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देशद्रोह के मुक़दमे चलाने में कोई दल पीछे नहीं

फ़िल्म अभिनेत्री राम्या पर देशद्रोह की धाराओं में मुक़दमा दर्ज होने के बाद बेशक स्वयं राम्या और कांग्रेस के अन्य नेता केंद्र की एनडीए सरकार और भाजपा को कोस रहे हों मगर यह भी ज़मीनी हक़ीक़त है कि इस धारा इस्तेमाल करने में ख़ुद कांग्रेस भी कभी पीछे नहीं रही। भाजपा और कांग्रेस को ही क्यों दोष दें अन्य क्षेत्रीय दल भी अपने विरोधियों को निपटाने में इस क़ानून का जमकर प्रयोग कर रहे हैं ।
देशद्रोह के मुक़दमे चलाने में कोई दल पीछे नहीं

पाकिस्तान की तारीफ़ सम्बंधी एक वक्तव्य पर राम्या के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 124 A के तहत कर्नाटक के एक वक़ील द्वारा मुक़दमा दर्ज कराने के बाद क़ानून की इस धारा के ख़िलाफ़ देश भर में बहस शुरू हो गई है । मानवाधिकारो की वकालत करने वाले संगठन इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख़िलाफ़ मानते हैं । उनका कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत देश के सभी नागरिकों को बोलने की आज़ादी है मगर सेडिशन लॉ यानि देशद्रोह के नाम पर इसे कुचला जा रहा है । बक़ौल उनके अंग्रेज़ों ने ग़ुलामी के दौर में वर्ष 1860 में इसे लागू किया था मगर अब हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं अतः अब इस क़ानून की देश को आवश्यकता नहीं है । उनका यह भी तर्क है कि स्वयं ब्रिटेन में अब यह क़ानून नहीं है सो हमें भी इसे अपनी जनता पर अब और नहीं लादना चाहिए । मावधिकार कार्यकर्ता सचिन सिंघल के अनुसार यह क़ानून अपने विरोधियों को सबक़ सिखाने के लिए ही आम तौर पर लगाया जाता है और यही वजह है कि एसे तमाम मुक़दमे अदालत में टिक नहीं पाते ।  

वक़ील विट्ठल गौड़ा द्वारा फ़िल्म अभिनेत्री और कांग्रेसी नेता राम्या के ख़िलाफ़ दर्ज कराया गया मुक़दमा भी अब अदालत के दरवाज़े पर है । बेशक भाजपा से जुड़े संगठनों के दबाव में मुक़दमा दर्ज हुआ हो मगर इस समय कर्नाटक में कांग्रेस की ही सरकार है  और उसके शासन में ही यह मुक़दमा हुआ। बिहार, उड़ीसा, दिल्ली , तमिलनाडू , झारखंड , छत्तीसगढ़, राजस्थान और गुजरात में भी इस क़ानून का ख़ूब इस्तेमाल हुआ है। तमिलनाडू में अन्नाडीएमके के शासन में कुड़मकुलम परमाणु संयंत्र का विरोध करने पर एक साथ सात हज़ार लोगों पर इस क़ानून के तहत मुक़दमा दर्जहुआ था । कांग्रेस के शासन में ही मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के ख़िलाफ़ बंगलुरु में भी यही कार्रवाई हुई थी । हालांकि वर्ष 1962  में बिहार के केदारनाथ सिंह बनाम सरकार मामले में सर्वोच्य न्यायालय की एक बेंच ने व्यवस्था दी थी कि किसी भी भाषण के चलते देशद्रोह का मामला तब तक नहीं बनता जब तक कि उसके कारण हिंसा , असंतोष और समाज में असंतुष्टिकरण ना बढ़ता हो। बावजूद इसके हर साल पचास से अधिक मुक़दमे इस क़ानून के तहत दर्ज किए जा रहे हैं ।

हाल ही के वर्षों में नक्सली नेता बिनायक सेन , नारायण सान्याल और पीयूष गुहा , कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी , गूज़र आंदोलन केप्रमुख किरोड़ी मल बैंसला , पाटिदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल और जेएनयू प्रकरण में कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ देशद्रोह के मामले दर्ज हुए। इन मामलों में नारायण सान्याल और पीयूष गुहा को छोड़ कर अन्य सभी आरोपियों को अदालत ने ज़मानत पर रिहा कर दिया है। पूर्व में लेखिका अरुंधती राय और कश्मीरी नेता सैयद अली शाह गिलानी भी इस क़ानून के तहत मुक़दमा झेल चुके हैं । जिन राज्यों में यह मुक़दमे दर्ज हुए वहाँ भाजपा और कांग्रेस की ही अधिकांशत सरकारें हैं । राम्या प्रकरण के बाद इस क़ानून पर देश में चर्चाओं का एक और दौर शुरू होने की सम्भावना है ।

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