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इंटरव्यू । लोक कल्याणकारी बॉलीवुड थोड़े ही है: पंकज त्रिपाठी

गिरिधर झा - OCT 22 , 2020
इंटरव्यू । लोक कल्याणकारी बॉलीवुड थोड़े ही है: पंकज त्रिपाठी
पंकज त्रिपाठी
गिरिधर झा

आज पंकज त्रिपाठी की गणना उन चंद अभिनेताओं में होती है, जिन्हें अपनी प्रतिभा के बल पर प्रसिद्धि मिली। लेकिन उन्हें यह मुकाम एक दशक से अधिक के कड़े संघर्ष के बाद हासिल हुआ। ‘कालीन भैया’ के किरदार के रूप में उन्होंने अमेजन प्राइम वीडियो के वेब शो मिर्जापुर में खूब वाहवाही लूटी। इस वेब सीरीज का दूसरा सीजन 23 अक्टूबर से शुरू हो रहा है। गिरिधर झा से उन्होंने इस वेब सीरीज सहित फिल्मों में अपने दिलचस्प सफर के अनुभवों को बेबाकी से साझा किया। उसके संपादित अंश:

मिर्जापुर का दूसरा सीजन शुरू हो रहा है, किरदार कालीन भैया को काफी पसंद किया गया है। अभिनेता के रूप में कैसा लग रहा है?

अच्छा लग रहा है, इसलिए कि आज इंटरनेट और ओटीटी के दौर में हर हफ्ते, हर महीने जब इतनी कहानियां आ रही हैं, वहां लोग इसके लिए एक साल से इंतजार कर रहे हैं। यह हमारी उपलब्धि है। मिर्जापुर में कुछ तो बात होगी कि लोग अभी तक इतनी बातें कर रहे हैं। सीजन 2 के लिए लेखकों की टीम से लेकर सबने बहुत मेहनत की है। उम्मीद है यह लोगों को पसंद आएगा।

मिर्जापुर की सफलता के क्या कारण थे?

कहानी, किरदार, मनोरंजक पक्ष, सब सफलता का कारण बना। इसके किरदार विचित्र और बहुरंगी हैं। कहानी भी लोगों को दिलचस्प लगी। निजी तौर पर मुझे एक्शन वाली अपराध जगत की कहानियां पसंद नहीं, लेकिन क्राइम ड्रामा दर्शकों को खूब भाता है। ऐसी दुनिया जो सतह पर दिखती नहीं है पर होती है। मैं जहां जाता हूं, लोग मुझे कालीन भैया पुकारते हैं। पता नहीं था यह किरदार इतना लोकप्रिय हो जाएगा। 

बिहार या पूर्वांचल का इलाका, जहां से आप आते हैं, वहां राजनीति और अपराध का गठजोड़ पुराना रहा है। कालीन भैया का किरदार निभाने में पहले का कोई अनुभव काम आया?

यह इस मामले में आसान था कि मैं पूर्वांचल की जमीन को जानता हूं। उधर के बाहुबलियों के बारे में पढ़ता-सुनता आया हूं। व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए कालीन भैया का किरदार निभाना आसान था क्योंकि असल जिंदगी में मैंने ऐसे लोग देखे हैं। हालांकि एक अभिनेता का अपना क्राफ्ट, अपनी कल्पनाशक्ति होती है, जिसका उपयोग वह किसी पात्र को निभाने के लिए करता है। मैंने सोचा कि कालीन भैया को सॉफ्ट बनाते हैं। वह ऊंची आवाज में कभी नहीं बोलता। अगर आप उसके पेशे से वाकिफ नहीं हैं, तो वह बाहुबली नहीं, विनम्र और प्रगतिशील व्यक्ति लगेगा। वह अपने अंदर के पितृसत्तात्मक और बाहुबली छवि को छुपा कर रखता है और अच्छे रूप को दिखाता है।  

आम तौर पर फिल्म करने के बाद अभिनेता अपने किरदार को भूल जाते हैं, लेकिन वेब शो में साल-दो साल के अंतराल पर फिर उसी किरदार को जीना कितना मुश्किल है? 

