The terminal man Mehran Karimi Nasseri an iranian refugee who spent 18 years in a french airport : Outlook Hindi
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एक रिफ्यूजी की कहानी, जिसने 18 साल तक एयरपोर्ट टर्मिनल को अपना घर बना लिया

FEB 12 , 2018

2004 में दिग्गज डायरेक्टर स्टीवन स्पीलबर्ग की एक फिल्म आई थी। द टर्मिनल। फिल्म में टॉम हैंक्स ने विक्टर नवॉर्स्की की भूमिका निभाई थी।

राजनीतिक हालातों और आदमी के 'ही' बनाए सिस्टम में आए एक ‘क्रैक’ की वजह से विक्टर न्यूयॉर्क के केनेडी एयरपोर्ट पर फंस जाता है। उसके देश क्रकोझिया (फिल्म में यही उच्चारण है) में सिविल वॉर चल रहा है और यह देश संप्रभु राष्ट्र नहीं रह जाता। वहीं, न्यूयॉर्क में विक्टर को प्रवेश की अनुमति नहीं मिलती। जब तक उसके देश को मान्यता नहीं मिलती, वो घर नहीं लौट सकता। एक तरह से विक्टर अब किसी देश का नागरिक नहीं है। फिल्म की भाषा में कहा जाए तो ‘अनएक्सेप्टेबल’ यानी अस्वीकार्य।

इस बेसिक प्लॉट के बाद फिल्म में फिक्शन का पुट ज़्यादा था लेकिन यह कहानी एक असल घटना पर आधारित थी।

विक्टर नवॉर्स्की की कहानी एक ईरानी रिफ्यूजी या शरणार्थी मेहरन करीमी नासेरी की ज़िंदगी से प्रभावित थी। मेहरन करीमी ने पेरिस के चार्ल्स डे गॉल एयरपोर्ट के टर्मिनल वन पर 18 साल गुजार दिए। 26 अगस्त 1988 से लेकर जुलाई 2006 तक। नासेरी का परिवार मेडिकल बैकग्राउंड से था। उनके पिता फिजीशियन थे और मां नर्स। नासेरी 1973 में पढ़ाई के लिए यूनाइटेड किंगडम आए थे।

नासेरी और टर्मिनल वन

नासेरी का दावा था कि 1977 में उन्होंने ईरान में शाह शासन का विरोध किया था इसीलिए उन्हें देश-निकाला दे दिया गया। मोहम्मद रजा पहलवी या मोहम्मद रजा ‘शाह’ ईरान का आखिरी शाह था, जिसे 11 फरवरी, 1979 को ईरानी क्रांति के जरिए अपदस्थ कर दिया गया था।

कई जगहों पर एप्लीकेशन डालने के बाद नासेरी को बेल्जियम स्थित 'यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजीज' ने रिफ्यूजी का स्टेटस दे दिया। ये बात सच है कि नासेरी ने टर्मिनल वन पर 18 साल गुजारे लेकिन उन्हें ईरान से निकाला गया, इस पर विवाद भी है। दावा किया जाता है कि उन्हें ईरान से कभी निकाला नहीं गया था।

1988 में वह लंदन आए लेकिन उनके पास इमिग्रेशन अफसरों को दिखाने के लिए पासपोर्ट नहीं था। नासेरी यहां से फ्रांस गए। उन्हें फ्रांस में गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया क्योंकि एयरपोर्ट में उनकी एंट्री वैध थी। नासेरी के पास लौटने के लिए कोई देश नहीं था, कोई घर नहीं था इसलिए एयरपोर्ट का 'टर्मिनल वन' उनका घर बन गया।

'अनएक्सेप्टेबल'

फ्रांस में नासेरी का केस कोर्ट पहुंचा। 1992 में फ्रेंच कोर्ट ने कहा कि देश में उनकी एंट्री वैध है इसलिए उन्हें एयरपोर्ट से नहीं निकाला जा सकता लेकिन उन्हें फ्रांस में आने की अनुमति भी नहीं मिल सकती।

बाद में फ्रांस और बेल्जियम ने नासेरी को अपने यहां रहने का ऑफर दिया। बेल्जियम की शर्त थी कि उन्हें एक सोशल वर्कर की निगरानी में रहना होगा। नासेरी जब ब्रिटेन में थे तब खुद के लिए 'सर, अल्फ्रेड मेहरन' नाम इस्तेमाल करते थे और चाहते थे कि उन्हें ब्रिटिश ही कहा जाए लेकिन एक दिक्कत थी। दोनों देशों के पेपर पर वो 'ईरानियन' ही थे इसलिए नासेरी ने पेपर्स साइन करने से मना कर दिया। आज़ादी का मौका मिलने का बावजूद नासेरी ने पेपर्स साइन नहीं किए और ये बात उनके वकीलों के लिए सिरदर्द बन गई। इस बारे में जब नासेरी के परिवार से पूछा गया तो उनका कहना था कि नासेरी वही ज़िंदगी जी रहे हैं जो वह जीना चाहते हैं।

'एक्सेप्टेबल'

नासेरी ने टर्मिनल वन पर ही अपना सामान वगैरह जमा लिया था और वहीं पढ़ाई-लिखाई करते थे। इकॉनॉमिक्स में उनकी दिलचस्पी थी। खाना और अख़बार उन्हें एयरपोर्ट के कर्मचारियों से मिल जाता था। उत्सुक पत्रकार उनकी कहानी जानने के लिए आते रहे। उनके समर्थन की चिट्ठियां आती रहीं। 18 सालों तक यह सिलसिला चला।

टर्मिनल वन में नासेरी

जुलाई 2006 में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और टर्मिनल में उनके रहने की जगह को हटा दिया गया। 6 मार्च, 2007 को उन्हें पेरिस भेजा गया। 2008 के बाद से नासेरी वहीं रह रहे हैं।

द टर्मिनल मैन

2004 में नासेरी की आत्मकथा छपी- द टर्मिनल मैन। यह किताब उन्होंने ब्रिटिश लेखक एंड्र्यू डॉन्किन के साथ मिलकर लिखी थी। ब्रिटेन के ‘संडे टाइम्स’ ने इसे बेहतरीन और 'झकझोर देने वाली' किताब बताया। बाद में उन पर कई फिक्शनल और नॉन फिक्शनल फिल्में भी बनीं।

स्टीवन स्पीलबर्ग की प्रोडक्शन कंपनी ड्रीमवर्क्स ने 2003 में उनकी कहानी दिखाने के लिए नासेरी से 250,000 डॉलर में राइट्स खरीदे। इस फिल्म में उनकी कहानी पूरी तरह तो नहीं दिखाई गई, लेकिन बेसिक प्लॉट नासेरी से ही प्रभावित था। 


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