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मुसलमानों, महिलाओं और ट्रांसजेंडर को लेकर पुलिस का पूर्वाग्रह, जर्जर इन्फ्रास्ट्रक्चर

निशांत सिंह - AUG 28 , 2019
मुसलमानों, महिलाओं और ट्रांसजेंडर को लेकर पुलिस का पूर्वाग्रह, जर्जर इन्फ्रास्ट्रक्चर
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फोटो साभार- CSDS
निशांत सिंह

फिल्म ‘आर्टिकल 15’ में पुलिसवाला किशन जाटव आईपीएस अधिकारी अयान रंजन से कहता है, ‘हम आप इनके लिए कुछ भी करें ना सर, इन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता।‘

अयान रंजन तैश में आकर पूछता है, ‘कौन हैं ये लोग? जुपिटर से आये हैं?’

'कौन हैं ये लोग?'

इस सवाल की व्याख्या फिल्म में जाति के संदर्भ में की गई है लेकिन ‘इन लोगों’ में ऐसे बहुत से लोग शामिल हैं जिनकी सिर्फ जाति ही नहीं धर्म और जेंडर को लेकर भी पुलिस में पूर्वाग्रह हैं। एनजीओ कॉमन कॉज और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी (सीएसडीएस) के लोकनीति कार्यक्रम द्वारा तैयार की गयी ‘स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट 2019’ में यह बात सामने आयी है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जे चेलमेश्वर ने यह रिपोर्ट जारी की है, जिसे 21 राज्यों के 12,000 पुलिसवालों और उनके परिवार के 10,595 सदस्यों से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 50 फीसदी पुलिसवालों का मानना है कि मुसलमानों का अपराध की तरफ स्वाभाविक झुकाव होता है। इसके अलावा रिपोर्ट में लैंगिक विषयों और पुलिस इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भी पुलिसवालों की राय बतायी गयी है। रिपोर्ट से पुलिस विभाग के भीतर महिलाओं और ट्रांसजेंडर्स को लेकर 'पुरुष' पुलिसकर्मियों के पूर्वाग्रह, अपराध से निपटने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर की जर्जर हालत, आधुनिक तकनीकों की कमी के बारे में पता चलता है। 

जाति-धर्म व अन्य स्थितियों को लेकर पुलिस का पूर्वाग्रह

1. रिपोर्ट बताती है कि 14 फीसदी पुलिसवालों का मानना है कि अपराध करने की प्रवृत्ति मुसलमानों में ‘अधिक’ होती है जबकि 36 फीसदी मानते हैं कि ‘कुछ हद तक’ उनकी ऐसी प्रवृत्ति होती है। यानी 50 फीसदी पुलिसवाले मानते हैं कि मुसलमानों की आपराधिक प्रवृत्ति होती है। चार राज्यों महाराष्ट्र, उत्तराखंड, झारखंड, बिहार में ऐसा मानने वाले पुलिसवालों की संख्या दो तिहाई से ज्यादा है।

2. 35 फीसदी पुलिसवाले मानते हैं कि गोकशी के मामले में भीड़ द्वारा अपराधियों को सजा देना स्वाभाविक है।

3. तीन में से एक पुलिसवाले का मानना है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ पुलिस फोर्स के भीतर भेदभाव होता है। ऐसा मानने वाले सिख समुदाय के पुलिसवाले ज्यादा हैं।

4. जाति के मामले में, पांच में से एक पुलिसवाले का मानना है कि दलितों/आदिवासियों द्वारा दर्ज कराई जाने वाली शिकायतें झूठी होती हैं। इन पुलिसवालों में अधिकतर ‘उच्च’ जाति वाले हैं।

5. कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में ऐसे पुलिसवालों का औसत ज्यादा है जो मानते हैं कि दलितों में अपराध की प्रवृत्ति ज्यादा होती है।

6. 24 फीसदी पुलिसवाले मानते हैं कि शरणार्थी अपराध की तरफ अधिक बढ़ते है।

7. पांच में से दो पुलिसवालों का मानना है कि अपराध के मामले में 16 से 18 साल के नाबालिगों को बालिग की तरह ट्रीट किया जाना चाहिए।

मानवाधिकार, जातीय मुद्दे और भीड़ नियंत्रण की ट्रेनिंग

रिपोर्ट का कहना है कि इनमें से ज्यादातर पुलिसवालों को मानवाधिकार और जातीय विषयों से ज्यादा भीड़ नियंत्रण की ट्रेनिंग मिली हुई थी। बड़ी संख्या में इन पुलिसवालों को जॉइनिंग के समय ट्रेनिंग मिली।

