Home देश सामान्य सरदार उधम सिंह, जिन्होंने जनरल डायर की करतूत का बदला माइकल ओ'ड्वायर से लिया

सरदार उधम सिंह, जिन्होंने जनरल डायर की करतूत का बदला माइकल ओ'ड्वायर से लिया

आउटलुक टीम - APR 13 , 2019
सरदार उधम सिंह, जिन्होंने जनरल डायर की करतूत का बदला माइकल ओ'ड्वायर से लिया
सरदार उधम सिंह
File Photo
आउटलुक टीम

आज 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग हत्याकांड की 100वीं बरसी है। आज से सौ साल पहले बैसाखी के दिन तत्‍कालीन ब्रिटिश शासन के ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर ने अंधाधुंध गोलियां बरसाकर हजारों मासूम की जान ले ली। शाम करीब 5.30 बजे का वक्‍त रहा होगा, जब जनरल डायर अपनी सेना के साथ वहां पहुंचा। इसके बाद वहां एकमात्र निकास द्वार को बंद कर दिया और जनरल डायर ने अपने लोगों को फायरिंग का आदेश दिया। जनरल डायर के आदेश पर चली हुई गोलीबारी में हजारों लोगों ने अपनों को खोया, जो जिंदा रह गए, उनके दिलो-दिमाग पर इसका ऐसा गहरा घाव पड़ा कि वे इससे ताउम्र उबर नहीं पाए।

उस दिन जलियांवाला बाग में 20 साल का एक नौजवान भी मौजूद था। नाम था उधम सिंह। 5 साल की उम्र में अपना माता-पिता को खो चुके इस युवा के मन पर इस घटना ने गहरे जख्‍म छोड़े और उन्‍होंने अंतत: इसके लिए जिम्‍मेदार लोगों से प्रतिशोध लेने की ठानी।

इस नरसंहार को देखने के बाद वह अमेरिका चले गए, जहां वह गदर पार्टी से जुड़े। वह ब्रिटिश शासन से मुकाबले के लिए विदेश में रह रहे भारतीयों को एकजुट कर रहे थे कि इसी बीच 1927 में भगत सिंह ने उन्‍हें भारत बुला लिया।

जनरल आर डायर की करतूत का बदला माइकल ओड्वायर से

उधम सिंह अपने कुछ साथियों और हथियारों के साथ भारत लौटे। हालांकि उन्‍हें बिना लाइसेंस के हथियार रखने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया और पांच साल की कैद भी हुई। वह 1931 में रिहा हुए। इस बीच, जनरल डायर की भी मौत हो गई। जिस साल वह रिहा हुए, उसी साल भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को भी ब्रिटिश शासन ने फांसी दे दी थी। परिस्थितियां प्रतिकूल थीं, पर बदले की आग उनमें अब भी धधक रही थी। जनरल डायर ने 1919 में जब‍ इस नरसंहार का आदेश दिया था उस वक्‍त माइकल ओ'ड्वायर पंजाब के गवर्नर थे। उधम सिंह पंजाब के गवर्नर को भी पूरे वाकये के लिए दोषी मानते थे। सोशल मीडिया पर चलता है कि उधम सिंह ने गोली चलाने का आदेश देने वाले जनरल डायर को मारा था जबकि यह सच्चाई नहीं है। लोग अक्सर डायर और ड्वायर के नाम को लेकर कन्फ्यूज हो जाते हैं।

साल 1940, प्रतिशोध और फांसी

साल 1931 में जेल से रिहा होने के बाद उन पर कड़ी नजर रखी जा रही थी, लेकिन इसी बीच वह किसी तरह कश्‍मीर भागने में सफल रहे, जहां से वह पहले जर्मनी और फिर 1934 में लंदन पहुंचे। वह 13 मार्च, 1940 की तारीख थी, जब माइकल ओ'डायर लंदन के कैक्‍सटन हॉल में ईस्‍ट इंडिया एसोसिएशन और सेंट्रल एशियन सोसाइटी के एक कार्यक्रम में बोलने वाले थे। उधम सिंह वहां अपनी जैकेट की जेब में रिवॉल्‍वर लेकर पहुंचने में कामयाब रहे थे। उन्‍होंने तुरंत रिवॉल्‍वर निकाली और ओ'डायर पर तीन गोलियां दाग दीं। इसके बाद उधम सिंह वहां से भागे नहीं, बल्कि मुस्‍कराते हुए पुलिस के साथ चले गए। 31 जुलाई, 1940 को उन्‍हें लंदन की पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई और वहीं दफन कर दिया गया। बाद में 1947 में देश के आजाद होने के करीब ढाई दशक बाद 1974 में उनकी अस्थियां यहां लाई गईं, जिसका अंतिम संस्‍कार पंजाब के सुनाम में उनके जन्‍मस्‍थान पर किया गया।

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