनुसार, जब एक वरिष्ठ नेता को एसकेआइसीसी में ले जाया जा रहा था, तो उन्होंने अधिकारियों से पूछा कि वहां उनके साथ मारपीट तो नहीं की जाएगी। सूत्रों ने कहा कि नेताओं को बेहद बुरे की आशंका थी। शुरू में नेता सोच रहे थे कि वे अपनी गिरफ्तारी के आदेश को अदालत में चुनौती देंगे, लेकिन बाद में उन्होंने यह विचार छोड़ दिया। अगस्त से चार महीने तक बंद रहे आरटीआइ कार्यकर्ता रजा मुजफ्फर भट कहते हैं, “अन्य बंदियों के साथ मैंने भी गिरफ्तारी के खिलाफ, जमानत या बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने के बारे में सोचा। लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और तीन बार मुख्यमंत्री रहे डॉ. अब्दुल्ला की नजरबंदी से हमें जमानत पर रिहाई का विचार बदलना पड़ा।” सरकार ने पांच अगस्त के बाद फारूक पर पीएसए के तहत दो बार केस दर्ज किए और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कहा है कि वह इसे चुनौती नहीं देगी।

श्रीनगर से सांसद डॉ. फारूक के खिलाफ पीएसए के तहत दर्ज केस का डोजियर 21 पन्नों का है। इसमें 27 आरोप, 16 पुलिस रिपोर्ट, तीन एफआइआर और अनुच्छेद 35ए को हटाए जाने के खिलाफ उनके 13 बयान हैं। श्रीनगर के जिलाधिकारी ने 14 सितंबर को जब उनके खिलाफ पीएसए लगाया, तब वे अपने गुपकार रोड आवास में पहले ही नजरबंद थे। जिलाधिकारी ने उनके निवास को ही उप-जेल घोषित कर दिया। पीएसए डोजियर में कहा गया है कि डॉ. अब्दुल्ला के कारण श्रीनगर और घाटी के दूसरे क्षेत्रों में अशांति का माहौल पैदा होने की आशंका है। उनका व्यवहार केंद्र के खिलाफ आम लोगों की भावनाएं भड़काने वाला है। देश की एकता और अखंडता के खिलाफ उनके बयानों से जनता भड़क सकती है। अब्दुल्ला के खिलाफ एक आरोप यह भी है कि उन्होंने आतंकियों का महिमामंडन करके राष्ट्रविरोधी तत्वों की गतिविधियों को जायज ठहराया। डोजियर में उनके जुलाई 2019 के बयान का हवाला दिया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था, “अगर अनुच्छेद 370 अस्थायी है तो भारत के साथ जम्मू-कश्मीर का विलय भी अस्थायी है।”

नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद हसनैन मसूदी ने आउटलुक से कहा, “जब गृह मंत्री कहते हैं कि तीनों नेता राष्ट्रविरोधी नहीं हैं, तो प्रशासन को उन्हें रिहा कर देना चाहिए। इससे नजरबंदी का आधार गलत साबित होता है।” वे कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन को फारूक के खिलाफ पीएसए के तहत नजरबंदी खत्म करनी चाहिए और महबूबा और उमर को भी रिहा करना चाहिए। ये दोनों सीआरपीसी की धारा 107 के तहत बंद हैं। मसूदी तर्क देते हैं कि अब्दुल्ला के खिलाफ जिस तरह पीएसए लगाया है, उससे सरकार ने उन्हें पूरी तरह राष्ट्रविरोधी करार दे दिया है। अब गृह मंत्री कहते हैं कि वे राष्ट्रविरोधी नहीं हैं, तो सरकार को उन्हें तत्काल रिहा भी कर देना चाहिए।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह भी कहा था कि कांग्रेस फारूक अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला को 12 वर्षों तक जेल में रखने की बात भूल रही है। इस पर राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि फारूक अब्दुल्ला, शेख अब्दुल्ला नहीं हैं। फारूक ने कभी भी भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय पर सवाल नहीं उठाया। एक राजनैतिक विश्लेषक ने कहा, “डॉ. अब्दुल्ला की गिरफ्तारी लंबे अरसे तक केंद्र सरकार को परेशान करती रहेगी। अगर फारूक भारतीय नहीं हैं तो कश्मीर में कोई भी भारतीय नहीं है। सरकार ने न सिर्फ फारूक की भारतीयता पर संदेह किया, बल्कि उन्हें गिरफ्तार किया। कश्मीरियों को यह लंबे समय तक याद रहेगा। अगर वे फारूक के वफादार नहीं हो सकते हैं, तो वे कश्मीर में किसी के भी वफादार नहीं हो सकते हैं।”

तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों के राष्ट्रविरोधी होने की तोहमत को नकारने वाला गृह मंत्री का बयान इस बात का संकेत है कि सरकार को अपनी गलती का एहसास हो रहा है और अब वह जम्मू-कश्मीर में पैदा हुए संकट से बाहर निकलना चाहती है। लेकिन जम्मू-कश्मीर की मुख्यधारा की राजनीति में अहमियत रखने वाला कोई भी नेता समझौता करने को तैयार नहीं है। तीनों पूर्व मुख्यमंत्री जेल में शांत हैं। उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को अपनी नजरबंदी को चुनौती नहीं देने के निर्देश दिए हैं। इससे संकेत लेते हुए मुख्यधारा के किसी भी नेता ने जम्मू-कश्मीर की अदालतों में अपनी गिरफ्तारी के खिलाफ याचिका दायर नहीं की। वे यह बताना चाहते हैं कि उनके खिलाफ सरकार का कदम राजनैतिक है।

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