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एक उभरते विश्वविद्यालय को कैसे खत्म करें, न्यू इंडिया के किचन से जायकेदार रेसिपी

डॉ. संघमित्रा शील आचार्य - NOV 27 , 2019
एक उभरते विश्वविद्यालय को कैसे खत्म करें, न्यू इंडिया के किचन से जायकेदार रेसिपी
एक उभरते विश्वविद्यालय को कैसे खत्म करें, न्यू इंडिया की किचन से जायकेदार रेसिपी
डॉ. संघमित्रा शील आचार्य

इस अनोखी रेसिपी के लिए जरूरी मसाला है अहंकार, बेशर्मी और असम्मान। इन मसालों को बराबर मात्रा में मिलाने से यह विधि पूरी हो जाती है। खराब परामर्श और तीखा और नमकीन मीडिया स्वादानुसार। विधि एकदम सरल है। बहस और परिचर्चा के लिए सार्वजनिक स्थान सीमित कर दो। महज 100 मीटर की अदृश्य सीमा रेखा खींच दो। चारों ओर आप जहां भी जा सकते हों, वहां बोगेनविलिया के भारी गमले रख दो ताकि आप संस्थान के प्रमुख की ओर ही जा सके। कुछ समय तक ऐसी ही स्थिति बनी रहने दो।

इस विधि का अगला कदम है कि समूची लोकतांत्रिक बहस प्रक्रिया को दरकिनार कर दो और एक के बाद एक सर्कुलर भेजते रहो, स्पष्टीकरण और सूचना मांगने वालों को इंतजार करते रहने दो। महज स्काइप से मौखिक परीक्षा लेकर स्थापित रिसर्चर के स्थान पर नए लोगों को नियुक्त करके अनुसंधान कार्यक्रमों का मखौल बनाओ। ये सारे काम संसाधनों की कमी के नाम पर करो। एम-फिल के लिए मौखिक परीक्षा बंद करने के लिए सुझाव किसी को मत देने दो और पीएचडी की व्यक्तिगत मौखिक परीक्षा को भी जारी रहने दो। दुनिया की दूसरी यूनीवर्सिटी की सूचनाओं के साथ इसमें उबाल आने लगेगा और मौखिक परीक्षा से पीएचडी का उत्सव मनाओ। दुनिया की यूनीवर्सिटीज को व्यक्तिगत मौखिक परीक्षा को गारंटी देने दो। स्काइप पर मौखिक परीक्षा के दौरान पता चलने पर भी कनेक्टिविटी की समस्या मत सुलझाओ। ये समस्याएं आप पहले ही बता चुके हैं। बेहतर होगा कि फील्ड वर्क, गेस्ट लेक्चर और विद्वानों के दौरों पर होने वाले खर्चों का बजट घटाकर संसाधनों की कमी से निपटा जा सकता है। तो फिर फेंसी लाइट्स और फुटपाथ देखकर ही इन्फ्रास्ट्रक्चर का पता चल जाता है। अकादमिक बिल्डिंग्स, आवासीय क्षेत्र, हॉस्टल, जलापूर्ति, बिजली फिटिंग्स, दीवारों पर नमी, दीमक और अन्य कीट की समस्याओं को भी नजरंदाज किया जा सकता है। गंदे हॉस्टल और अन्य इमारतों के टॉयलेट की शिकायत की जाती है तो फंड की कमी को जिम्मेदार बताया जाता है। सफाई कर्मचारियों के वेतन में अत्यधिक कटौती होने पर जब वे देय भुगतान की मांग उठाते हैं तो इस बात को भुला दिया जा है कि वे पिंक पैलेस के रेस्ट रूम्स में सफाई करते हैं और रूम फ्रेशनर, हैंड टॉवेल, पेपर नैपकिन, टिश्यू रोल्स, सुगंधित लिक्विड सोप दूसरी इमारतों के टॉयलेट की कीमत पर सजाते हैं। दूसरी इमारतों में टिश्यू पेपर होल्डर टूटे पड़े हैं जिनमें कभी टिश्यू पेपर नहीं दिखाई दिए। सोप डिस्पेंसर प्रायः खाली रहते हैं और सिस्टर्न आमतौर पर खराब रहते हैं। बहस के लिए कोई बैठक मत करो और कोई मंच उपलब्ध मत कराओ। फैसले थोपने के लिए नियमित रूप से सर्कुलर भेजते रहो। सुनिश्चित करो कि उच्च शिक्षा की प्रतिष्ठा और महत्ता छिन्न-भिन्न हो जाए। सुनिश्चित करो कि अकादमिक वर्ष 2012-13 से पहले यूजीसी के नियम के अनुसार डॉक्टोरल प्रोग्राम से अपंजीकृत हुए छात्रों को अपनी सुविधानुसार कभी भी थीसिस जमा करने के बजाय जुलाई 2020 तक का वक्त तय कर दो, फिर भले ही यह मौजूदा नियामकीय प्रावधानों के विरुध हो। आपको क्लॉज 9बी के प्रावधानों को नजरंदाज करने की सलाह दी गई तो आपने ऐसा ही कर दिया। इससे धीमी आग पर पक रहे शोरबे को उबालने के लिए कहानी गढ़ सकेंगे। इसके बाद तमाम क्षेत्रों के नए स्कूल शुरू कर दो, जबकि ऐसे संस्थान पहले से ही स्थापित हैं। इन प्रोग्राम्स में प्रवेश पाने वाले छात्रों को आवास देने के लिए विवाहित स्कॉलर के हॉस्टल खाली करवा लो। यूनीवर्सिटी के उद्देश्य और विजन को नजरंदाज करके अत्यधिक ऊंची फीस पर इन हॉस्टलों में इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट डिग्री के छात्रों को स्थान दे दो।

