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धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट में बहस, रोहतगी ने कहा-समाज बदलने के साथ बदल जाती हैं नैतिकताएं

JUL 10 , 2018

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने मंगलवार से आईपीसी की धारा 377 को अंसवैधानिक करार देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई शुरू कर दी है। पीठ यह तय करेगी कि समलैंगिकता अपराध है या नहीं।

मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, आरएफ नरीमन, एएम खानविलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा की पीठ कर रही है। एडीशनल सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार इस पर आज अपना पक्ष रखेगी।

वहीं एक याचिकाकर्ता की ओर से दलील रखते हुए पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुनवाई के दौरान कहा, 'लिंग और सेक्सुअल ओरिएंटेशन दो अलग-अलग चीजें हैं। इन दो मुद्दों को मिश्रित नहीं किया जाना चाहिए। यह पसंद का सवाल नहीं है।' रोहतगी ने कहा कि धारा 377 मानवाधिकारों का हनन करती है। जैसे-जैसे समाज बदलता है, मूल्य बदलते हैं, हम कह सकते हैं कि 160 साल पहले जो नैतिक था, वो अब नैतिक नहीं हो सकता है।

पूर्व अटॉर्नी जनरल ने तर्क दिया, 'सेक्शन-377 के होने से एलजीबीटी समुदाय अपने आप को अघोषित अपराधी महसूस करता है। समाज भी इन्हें अलग नजर से देखता है। इन्हें संवैधानिक प्रावधानों से सुरक्षित महसूस करना चाहिए।'

इससे पहले मामले में सुनवाई कुछ समय के लिए स्थगित करने वाली केंद्र की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ठुकरा दिया था। केंद्र ने सुनवाई स्थगित करने की मांग की थी और कुछ और समय मांगा था। कोर्ट ने मंगलवार से सुनवाई करने के लिए कहा था।

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि इस मामले में सरकार को हलफनामा दाखिल करना है जो इस केस में महत्वपूर्ण हो सकता है। इस वजह से केंद्र ने अपील की थी कि केस की सुनवाई चार हफ्ते के लिए टाल दी जाए। इससे पहले चीफ जस्‍टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने धारा 377 को बरकरार रखने वाले अपने पहले के आदेश पर पुनर्विचार करने का फैसला लिया था।

जस्‍टि‍स मिश्रा ने कहा था, 'हमारे पहले के आदेश पर पुनर्विचार किए जाने की जरूरत है'। अदालत ने यह आदेश 12 अलग-अलग याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर दिया था, जिसमें कहा गया है कि आईपीसी की धारा 377 अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है। इन याचिकाकर्ताओं में सेलिब्रिटीज, आईआईटी के छात्र और एलजीबीटी एक्टिविस्ट हैं।

क्या है धारा 377

- धारा-377 इस देश में अंग्रेजों ने 1862 में लागू किया था। इस कानून के तहत अप्राकृतिक यौन संबंध को गैरकानूनी ठहराया गया है।

- अगर कोई स्‍त्री-पुरुष आपसी सहमति से भी अप्राकृतिक यौन संबंध बनाते हैं तो इस धारा के तहत 10 साल की सजा व जुर्माने का प्रावधान है।

- किसी जानवर के साथ यौन संबंध बनाने पर इस कानून के तहत उम्र कैद या 10 साल की सजा एवं जुर्माने का प्रावधान है।

- सहमति से अगर दो पुरुषों या महिलाओं के बीच भी संबंध इस कानून के दायरे में आता है।

- इस धारा के अंतर्गत अपराध को संज्ञेय बनाया गया है। इसमें गिरफ्तारी के लिए किसी प्रकार के वारंट की जरूरत नहीं होती है।

- शक के आधार पर या गुप्त सूचना का हवाला देकर पुलिस इस मामले में किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है

- धारा-377 एक गैरजमानती अपराध है।

 सुप्रीम कोर्ट ने ही दिल्ली हाइकोर्ट के आदेश को किया था रद्द

दरअसल दिल्ली हाईकोर्ट ने नाज फाउंडेशन के मामले में समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में शामिल मानने की आइपीसी की धारा 377 के उस अंश को रद कर दिया था जिसमें दो बालिगों के बीच एकांत में बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध माना जाता था। लेकिन हाईकोर्ट के बाद जब मामला सुप्रीम कोर्ट आया तो सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने धारा 377 को वैध ठहराते हुए हाईकोर्ट का आदेश रद कर दिया था।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने दो न्यायाधीशो के फैसले पर जताई थी असहमति

अगस्त 2017 में निजता के फैसले में जस्टिस चंद्रचूड़ ने धारा 377 को वैध ठहराने के दो न्यायाधीशो के फैसले से असहमति जताते हुए कहा था कि उस फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 में दिये गए निजता के संवैधानिक अधिकार को नकारने आधार सही नहीं था। सिर्फ इस आधार पर तर्क नहीं नकारा जा सकता कि देश की जनसंख्या का बहुत छोटा सा भाग ही समलैंगिक हैं जैसा की कोर्ट के फैसले में कहा गया।

कोर्ट ने कहा था कि किसी भी अधिकार को कम लोगों के प्रयोग करने के आधार पर नहीं नकारा जा सकता। सेक्सुअल ओरिन्टेशन के आधार पर किसी के भी साथ भेदभाव बहुत ही आपत्तिजनक और गरिमा के खिलाफ है। निजता और सैक्सुअल पसंद की रक्षा संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार के केंद्र में है। इसका संरक्षण होना चाहिए।


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