Home सिनेमा क्षेत्रीय मछुआरा समुदाय की मार्मिक कहानी है 'कोकोली'

मछुआरा समुदाय की मार्मिक कहानी है 'कोकोली'

आउटलुक टीम - AUG 10 , 2019
मछुआरा समुदाय की मार्मिक कहानी है 'कोकोली'
मछुआरा समुदाय की मार्मिक कहानी है 'कोकोली'
आउटलुक टीम

ओडिशा में समुद्र स्तर के बढ़ने से जमीन डूब रही है। मछलियां पकड़ कर आजीविका चलाने वाले मछुआरों के सामने इस स्थिति ने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है। ये वर्ग हर दिन आजीविका के साधन के लिए संघर्ष कर रहा है। फिल्मकार स्नेहाशीष दास ने इस विषय को लेकर फिल्म बनाई है, कोकोली। ओडिया भाषा में बनी यह फिल्म कोकोली नाम की एक लड़की और उसके प्रेमी के इर्द-गिर्द घूमती है।

पर्यावरण की चिंता में उपजा प्रेम

स्नेहाशीष ने अपनी कहानी कहने के लिए परंपरागत शैली का चुनाव किया है। यानी प्रेम पाने के लिए किसी प्रतिज्ञा को पूरा करना। कोकोली के प्रेम में पड़ा एक लड़का समुद्र की तेज लहरों से अपने गांव को नष्ट होने और उजड़ने से बचाने के लिए दीवार बनाने के लिए दिन-रात एक कर देता है। क्योंकि यदि वह ऐसा कर पाएगा तो वह कोकोली की मां का दिल जीत सकेगा। यह फिल्म पर्यावरण की चिंता करती हुई प्रेम कहानी है। आपदाओं की वजह से परेशान यह प्रेमी जोड़ा इस कहानी के केंद्र में है। अभी तक भारत में ग्लोबल वार्मिंग या क्लाइमेट चेंज पर फिल्मों ने जोर नहीं पकड़ा है। इससे पहले ‘कड़वी हवा’ ने ही इस विषय पर दर्शकों का ध्यान खींचा था। हिंदी फिल्म जगत में यह पहली फिल्म थी जिसने क्लाइमेट चेंज की बात की थी।

कोकोली को मिले हैं कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार

काकोली को मैक्सिको में दो अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं। इस फिल्म ने 7 कलर्स लगून बैकलर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की एनवायरमेंट श्रेणी और ट्युलुम वर्ल्ड एनवायरनमेंट फिल्म फेस्टिवल दोनों में क्लाइमेट चेंज पर बेस्ट फीचर फिल्म का पुरस्कार हासिल किया है। उत्कल विश्वविद्यालय, ओडिशा और भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से इतिहास और पत्रकारिता में डिग्री लेने वाले फिल्म के निर्देशक स्नेहाशीष कहते हैं, “यह फिल्म देश के युवाओं तक पहुंचनी चाहिए क्योंकि यही लोग ‘फ्यूचर चेंजमेकर्स’ हैं। आने वाले दिनों में यह समस्या बढ़ने ही वाली है और युवा ही हैं जो इस स्थिति को रोक या कम कर सकते हैं। मैं ऐसी फिल्म बनाना चाहता था जो लोगों में जागरूकता लाए। यही वजह है कि मैंने कोकोली का विषय चुना। कोकोली एक प्रकार की मछली भी होती है।” स्नेहाशीष इसे कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में ले जाना चाहते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों का ध्यान इस पर जाए। उनकी कोशिश है कि नेटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम जैसे डिजिटल प्लेटफार्म पर भी यह फिल्म आए क्योंकि आजकल इन मंचों की रीच बहुत ज्यादा है। स्नेहाशीष सामाजिक विकास और पर्यावरण संचार के क्षेत्र में लगातार काम करते आ रहे हैं और यह फिल्म उसी की कड़ी है। 

क्या है ओडिशा की समस्या

लगभग 500 किलोमीटर (300 मील) के समुद्र तट के साथ ओडिशा कई तटीय समुदायों का घर है, जो आजीविका के लिए पूरी तरह से समुद्र पर निर्भर हैं। यह राज्य ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के लिए सबसे अधिक संवेदनशील है, जो समुद्र स्तर बढ़ने, चक्रवात और बाढ़ से प्रभावित रहता है। तटीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जमीन का कटाव भी हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि यदि प्रौद्योगिकी उपायों और व्यवहार में परिवर्तन का व्यापक उपयोग किया जाए तो वैश्विक औसत तापमान में बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना अब भी संभव है।

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