लाइब्रेरी के फंड में कटौती कर दो, सुरक्षा पर खर्च तीन गुना बढ़ा दो, कुछ युवाओं के सपनों को कुचल दो, आकांक्षाओं को दबा दो और उन्हें नए आइएचए नियम लागू करके उन्हें ब्लेंडर में भर दो। अध्यादेश लाकर सुनिश्चित कर लो कि प्रक्रिया के बारे में कोई बहस न हो।

इसे बाद क्लीन इंडिया मिशन के नाम पर बगैर सोचे-समझे कैंपस की दीवारें साफ करने का (पिंक पैलेस को छोड़कर बाकी सभी इमारतों और हॉस्टलों में गंदे शौचालयों को भूलकर) आदेश लागू कर दो। इस काम में लगने वाले कर्मचारियों के लिए आवश्यक उपकरणों की परवाह किए बगैर यह आदेश फुर्ती के साथ लागू करो। यह भी तय करो कि इस काम में लगने वाले अनुबंधित कर्मचारी हो जिन्हें कई महीनों तक वेतन भी नहीं मिल पाता है। अगर आपने उन्हें सुंदर पोस्टरों तक पहुंचकर हटाने के लिए जर्जर सीढ़ी भी दे दी तो यह भी बहुत है। अगर हल्की नीली रंग की शर्ट पहने किसी युवा कर्मचारी ने अपने साथियों के साथ किसी पोस्टर को हटाने से पहले सेल्फी ले ली तो आपको इस पर ध्यान नहीं देना है। इन अनुबंधित युवा कर्मियों ने इस तरह अनजाने में ही कितना अच्छा संदेश दे दिया, इस पर भी गौर करने की कोई जरूरत नहीं है। जब भारत और विदेश में एक के बाद एक शहर स्ट्रीट आर्ट को अपना रहे हैं और वॉल पेंटिंग को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन आप उन्हें दीवारों से खुरचने पर तुले हैं ताकि स्वच्छता के सहारे धीमी आग पर पकता शोरबा तैयार हो सके। इन शहरों और संस्थाओं को सावधानी से गिन लो। उन्हें पकाने के बर्तन में रख दो। उन्हें उफनने दो, उसके बाद उन्हें निकालकर फेंक दो। बिल्कुल ध्यान मत दो कि वसंत कुंज नजदीक ही है और थोड़ी दूरी पर लोधी कॉलोनी है जहां के लोगों ने कला प्रदर्शन लगाई जो उन्होंने अपने घरों के बाहर दीवारों पर बनाई। चिंता मत कीजिए कि उज्जैन, इंदौर, पटना, जयपुर, कोच्चि, अहमदाबाद, लखनऊ न सिर्फ स्वच्छता के साथ आर्ट को अपनाया गया बल्कि वहां सुरक्षित और खूबसूरत सार्वजनिक स्थल भी उपलब्ध कराए हैं। वहां सब-वे और अंडरपास, मेट्रो रेल और बस स्टेशन तमाम तरह की आर्ट्स के लिए स्थान सुलभ कराते हैं। लेकिन यहां तो शोरबे को थोड़ा और उबलने दो। इन सबकी चिंता किए बगैर श्लोक और मंत्रों के उच्चारण के बीच कूड़ेदान का ढक्कन बंद कर दो।

