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फिल्म 'केदारनाथ' विवादों में, लव जिहाद के समर्थन का आरोप

NOV 04 , 2018

केदारनाथ में आई भीषण बाढ़ की घटना की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म 'केदारनाथ' अपने टीजर और प्रोमो के सामने आते ही विवादों में घिर गई है। फिल्म अगले महीने रिलीज होने वाली है। उत्तराखंड में स्थित केदारनाथ क्षेत्र में वर्ष 2013 में आई 'जयप्रलय' पर आधारित इस फिल्म का केदारनाथ के तीर्थ पुरोहितों से लेकर राजनीतिक दलों ने विरोध शुरू कर दिया है। फिल्म के विरोध में उतरे लोगों ने फिल्म के नायक और नायिका के बीच दर्शाए गए अंतरंग दृश्यों को धार्मिक आस्था से छेड़छाड़ बताते हुए आपत्तिजनक करार दिया है।

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, विरोध कर रहे लोगों ने फिल्म की स्टोरी पर आपत्ति जताई है और उनका मानना है कि यह फिल्म 'लव जिहाद' का समर्थन कर रही है। 7 दिसंबर को रिलीज हो रही अभिषेक कपूर निर्देशित यह फिल्म बाढ़ में फंसी एक हिंदू श्रद्धालु को एक मुस्लिम द्वारा बचाए जाने के बाद दोनों के बीच पनपे प्यार की कहानी है। इस फिल्म में सारा अली खान और सुशांत सिंह राजपूत मुख्य भूमिका में हैं। सारा, सैफ अली खान और अमृता सिंह की बेटी हैं और यह उनकी पहली फिल्म है।

हालांकि उत्तराखंड में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी इस फिल्म को लेकर फिलहाल खुलकर कुछ नहीं बोल रही है, लेकिन उसका भी मानना है कि सैद्धांतिक तौर पर धार्मिक स्थलों से जुड़ी परंपराओं और आस्थाओं का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इससे किसी की भावनाएं आहत न हों।

पिछले कुछ दिनों में फिल्म के टीजर और प्रोमो जारी होने के बाद से केदारनाथ के सतेराखाल और आस-पास के अन्य क्षेत्रों में स्थानीय लोगों ने फिल्म के विरोध में प्रदर्शन शुरू कर दिए और उन्होंने फिल्म के पोस्टर, निर्देशक, नायक और नायिकाओं के पुतले जलाए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि फिल्म के टीजर में दिखाए जाने वाले दृश्य देवभूमि और केदारनाथ की आस्था के साथ खिलवाड़ हैं और फिल्म देवभूमि और केदारनाथ की रीति और नीति के बिल्कुल उलट है।

विरोध में शामिल सामाजिक कार्यकर्ता गंभीर बिष्ट ने कहा कि ऐसा मालूम होता है कि फिल्म बनाने वालों ने हिंदू धर्म की आस्था पर चोट की है। आने वाले समय में अगर ऐसे दृश्य नहीं हटाए गए तो प्रदेशव्यापी आंदोलन छेड़ा जाएगा। इस बारे में उत्तराखंड प्रदेश बीजेपी प्रवक्ता डॉ. देवेंद्र भसीन ने कहा कि सैद्धांतिक दृष्टि से धार्मिक स्थलों से जुड़ी आस्थाओं और परंपराओं का ध्यान रखा जाना चाहिए और सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि लोगों की भावनाएं आहत न हों। वैसे भी धार्मिक स्थलों के फिल्मांकन के मामले में फिल्मी मसालों का कोई औचित्य नहीं है।


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