Home देश सामान्य गांधी की हत्या का समाचार कवर करने वाले पूर्व पीटीआई पत्रकार ने कहा, उस दिन नहीं था भावनाओं के लिए समय

गांधी की हत्या का समाचार कवर करने वाले पूर्व पीटीआई पत्रकार ने कहा, उस दिन नहीं था भावनाओं के लिए समय

आउटलुक टीम - OCT 02 , 2019
गांधी की हत्या का समाचार कवर करने वाले पूर्व पीटीआई पत्रकार ने कहा, उस दिन नहीं था भावनाओं के लिए समय
गांधी की हत्या का समाचार कवर करने वाली पूर्व पीटीआई पत्रकार ने कहा, नहीं था भावनाओं के लिए कोई समय
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हाल में 99 साल के हुए वाल्टर अल्फ्रेड उस समय नागपुर स्थित पीटीआई में पत्रकार थे, जब 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी को नाथूराम गोडसे ने गोली मार दी थी। तब उन्होंने इस घटना को कवर किया था। इसकी याद ताजा करते हुए पत्रकार अल्फ्रेड ने कहा, आज के फास्ट टेक्नोलॉजी के युग में समाचार सेकेंड में तेजी से फैल जाता है लेकिन उस समय यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि महात्मा गांधी हत्या की खबर घटना के एक घंटे बाद भी संसाधन से युक्त दूरदराज के पत्रकारों को मिल पाई होगी। उस दिन भावना के लिए बहुत कम समय था।

अल्फ्रेड ने उस दिन को याद करते हुए बताया कि कैसे उन दिनों खबरें कवर की जाती थी और मौके पर जाने के संसाधन क्या थे। इस समय मुंबई की मीर रोड पर रह रहे अल्फ्रेड ने कहा कि 30 जनवरी 1948 का दिन एक तरह खाली दिन की तरह था और शाम तक कुछ ही समाचार दिए होंगे। दफ्तर से शाम साढे छह से सात बजे के बीच फोन पर मुझे गांधी की हत्या के बारे में पता चला। 

मुंबई का एक सहयोगी दूसरे छोर पर था, जिसने उसे नई दिल्ली के बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी पर हुए जानलेवा हमले के बारे में शाम 5.17 बजे सूचित किया। उस समय मैं शाम की प्रार्थना करने के लिए अपने घर के रास्ते पर था। 21 सितंबर, 1920 को मैंगलोर में पैदा हुए अल्फ्रेड ने कहा कि उस सहयोगी का नाम उन्हें केवल पोंकशे के रूप में याद हैं।

'तब टेलीग्राफ से भेजी जाती थीं खबरें'

उन्होंने कहा कि ये वो दिन थे जब उस समय की टेलेक्स और टेलेटाइपराइटर मशीनें अत्याधुनिक तकनीक थीं और इन्हें टेलीग्राफ लाइनों पर लिखित सामग्री को प्रसारित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।  300 शब्द की स्टोरी को स्वचालित रूप से टाइप करने और मशीन पर प्रदर्शित होने में कुछ मिनट लगते, लेकिन उस समय नागपुर दफ्तर में ये भी उपलब्ध नहीं थे। नागपुर में नवनिर्मित पीटीआई का कार्यालय अभी स्थापित किया जा रहा था और नई तकनीक अभी तक पेश नहीं की गई थी।

'पोंकशे से मिली थी खबर की जानकारी'

मुंबई, जो तब बॉम्बे के नाम से जाना जाता था, नई दिल्ली के अलावा पीटीआई का दूसरा बड़ा केंद्र था। उन दिनों, टेलीग्राम द्वारा मुख्यालय से छोटे पीटीआई कार्यालयों में गैर-जरूरी खबरें भेजी जाती थीं। टेलीग्राम को तब स्थानीय पीटीआई के पत्रकारों द्वारा हाथ लिखा लिया जाता था और समाचार एजेंसी के स्थानीय समाचार पत्रों के सदस्यों को मैसेंजर द्वारा प्रतियां वितरित की जाती थीं। पोंकशे,  मुंबई में उप-संपादक थे, उनको मुख्य संवाददाता ने फोन पर नागपुर बुलाया और गांधी की मौत की तत्काल खबर देने के लिए निर्देशित किया।

'उस दिन मेरे लिए परीक्षा का दिन था'

अल्फ्रेड ने कहा, बिना समय गंवारा पोंकशे द्वारा बताई ब्रीफिंग के आधार शुरुआती टाइप शुरु कर दी। दफ्तर में दो चपरासी थे जो एक अंग्रेजी दैनिक समेत छह स्थानीय ग्राहकों को प्रतियां देने गए क्योंकि तबर टेलीप्रिंटर नहीं था। अल्फ्रेड ने कहा, 'यह मेरी सटीकता का टेस्ट था क्योंकि मुझे गांधीजी की हत्या के बारे में हर कॉल का जवाब देना था, अपडेट नोट करना था, छह ग्राहकों के लिए इसकी एक प्रति बनाना और इसे वितरित करने के लिए हर दो घंटे में चपरासी भेजना था।'

पत्रकार ने कहा, उस दिन भावना के लिए बहुत कम समय था। जहां तक उसे याद है, 1938 या 39 में 18 साल की उम्र में  ब्रिटिश समाचार एजेंसी रायटर को ज्वाइन किर किया था। रायटर ने भारत के एसोसिएटेड प्रेस को चलाया जो आजादी के बाद अगस्त 1947 में प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया बन गया। नाथूराम गोडसे की गिरफ्तारी का ब्यौरा और उसका आरएसएस से कनेक्शन के बारे में अल्फ्रेड ने कहा, मेरे पास  ऐसी यादों के लिए समय नहीं था। मैं केवल टेलीफोनिक ब्रीफिंग को नोट करने और उसकी एक प्रति बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा था, जिसमें गिरफ्तारी का विवरण भी शामिल था।"

'आरआरएस मुख्यालय पर कुछ लोग खुश दिखे'

अगले दिन, अल्फ्रेड नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय गए। उन्होंने कहा कि उन्होंने कई लोगों को बाहर खुले में रोते हुए देखा। लेकिन वह "यह जानकर हैरान था कि कुछ लोग खुश दिखाई दिए"।

उन्होंने कहा, "वे अपनी भावनाओं को छिपा नहीं सकते थे, उन्हें गांधी और नेहरू पसंद नहीं थे लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि वे इस तरह से प्रतिक्रिया देंगे।" अल्फ्रेड को गांधी द्वारा संबोधित बैठकों में भी याद करते हैं, जिसमें मुंबई में गोवालिया टैंक भी शामिल है, जहां उन्होंने अगस्त 1942 में अंग्रेजों को भारत छोड़ो का नारा दिया था। उनकी कहानियों के लिए अस्थायी डेस्क पर 12 रिपोर्टर और उपसपांदक लगाए गए थे। उस समय संवाददाताओं की आमतौर पर बाइलाइन नहीं होती थी।

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