राज्यों की बात करें तो बिहार में ऐसे पुलिसवालों की संख्या सबसे ज्यादा है जिन्हें मानवाधिकार की कभी ट्रेनिंग नहीं मिली। बिहार, असम, गुजरात, उत्तर प्रदेश, नगालैंड, छत्तीसगढ़ में पांच में से एक पुलिसवाले को इसकी ट्रेनिंग नहीं मिली।

पुरुष पुलिसकर्मी महिलाओं को मानते हैं कमतर

1. रिपोर्ट कहती है कि पुलिस विभाग में महिला पुलिसकर्मियों को अधिकतर पुलिस स्टेशन के भीतर के काम दिए जाते हैं। जैसे- रजिस्टर और डेटा मेंटेन करना जबकि पुरुष अधिकतर फील्ड के काम जैसे पैट्रोलिंग, जांच, लॉ एंड ऑर्डर संभालने का काम करते हैं।

2. पचास फीसदी से ज्यादा महिला पुलिसकर्मियों का मानना था कि पुलिस विभाग के भीतर महिला और पुरुष में भेदभाव होता है। यह भेदभाव ऊंची पोस्ट पर बैठी महिला के साथ भी होता है।

3. बिहार, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल में महिलाओं को लेकर पुलिस फोर्स में पूर्वाग्रह अधिक हैं। इन राज्यों में 'पुरुष' पुलिसकर्मियों का मानना था कि महिलाओं के पास कम क्षमता होती है। उन्हें घर के कामों पर ध्यान देना चाहिए।

4. पांच में से एक महिला पुलिसकर्मी ने माना कि पुलिस स्टेशन में उनके लिए अलग टॉयलेट नहीं हैं।

5. चार में से एक महिला का कहना था कि यौन शोषण से जुड़े मामलों के लिए उनके कार्यस्थल पर कोई समिति नहीं है।

6. पांच में से एक पुलिसकर्मी का मानना है कि घरेलू हिंसा की शिकायतें झूठी होती हैं और किसी अन्य उद्देश्य से प्रेरित होती हैं।

7. आठ फीसदी पुलिसकर्मियों का कहना था कि ट्रांसजेंडरों में अपराध की प्रवृत्ति अधिक होती है।

पुलिस इन्फ्रास्ट्रक्चर की जर्जर हालत

बुधवार को गृह मंत्री अमित शाह ने पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ब्यूरो (बीपीआरडी) के स्थापना दिवस कार्यक्रम में पुलिस रिफॉर्म की बातें कीं। उन्होंने कहा, 'राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस यूनिवर्सिटी और फॉरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी बनाई जाएगी। हर राज्य में इससे जुड़े कॉलेज होंगे। जल्द ही इसके ड्राफ्ट को कैबिनेट के सामने रखा जाएगा।' शाह ने कहा, 'अब थर्ड डिग्री का जमाना नहीं है। पुलिस को वैज्ञानिक तरीके से जांच करने की जरूरत है। अपराध और आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोगों से पुलिस को हमेशा चार कदम आगे रहना चाहिए।'

सीएसडीएस की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिसवालों ने खुद माना कि उन्हें मिलने वाली सुविधाओं की स्थिति बुरी है।

1. रिपोर्ट के मुताबिक, 46 फीसदी पुलिसवालों ने कहा कि उन्हें जब सरकारी वाहन की जरूरत थी तब वाहन मौजूद नहीं था। 41 फीसदी मानते हैं कि वे क्राइम सीन पर इसलिए नहीं पहुंच सके क्योंकि उनके पास स्टाफ नहीं था।

2. 42 फीसदी पुलिसवालों के मुताबिक, पुलिस स्टेशन पर फोरेंसिक टेक्नोलॉजी से जुड़ी सुविधाएं नहीं थीं। तीन में से एक पुलिसवाले को फोरेंसिक की कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई।

3. 17 फीसदी ने कहा कि उनके पुलिस स्टेशन पर क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग सिस्टम (CCTNS) मौजूद नहीं है।

4. पश्चिम बंगाल में 30 फीसदी और असम में 28 फीसदी पुलिसवालों ने कहा कि फंक्शनल कंप्यूटर उनके पुलिस स्टेशन में कभी नहीं रहा।

देश में पुलिस रिफॉर्म की बातें होती रहती हैं। इसके लिए पद्मनाभय कमेटी से लेकर मलीमथ कमेटी की सिफारिशें हैं। प्रकाश सिंह वर्सेज भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस रिफॉर्म की सुस्त गति पर चिंता भी जतायी थी। इन सुधारों में ज्यादातर इनफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने पर जोर है लेकिन ऊपर के आंकड़ों से जाहिर है कि पुलिस की विचार प्रक्रिया में भी सुधार की जरूरत है। आखिर पुलिस स्टेट के अलावा इसी सामाजिक संरचना का भी हिस्सा है और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसका असर उसकी कार्यशैली में भी दिखता है।

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