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आर्यभट्ट से भी पुराना है 'जीरो', शोध में सामने आए नए प्रमाण

SEP 17 , 2017

'जब जीरो दिया मेरे भारत ने...' पूरब और पश्चिम फिल्म का महेंद्र कपूर का ये गीत काफी लोकप्रिय रहा है। शून्य की खोज भारतीय उपमहाद्वीप में हुई, इस बात को पूरी दुनिया मानती है। लेकिन शून्य का उपयोग कब से होता आ रहा है, इस बारे में नए तथ्य सामने आए हैं, जिसके आधार पर तीसरी सदी में जीरो के इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं। अगर वाकई ऐसा है तो मानना पड़ेगा कि आर्य भट्ट से पहले भी जीरो का इस्तेमाल हो रहा था। हालांकि, इससे आर्यभट्ट का महत्व कम नहीं हो जाता क्योंकि जीरो के व्यापक इस्तेमाल और दुनिया से इसका परिचय कराना का श्रेय उन्हें ही जाता है। लेकिन यह बहस जरूर छिड़ गई है कि क्या आर्य भट्ट से पहले भी भारतीय जीरो से वाकिफ थे 

सन 1881 में पेशावर के पास एक गांव की खुदाई में बख्शाली की पांडुलिपि मिली थी, जिनमें शून्य का उल्लेख मिलता है। 1902 से ही यह पांडुलिपी ब्रिटेन के बोडलीयन लाइब्रेरी में सुरक्षित है। अब तक माना जाता था बख्शाली पांडुलिपि सातवीं या आठवी सदी की हैं, लेकिन ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने कार्बन डेटिंग के जरिए पता लगाया है कि यह पांडुलिपि जितनी पुरानी मानी जाती थी, उससे करीब 500 साल ज्यादा पुरानी है।

अब तक जीरो की खोज का श्रेय आर्य भट्ट को दिया जाता है जिनका जन्म 476 ईसवीं में हुआ था। अगर बख्शाली पांडुलिपि की कार्बन डेटिंग से प्राप्त तथ्यों पर गौर करें तो अनुमान लगाया जा सकता है कि आर्य भट्ट से पहले तीसरी सदी के आसपास भी भारतीयों को जीरो की समझ थी। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफेसर मारकुस डू सॉटॉय का कहना है कि कार्बन डेटिंग के मुताबिक यह पांडुलिपि दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच की है, जिसमें सैकड़ों शून्य हैं।

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शून्य को लेकर सामने आए नए इन तथ्यों और आर्य भट्ट द्वारा शून्य की खोज को लेकर छिड़ी बहस पर टिप्पणी करते हुए राज्यसभा टीवी के पूर्व सीईओ एवं एडिटर-इन-चीफ गुरदीप सिंह सप्पल फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं कि दरअसल सच यही है कि जीरो का आविष्कार आर्य भट्ट ने नहीं किया था। ऐसा दावा भी किसी इतिहासकार या गणितज्ञ ने कभी नहीं किया है। आर्य भट्ट वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने जीरो का व्यापक इस्तेमाल किया और उसके मान को परिभाषित किया। तभी जीरो का महत्व समझा गया और गणित में एक क्रांति का रास्ता खुला। हालांकि, आर्यभट्ट ने जीरो का इस्तेमाल सीधे सीधे नहीं किया था। उन्होंने अंकों (numbers) की जगह अक्षर लिखे और हर अक्षर का मान तय किया। इस तरह शब्दों में संख्या लिखी। 

शून्य गणित की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक है, जिसका दर्शन में भी उतना ही महत्व है। यहां तक कि आधुनिक कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की बुनियाद जिस बाइनरी सिस्टम (0 या 1) पर खड़ी है, वह भी शून्य पर टिका है। वास्तव में शून्य उस समाज और संस्कृति से आता है, जिसने शून्य से लेकर अनंत तक के विचार दुनिया से सामने रखे और 'कुछ नहीं अथवा शून्य' के लिए संकेत का इस्तेमाल करते हुए गणित के जटिल रहस्य सुलझाए।

