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अकेली मां भूख से मर गई, बेटा अमेरिका में !!

AUG 07 , 2017
महिला का नाम आशा साहनी था। उनका बेटा ऋतुराज अमेरिका में सॉफ्टवेर इंजीनियर था और वहीं रहता था। 2013 में आशा साहनी के पति और ऋतुराज के पिता केदार साहनी की मौत हो गई थी।

बुढ़ापे में अकेलापन अक्सर हावी हो जाता है। तब इसे ढोना और भी मुश्किल होता है जब आस-पास वे लोग ना हों, जिन्हें उस वक्त साथ होना चाहिए। तेजी से भागते शहरों में ऐसी कहानियां आपको मिल जाएंगी। लेकिन मुंबई का एक मामला सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

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रविवार का दिन। मुंबई का लोखंडवाला इलाका। अंधेरी की वेल्स कॉट सोसायटी की दसवीं मंजिल। अमेरिका से लौटा ऋतुराज साहनी फ्लैट पर दरवाजे की घंटी बजाता है। दरवाजा नहीं खुलता तो एक डुप्लीकेट चाभी बनाने वाले की मदद लेता है। अंदर जाकर देखता है तो बेड पर उसे एक कंकाल पड़ा मिलता है। यह कंकाल उसकी मां का था। उसकी 63 साल की बूढ़ी मां का। ऋतुराज ने पुलिस को खबर दी।

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, शुरूआती जांच के हिसाब से पुलिस को शक है कि महिला की मौत भूख और कमजोरी की वजह से हुई है। कंकाल का पंचनामा कर पुलिस ने उसे गोरेगांव स्थित एक अस्पताल भेज दिया। सीनियर इंस्पेक्टर, सुभाष खानविलकर ने बताया कि उनका बेटा 1997 में अमेरिका चला गया था। खानविलकर के मुताबिक़ आस-पड़ोस के किसी शख्स को उनके शरीर की दुर्गन्ध नहीं आई। हालांकि उनकी मौत कब हुई इसका अंदाजा पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही लग पाएगा लेकिन जाहिर है अगर शरीर कंकाल में बदल गया तो उनकी मौत काफी पहले हो चुकी थी।

अकेलापन और बुढ़ापा

महिला का नाम आशा साहनी था। उनका बेटा ऋतुराज अमेरिका में सॉफ्टवेर इंजीनियर था और वहीं रहता था। 2013 में आशा साहनी के पति और ऋतुराज के पिता केदार साहनी की मौत हो गई थी। पति की मौत के बाद आशा साहनी अकेली इस अपार्टमेन्ट में रहती थीं। इस अकेलेपन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके ‘इंजीनियर’ और ‘एनआरआई’ बेटे ने उनसे आखिरी बार एक साल पहले अप्रैल 2016 में बात की थी। पुलिस के मुताबिक़, आशा साहनी ने उससे फोन पर कहा था कि वे अकेले यहां नहीं रहना चाहतीं और वह वृद्धाश्रम चली जाएंगी जबकि महिला के नाम वेल्स कॉट सोसायटी में दो फ्लैट थे, जिनकी कीमत 5 से 6 करोड़ रुपये के आस-पास है।

समाज के तौर पर विडंबनाएं

यहां पर इन बड़ी-बड़ी सोसायटी की विडंबनाएं भी दिखती हैं। लोग एक दूसरे से इतने कटे हुए हैं और खुद में ही परेशान हैं कि दूसरे की सुध लेने की किसी को फुरसत नहीं। पता नहीं लोग इन बिल्डिंग को सोसायटी क्यों कहते हैं। कई जगहों पर देखा गया है कि समाज कुछ मामलों में मदद भी करते हैं। फिर दूसरों का जाने भी दें तो अमेरिका में इंजीनियर उनके लड़के को इतनी फुरसत ना मिली कि आखिरी बार उसने मां से एक साल पहले बातचीत की थी।


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