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निर्भया कांडः निगहबानी की कमी से बनते अपराधी बच्चे

निर्भया बलात्कार कांड के नाबालिग मुजरिम के बाल सुधार गृह से 21 दिसंबर को छूटने के बाद भी उस मसले पर बहस जारी है और नए बाल अपराध कानून को लेकर मशक्कत चल रही है। इस संबंध में इस संवाददाता को उस समय का एक प्रसंग याद रहा है।
निर्भया कांडः निगहबानी की कमी से बनते अपराधी बच्चे

 उक्त नाबालिग दोषी और तीन मुख्य आरोपी राम सिंह, मुनिरका (जिसने तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली थी। ) की झुग्गी-बस्ती में रहते थे। निर्भया में अभी सांस बाकी थी। मैंने मुनिरका की उस झुग्गी-बस्ती जाकर राम सिंह समेत तमाम आरोपियों के परिवारों से मुलाकात की थी। अब तक समाज और परिवार घर से बाहर लड़की की दिनचर्या पर ही निगाह रख रहा है। लेकिन लड़कों पर निगाह न रख कर परिवार और समाज ज्यादा बड़ा खतरा मोल लेते हैं।

 

नाबालिग के पिता ने मुझसे बताया कि उनका बेटा पढ़ाई में बहुत अच्छा था। उसकी पढ़ाई के लिए घर का कुछ सामान भी बेचा गया था। उसके पिता और मोहल्ले वालों के अनुसार इस बस्ती में राम सिंह का दबदबा था। वह गुंडागर्दी करता। सभी उससे डरते थे। किसी की हिम्मत नहीं थी कि जाकर पुलिस में उसकी शिकायत करे। वह राह चलते किसी की भी लड़की को छेड़ देता। जिस दिन वह नल पर पानी भरने निकलता आसपास के लोग अपनी जवान बहू-बेटियों को घर से नहीं निकलने देते थे। आसपास के लोगों ने बताया कि एक-दो दफा किसी ने उसकी शिकायत की भी तो पुलिस ने अनसुना कर दिया। यही नहीं राम सिंह की पत्नी की मौत हो चुकी थी और उसने पड़ोस की ही शादीशुदा औरत से शादी कर ली थी।

 

इस नाबालिग की रामसिंह से दोस्ती हो गई थी। उसके पिता बताते हैं कि वह कभी पूछते थे कि कहां जा रहे हो, तो कहता,  ‘दोस्त के यहां पढ़ने जा रहा हूं।’ पूछते कि कहां से आ रहे हो तो कहता ‘एक जरूरी काम से आ रहा हूं।’ इसके पिता के अनुसार, ‘हमने कभी न तो यह देखा कि हमारा बेटा कहां जा रहा है, न यह देखा कि वो कहां से आ रहा है, न कभी उसके दोस्तों का हिसाब रखा कि वह किस से मिलता-जुलता है।’ उसके पिता बताते हैं, ‘ उस रात मैं काम से लौटा। उसने घर पर खाना नहीं खाया। काफी खुश नजर आ रहा था। उसने कहा कि आज दोस्त के यहां पार्टी है, वहीं खाना खाएगा। हमने पलटकर न तो कभी पहले पूछा था न अब पूछा। हमें इस बात से भी लेना-देना नहीं रहता था कि वह रात में कितने बजे लौट रहा है।’   

 

दोषी नाबालिग के पिता बोलते जा रहे थे, हम सुनते जा रहे थे। बीच-बीच में हमारे कुछ सवाल रहते। उनके अनुसार, ‘अगर हमने कभी इस बात पर ध्यान दे लिया होता कि वह घर से बाहर किससे मिल रहा है या पता लग जाता कि राम सिंह से इसकी दोस्ती है या हम उसके आने-जाने और उसकी हरकतों का हिसाब रखते तो आज यह सब कभी न होता।’ उसके पिता रोने भी लगे। उनके भाव बता रहे थे कि इस पिता को इस बात का बेहिसाब गम था कि काश वह अपने बेटे की दिनचर्या का थोड़ा हिसाब रखते। बेटा होने के नाते उसे तमाम छूट न देते। कम से कम बस्ती में तो उसकी दोस्तियों की खबर रखते ही। खासकर राम सिंह से दोस्ती की उन्हें खबर तक नहीं थी। समय के रहते पता रहता तो वह अपने बेटे को राम सिंह के परछाई से भी दूर रखते।  

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