बख्शाली पांडुलिपि

ब्रिटेन के ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय में रखी बख्शाली पांडुलिपि में शून्य का उल्लेख मिलता है। यह पांडुलिपि 70 भोजपत्रों पर लिखी है।  यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफर्ड में गणित के प्रोफेसर मार्कस डु सॉतॉय का कहना है कि यह पांडुलिपि बौद्ध भिक्षुओं के लिए तैयार की गई ट्रेनिंग मैनुअल जैसी प्रतीत होती है। इसे सन 1881 में एक स्थानीय किसान ने खोजा था। जिस गांव में यह पांडुलिपि मिली उसी के नाम पर इसका भी नाम रख दिया गया। अब यह गांव पाकिस्तान में है।

बख्शाली पांडुलिपि दरअसल बौद्ध भिक्षुओं के प्रशिक्षण में काम आने वाली लगभग सत्तर पन्नों की पुस्तिका की तरह है। इसे अब तक नवीं सदी की रचना माना जाता था। इसकी खास बात यह है कि इसमें सैकड़ों जगह बिंदु के रूप में गणितीय शून्य के निशान बने हुए हैं। नवीं सदी में ही ग्वालियर के एक मंदिर में भी एक गोलाकार शून्य का निशान बनाया गया था, जिसकी तस्वीरें गणित के इतिहास से जुड़ी हर लाइब्रेरी में लगी रहती हैं। लिहाजा अभी तक आम धारणा यही थी कि इस निशान का प्रचलन नवीं सदी के आसपास ही हुआ होगा।

दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच की है पांडुलिपि

बख्शाली पांडुलिपि के बारे में प्रोफेसर सॉतॉय का कहना है कि यह गणित से भरी पड़ी है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि हमने शून्य को पहचान लिया। इसलिए वह ग्वालियर के उस मंदिर में भी गए थे, जहां दीवार पर शून्य अंकित है। यह नौवीं सदी के मध्य का माना जाता है। उम्मीद थी कि यह पांडुलिपि वहां मिलेगी लेकिन वहां ऐसा कुछ नहीं मिला। कार्बन डेटिंग के मुताबिक यह पांडुलिपि दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच की है, जो सबको हैरान करता है कि इसमें लिखा शून्य कितना पुराना है।

अभी तक छठी सदी का माना जाता रहा है शून्य

अभी तक माना जाता रहा कि शून्य के इस संकेत का इस्तेमाल छठी सदी में ब्रह्मगुप्त ने किया लेकिन अब नए शोध से शून्य का इतिहास और भी पीछे चला गया है। गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त की शून्य की अवधारणा 628 ईस्वी में आती है, हालांकि इसके लिए उन्होंने कोई चिह्न नहीं निर्धारित किया। इसलिए माना जाता रहा है कि इसके सौ-दो सौ साल बाद बिंदु या गोले की शक्ल में शून्य बनाया जाने लगा होगा। इधर,  बख्शाली पांडुलिपि की कार्बन डेटिंग से पता चला है कि इतने सारे भोजपत्र एक साथ नहीं लिखे गए होंगे। इनकी लिखावट में कई सदियों का फासला दिखता है। सबसे पुराने भोजपत्र की लिखाई 224 ई. से 383 ई. के बीच की है। 160 साल का यह अंतर कार्बन डेटिंग का एरर मार्जिनहै। यानी दावे के साथ सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि यह लिखाई न तो 224 ई. से पहले की है, न ही 383 ई. के बाद की।

दर्शन में शून्य की अवधारणा

इसमें कोई शक नहीं कि दर्शन में शून्यवाद की अवधारणा तीसरी सदी ईसा पूर्व के बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन की दी हुई है। उनके ही ग्रंथ माध्यमक का प्रसिद्ध वाक्य है- शून्य है तो सब कुछ संभव है, शून्य नहीं है तो कुछ भी संभव नहीं है।लेकिन इस अवधारणा का गणितीय शून्य से कोई जुड़ाव हो सकता है, इस पर विद्वानों में कभी सहमति नहीं बन सकी।

अभी गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त से कम से कम चार सौ साल पुरानी एक लिखाई में शून्य पा लिए जाने के बाद हम काफी पुख्ते के साथ यह कह सकते हैं कि केवल दार्शनिक शून्य के ही नहीं, गणितीय शून्य के आविष्कारक भी नागार्जुन ही हैं। खासकर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि पेशावर के इर्दगिर्द का इलाका पारंपरिक रूप से महायानियों का था, जो अपना आदिपुरुष नागार्जुन को ही मानते हैं।

 

 

 


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