मिर्जापुर-2 की शूटिंग की शुरुआत में एक वाकया हुआ। डेढ़ साल बाद जब मैंने शूटिंग शुरू की, तो एक दृश्य के फिल्माने के दौरान निर्देशक मेरे पास आए और कहा, “पंकज जी, आप कालीन भैया में ऐसा करते थे।” उन्होंने मुझे वहीं लैपटॉप पर एक दृश्य दिखाया। उसे देखकर मुझे समझ आ गया कि मैं ठीक नहीं कर रहा हूं। इसके बाद कोई दिक्कत नहीं हुई। फिल्म या वेब सीरीज के किसी दूसरे किरदारों के मुकाबले मैं इस किरदार से ज्यादा परिचित हूं।            

डिजिटल प्लेटफार्म कि बढ़ती लोकप्रियता देखकर नए कंटेंट की बाढ़-सी आ गई है लेकिन गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं? अच्छे डिजिटल कंटेंट कैसे आश्वस्त किए जाएं?   

दर्शक बहुत जागरूक हैं। वे खराब कंटेंट को तवज्जो नहीं देंगे। ओटीटी पर आपको अकाउंट बनाना पड़ता है और इसका मेंबर बनना पड़ता है। हां, मैं इस बात से सहमत हूं कि कई लोग खुली छूट होने से सनसनी पैदा करने के लिए कुछ भी बना देंगे। लेकिन बतौर जिम्मेदार अभिनेता, मैं खुद पर सेंसर रखता हूं। मैं देखता हूं कि मैं कोई सीन क्यों कर रहा हूं या इसकी कहानी में कितनी जरूरत है। अपने थिएटर के दिनों में, पटना के कालिदास रंगालय में किसी भी नाटक की शुरुआत में हम कहते थे, “आप सुधी दर्शकों का स्वागत है।” सुधी कहने का अर्थ है, दर्शक जागरूक और विद्वान हैं। आज, डिजिटल प्लेटफार्म के दर्शक तेज हैं और हर दृश्य के पीछे की मंशा समझते हैं। हम इस बात का निर्णय वैसे सुधी दर्शकों पर छोड़ते हैं।

आम तौर पर जब किसी वेब शो का पहला सीजन बहुत पसंद किया जाता है, तो दूसरे सीजन से अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं और इससे जुड़े लोग दवाब में आ जाते हैं। आपके साथ ऐसा हुआ? 

निर्माता-निर्देशक या लेखक को यह दवाब हो सकता है, बतौर अभिनेता ऐसा दवाब महसूस नहीं करता। मेरा मानना है, जब मैं शूटिंग पर जाता हूं तो वह उस दिन की सच्चाई है। उस दिन मैं अपना काम पूरी काबिलियत और मेहनत से करता हूं। जहां तक मिर्जापुर सीजन 2 के लेखन का सवाल है, मुझे पहले सीजन की तुलना में यह ज्यादा गहरा और कंप्लेक्स दिखता है, जो एक नई जमीन को खोज रहा है। मुझे विश्वास है, जैसे यह मुझे पसंद आया है, वैसे ही दर्शकों को भी पसंद आएगा। आम तौर पर मैं अपनी किसी फिल्म या वेब सीरीज के व्यावसायिक पहलुओं को लेकर दवाब नहीं लेता। बतौर अभिनेता, मैं ईमानदारी से अपना काम कर निकल जाता हूं।  

वेब सीरीज में स्टार के मुकाबले एक्टर को ज्यादा तरजीह दी जाती है, लेकिन फिल्मों में अभी भी 100-200 करोड़ की व्यावसायिक फिल्मों का बोलबाला है। लॉकडाउन के बाद बॉलीवुड में स्टार सिस्टम खत्म हो पाएगा?

मैं समाजशास्त्र या मनोविज्ञान नहीं जानता। लेकिन अभिनेता के रूप में मैं सिर्फ उम्मीद कर सकता हूं कि दर्शक सुधी हों। यह ऐसा सवाल है, जिस पर हर किसी की राय अलग हो सकती है। कोई कहानी किसी को अच्छी लगती है, किसी को नहीं। कभी-कभी औसत फिल्म करोड़ों का व्यवसाय कर लेती है। आश्चर्य होता है, इतने लोगों ने इसे कैसे देखा? लेकिन, हो सकता है, जो मुझे औसत लगी, वह बाकियों को बहुत अच्छी लगी हो। या हो सकता है, लोग मार्केटिंग के पैंतरे से प्रभावित होकर देखने गए हों। जैसे पढ़ने के बाद कोई किताब प्रभावित नहीं करती, लेकिन बेस्ट-सेलर हो जाती है। हर व्यक्ति की अपनी पसंद होती है। उसका सम्मान होना चाहिए। मैं इसे इस तरह देखता हूं, पांच-दस साल पहले जिस स्टार को लेकर जैसी फिल्में बनती थीं, उसी स्टार को लेकर वैसी फिल्में अब नहीं बनतीं। वहां भी बदलाव दिख रहा है। अब सुपरस्टारों की फिल्मों में भी लोग कहानी ढूंढते हैं।                     

