Home देश भारत नम आंखों के साथ शीला दीक्षित को अंतिम विदाई, अंतिम संस्कार में भारी भीड़

नम आंखों के साथ शीला दीक्षित को अंतिम विदाई, अंतिम संस्कार में भारी भीड़

आउटलुक टीम - JUL 21 , 2019
शीला दीक्षित का अंतिम संस्कार आज, दिल्ली में 2 दिन का राजकीय शोक
शीला दीक्षित का अंतिम संस्कार आज, दिल्ली में 2 दिन का राजकीय शोक
आउटलुक टीम

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं और गांधी परिवार के करीबियों में शुमार शीला दीक्षित का अंतिम संस्कार नई दिल्ली के नगम बोध घाट पर रविवार को कर दिया गया। प्रमुख नेताओं सहित बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। शनिवार को एस्कॉर्ट अस्पताल में उनका निधन हो गया था। वह 81 साल की थीं। उससे पहले उनके पार्थिव शरीर कों निजामुद्दीन स्थित आवास पर आज सुबह 11.30 बजे तक अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था। इसके बाद दोपहर 12 बजे उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय लाया गया, जहां उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। दिल्ली सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के निधन पर दो दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है।

शनिवार को दोपहर 3.55 बजे ली अंतिम सांस

शीला 81 साल की थीं। वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं और उन्हें शुक्रवार की सुबह सीने में जकड़न की शिकायत के बाद फोर्टिस-एस्कॉर्ट्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां शनिवार दोपहर बाद तीन बजकर 55 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली।

पीएम मोदी समेत इन नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, दिल्ली के डेप्युटी सीएम मनीष सिसोदिया, यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी समेत कई दिग्गज नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

शीला दीक्षित का राजनीतिक सफर

15 साल तक दिल्ली की सत्ता संभालने वाले शीला दीक्षित इससे पहले 1984 से 89 तक वे कन्नौज (उत्तर प्रदेश) से सांसद रहीं। इस दौरान वे लोकसभा की समितियों में रहने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र में महिलाओं के आयोग में भारत की प्रतिनिधि रहीं। वह राजीव गांधी सरकार में केन्द्रीय मंत्री भी थीं। शीला दीक्षित 1998 से 2013 तक लगातार 15 साल दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। हालांकि, 2013 में आम आदमी पार्टी के आगमन शीला दीक्षित की सरकार को जाना पड़ा। हालांकि, माना जाता है कि शीला दीक्षित की हार में एंटी इनकंबेंसी भी हावी रहा। इसके बाद वह 2014 में केरल की राज्यपाल भी रहीं। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष का पद सौंपा गया। उन्होंने उत्तर-पूर्वी दिल्ली से भाजपा सांसद मनोज तिवारी के खिलाफ चुनाव लड़ा लेकिन शीला दीक्षित को हार का सामना करना पड़ा।

शीला दीक्षित की पढ़ाई

शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च, 1938 को पंजाब के कपूरथला में हुआ। शीला दीक्षित ने दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस से इतिहास में मास्टर डिग्री हासिल की। उनका विवाह उन्नाव (यूपी) के आईएएस अधिकारी स्वर्गीय विनोद दीक्षित से हुआ। विनोद कांग्रेस के बड़े नेता और बंगाल के पूर्व राज्यपाल स्वर्गीय उमाशंकर दीक्षित के बेटे थे। शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित भी दिल्ली के सांसद हैं।

दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री

शीला दीक्षित अपनी काम की बदौलत कांग्रेस पार्टी में पैठ बनाती चली गईं। सोनिया गांधी के सामने भी शीला दीक्षित की एक अच्छी छवि बनी और यही वजह है कि राजीव गांधी के बाद सोनिया गांधी ने उन्हें खासा महत्व दिया। साल 1998 में शीला दीक्षित दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष बनाई गईं। 1998 में ही लोकसभा चुनाव में शीला दीक्षित कांग्रेस के टिकट पर पूर्वी दिल्ली से चुनाव लड़ीं, मगर जीत नहीं पाईं। उसके बाद उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ना छोड़ दिया और दिल्ली की गद्दी की ओर देखना शुरू कर दिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्होंने न सिर्फ जीत दर्ज की, बल्कि तीन-तीन बार मुख्यमंत्री भी रहीं। दिल्ली के कायाकल्प में उनका बड़ा योगदान माना जाता है। दिल्ली में मेट्रो के नेटवर्क का विस्तार हो या फिर बारापुला जैसे बड़े रोड नेटवर्क उन्हीं की देन माने जाते हैं। हालांकि दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान उनके शासनकाल में ही कांग्रेस पर घोटालों को आरोप लगे।

मनोज तिवारी के खिलाफ हार का सामना

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले शीला दीक्षित को एक बार फिर राज्य की मुख्यधारा की राजनीति में लाया गया। अजय माकन की जगह उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। कांग्रेस ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली से शीला दीक्षित को उम्मीदवार बनाया लेकिन उन्हें भाजपा सांसद मनोज तिवारी के सामने हार का सामना करना पड़ा।

आखिरी समय में राज्य के नेतृत्व में खींचतान

शीला दीक्षित के निधन से कुछ दिनों पहले कांग्रेस के राज्य नेतृत्व में खींचतान की खबरें भी आईं। उन्होंने दिल्ली प्रदेश कांग्रेस संगठन में कई बदलाव किए थे। उन्होंने अपने तीन कार्यकारी अध्यक्षों के बीच पार्टी के काम की जिम्मेदारी बांटी थी। इसे शीला दीक्षित के खराब स्वास्थ्य से जोड़कर भी देखा जा रहा था।

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