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चर्चाः मथुरा में राष्ट्रद्रोह का आतंक। आलोक मेहता

यह छत्तीसगढ़-झारखंड-आंध्र जैसे प्रदेशों के घने जंगलों वाला आदिवासी क्षेत्र नहीं है। यह जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती पर्वतीय ग्रामीण क्षेत्र नहीं है, जहां आतंकवादियों की घुसपैठ हो सकती है। यह तो राजधानी दिल्ली से डेढ़ घंटे में पहुंच सकने वाली ऐतिहासिक सांस्कृतिक मथुरा नगरी है, जहां लगभग दो वर्षों से भारतीय संविधान के तहत बने राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री को हटाने और अपनी करेंसी का विद्रोही अभियान चलाने वाले सिरफिरे गिरोह ने दो सौ एकड़ से अधिक क्षेत्र पर कब्जा कर रखा था।
चर्चाः मथुरा में राष्ट्रद्रोह का आतंक। आलोक मेहता

गिरोह का सरगना रामवृक्ष यादव उत्तर प्रदेश सरकार में नौकरी की पेंशन भी ले रहा था। उसने खुद को सत्तर-अस्सी के दशक में ‌सक्रिय जय गुरुदेव का स्वयंभू उत्तराधिकारी घोषित कर महान नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नाम का दुरुपयोग कर सैकड़ों लोगों को इकट्ठा कर मथुरा के जवाहर बाग पर माओवादी इलाकों की तरह कब्जा किया हुआ था। अदालती आदेश के बाद जब पुलिस कब्जे को हटाने पहुंची तो शहर के एस.पी. और इंस्पेक्टर सहित 24 लोग मारे गए, 200 घायल हुए और भारी मात्रा में हथियार-गोला-बारूद बरामद हुआ।

इस आतंकवादी गतिविधि पर उ.प्र. सरकार की अनदेखी, लापरवाही, जातिगत राजनीति के लिए अब आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। लेकिन संघीय व्यवस्‍था में केंद्र-राज्य के बीच गहरे संबंधों का दावा करने वाली केंद्र सरकार, उसकी गुप्तचर एजेंसियों और मथुरा संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाली मशहूर अभिनेत्री हेमामालिनी ने इस हिंसक गिरोह को हटाने और कठोर कदम उठाने के लए अखिलेश सरकार से तालमेल क्यों नहीं बनाया? हेमामालिनी ने तो यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि वह तो कलाकार हैं और ऐसी घटना की जानकारी उन्हें नहीं थी।

डिजिटल इंडिया वाली सरकार में सांसद हर मिनट ट्विटर, फेसबुक, ई मेल, मोबाइल से दुनियाभर में अपनी जयकार करते रहते हैं। लेकिन दो साल से अवैध छावनी बनाने वाले गिरोह को गिरफ्तार कर कठोर कार्रवाई की कोशिश क्यों नहीं की गई? जेएनयू के छात्रों के बीच नारेबाजी पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा बन सकता है, लेकिन महीनों से संवैधानिक पद और भारतीय मुद्रा के बदले अपने सिक्के चलाने की आवाज उठा रहे लोगों पर ‘राष्ट्रद्रोह’ का मामला क्यों नहीं चलाया गया? संभवतः केवल घृणित राजनीति के खेल के लिए।

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