स्टार से सफलता के बाद मिली नाकामी के बारे में पूछा जाता है कि वह उससे कैसे उबरा। लेकिन, आपको सफलता वर्षों के संघर्ष के बाद मिली। आपने इसे कैसे हैंडल किया?   

किताबें पढ़ता हूं। आज भी बिहार में अपने पुश्तैनी गांव बेलसंड से जुड़ा रहता हूं। अभी लॉकडाउन के दौरान मैंने सत्य व्यास, नीलोत्पल मृणाल, दिव्य प्रकाश दुबे, प्रवीण कुमार, अनुराग ठाकुर जैसे युवा लेखकों की पुस्तकें मंगाकर पढ़ी। जिनके साथ थिएटर किया है, उनसे बात करता रहता हूं। लोगों से मिलकर उनके अनुभव सुनता हूं। मिर्जापुर की शूटिंग के दौरान मैंने कुलभूषण (खरबंदा) जी से अपने समय की कहानियां सुनाने को कहा। लोग पूछते हैं, बारह साल के संघर्ष के बाद भी मेरे पैर जमीन पर कैसे टिके हैं? मैं कहता हूं, उस दौर को मैं संघर्ष नहीं मानता। उस अवधि को मैं अपनी कला, अपनी विधा चमकाने के समय की तरह देखता हूं। आज मैं बहुत सारे प्लेटफार्म पर दिखता हूं और लोग मुझसे प्रेम करते हैं। लेकिन जब यह नहीं रहेगा, तो भी मैं जो हूं, वह तो रहूंगा ही।       

मैं जानता हूं कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं रहता। आज भी जब केदारनाथ सिंह की कविताएं पढ़ता हूं तो लगता है कि मेरे अंदर कुछ पिघल रहा है। आज भी अलोक धन्वा की कविता पढ़ता हूं तो लगता है मैं एक बेहतर इंसान बन गया। इनके अलावा, अरुण कमल, रेणु, गोर्की को पढ़ता हूं। शायद यही लोग मुझे संभालते हुए हैं।   

पहले जिन लोगों ने ठुकराया होगा, आज वही फिल्मों के ऑफर लेकर आपके पीछे भागते होंगे? यह सब कैसा लगता है?

फिल्म इंडस्ट्री में या किसी भी अन्य क्षेत्र में आपको कटु अनुभव होंगे। हिंदी में एक कहावत है, ‘देह धरे का दंड।’ यह मृत्युलोक है, जहां खुशियां मिलेंगी तो उतनी ही या उससे ज्यादा पीड़ा भी मिलेगी। मैं कंटेंट नहीं बदल सकता, तो कॉन्टेक्स्ट बदल देता हूं। मैं अभी धूप में बैठा हूं। इससे या तो मुझे सन-बर्न होगा या विटामिन डी मिलेगी। सिनेमा कोई लोक कल्याणकारी राज्य नहीं है। यह कला का व्यवसाय है और जहां व्यवसाय शब्द आ गया,  वहां नैतिकता, आचार-विचार जैसी चीजें दरकिनार हो सकती हैं। मैं जीवन में कटुता नहीं पालता।

सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु से लेकर बाहरी-भीतरी सहित कई मसलों के कारण बॉलीवुड विवादों में है। इंडस्ट्री इससे जल्दी उबर पाएगी? 

जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं। इस समय हम कोलाहल में जी रहें हैं। कालीन भैया जितना बुरा दिखता है, उसमें कुछ अच्छाई भी होंगी। बेदाग किरदारों में भी खामियां होती हैं। हम सब ग्रे एरिया में जी रहे हैं। यह दुखद है, खासकर तब जब कोविड-19 के कारण पूरी दुनिया में क्राइसिस है। उम्मीद है, 23 अक्टूबर को मिर्जापुर-2 के प्रदर्शन के बाद यह कोलाहल कुछ दिनों के लिए शांत हो जाएगा।

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