अब कूड़े दान बंद हो चुका है। आपको यह सुनिश्चित करना है कि इसमें और कचरा न हो। तब भी नहीं जब एक छात्र गायब हो जाता है और उसका अभी तक कुछ भी पता नहीं चलता है। इसके लिए, आप भावनाओं और संवेदनशीलता को समाप्त कर दो और रूल बुक से कुछ मौजूदा अध्यादेशों को निकाल दो। उन्हें कुचल दो और सुनिश्चित करो कि संस्थागत प्रक्रिया का पालन नहीं करना है ताकि बहस के लिए स्थान घटाने का अभियान जारी रहे। सिग्नेचर बिल्डिंग के सामने बनी खूबसूरत सीढ़ियां सार्वजनिक बहस और चर्चाओं के लि उपयुक्त स्थान है। 2016 में इसका उदाहरण देखने को मिला था। बसंत ऋति में कैंपस को महकाने वाले खूबसूरत बोगेनविलिया का इस्तेमाल ऐसे करो ताकि बहस और चर्चाओं की ताकत को रोका जा सके। एक आवश्यक सामग्री मिलाने की जरूरत है, वह है सफाई से विभाजित किया गया जेएनयू एक्ट जिसके जरिये इस संस्थान की स्थापना हुई। इसे तोड़ दो और पहले से ही पीसे गए यूजीसी नियमों के साथ उन्हें अच्छी तरह मिलाओ। इसे तीखा बनाने के लिए एचआरडी मंत्रालय की कुछ गाइनलाइनों को छिड़क दो। आपको मिलेगी टाइम टेबल का मिश्रण। ऐसा टाइम टेबल जिसमें सभी कार्यक्रमों और स्कूलों में 55 मिट की क्लासों का प्रस्ताव होगा। इसके अलावा पाठन के लिए स्थान बहुत कम, साथ ही सेंट्रल सिविल सेवा नियम। इसके साथ कर्फ्यू टाइम और ड्रेस कोड को भी मिला दो।

सजावट के लिए बहुविकल्प सवाल आधारित प्रवेश परीक्षा जो नेशनल टेस्टिंग एजेंसी द्वारा आयोजित की जाएगी। इस पर अकादमिक समुदाय से आने वाले सुझावों की ओर कोई ध्यान मत दो। इससे एजेंसी द्वारा किए गए इंतजामों में व्यवधान आएगा। इसके बजाय विचार करो कि एजेंसी को इतने ज्यादा स्कूलों और सेंटरों के अनेक प्रश्न पत्रों में कैसे मदद दी जाए। ऐसे में प्रश्न पत्रों की संख्या घटाने के लिए कुछ नए प्रपत्र ले लो, उन्हें साफ करके अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल कर लो, फिर भले ही मकसद से भटक जाएं। प्रत्येक स्कूल के सभी सेंटरों के लिए एक कॉमन प्रश्न पत्र तैयार करने के लिए इनका इस्तेमाल करो। एजेंसी को सहायता देना बहुत महत्वपूर्ण है। फिर भले ही विभिन्न स्कूल और सेंटर होने के औचित्य को ही क्यों न धता बताते हों। अभी तक अलग-अलग प्रश्न पत्र इसी वजह से इस्तेमाल होते रहे हैं।

केक पर सजावट है पुलिस की तैनाती। छात्र जितने बार प्रदर्शन करते हैं, पुलिस उससे दोगुनी बार तैनात कर दी जाए। जब वे प्रक्रियागत कुप्रबंधन पर सवाल आठाएं, उन्हें पुलिस से पिटवाओ, आगजनी और दंगा फैलाने के आरोप लगाओ। दुर्व्यवहार के लिए दिव्यांग छात्रों और लड़कियों पर खास ध्यान दो। संसद में अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से मिलने के लिए मार्च निकालने के लोकतांत्रिक अधिकार उन्हें मत दो। आम लोगों के दिमाग में यह बिठा दो कि ये लोग करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग कर रहे हैं। इस बात पर भी ध्यान मत दो कि वे आंदोलन कर रहे हैं लेकिन वे अपने अध्ययन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ने दे रहे हैं। वे अपने क्लासरूम से बाहर आंदोलन के स्थान पर ही अध्ययन कर रहे हैं। आम लोगों का ध्यान उच्च शिक्षा की पहुंच के बड़े सवाल से भटका दो कि फीस वृद्धि से करीब आधे छात्र बाहर हो जाएंगे। और ऐसे प्रस्ताव सेमिस्टर के मध्य में बिना किसी परामर्श किए लाओ और आइएचए के तानाशाह प्रमुखों के जरिये लागू कर दो।

यह शोरबा करीब चार हफ्ते तक पकता और उफनता रहेगा। यह भी सुनिश्चित करो कि प्रेशर कुकर के सेफ्टी वॉल्व बंद हों। अन्यथा भाव उठेगी और कुकर आपके चेहरे पर ही फट जाएगा। एचआरडी मंत्रालय छात्रं और उनके मेंटर्स से बात करेगा इस काम के लिए आप सही नहीं होंगे।

(लेखक जवाहरलाल नेहरू यूनीवर्सिटी में स्कूल ऑफ स्कूल सोशल साइंसेज के सेंटर ऑफ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ में प्रोफेसर एवं चेयरपर्सन हैं।

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